The Mysterious Bell – Chapter 1412
चम्मच फ़र्श पर गिरा — पत्थर पर। उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी कि चौक में हर आदमी ने सिर उठा लिया।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
किसी ने साँस तक नहीं ली।
शबनम आपा वहीं खड़ी रहीं, हाथ हवा में, जैसे कोई उन्हें रोक रहा हो।
और फिर वो औरत बोली।
"आपा।"
बस इतना। एक शब्द। बहुत धीमा। बहुत टूटा।
चारों तरफ़ लोगों के चेहरे बदलने लगे। पहले किसी को समझ नहीं आया। फिर एक बूढ़ी औरत ने धीरे से कहा, "रज़िया?"
और फिर जैसे एक साथ दस लोगों को याद आ गया।
"रज़िया आपा।"
"शबनम की बहन।"
"अरे, ये तो पंद्रह साल बाद…"
"चुप करो।"
आख़िरी आवाज़ किसी ने डपटकर कही और सब चुप हो गए।
मैंने अपनी कटोरी नीचे रखी।
मेरे पास कहने के लिए बहुत कुछ था, पर मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उठा, टिंकू का कंधा दबाया — जिसका मतलब था, बैठा रह — और मैं पीछे हट गया। पीपल के उस पार जाकर खड़ा हो गया, जहाँ से मुझे सब दिख रहा था और मैं किसी के रास्ते में नहीं था।
शबनम आपा ने अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया।
ये वो मुँह फेरना नहीं था जो गुस्से में फेरा जाता है। ये वो मुँह फेरना था जिसमें आदमी अपने आँसू छिपाता है, क्योंकि उसने पंद्रह साल से अपने आप से एक वादा कर रखा है कि वो किसी के सामने नहीं रोएगी।
रज़िया ने अपनी जेब में हाथ डाला।
उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
वो कुछ निकाल नहीं पा रही थी — जैसे उसकी जेब में कुछ ऐसा है जो उसके हाथ से चिपक गया हो।
फिर उसने निकाला।
एक टूटी चूड़ी का टुकड़ा।
हरी चूड़ी। घिसी हुई। एक किनारे पर सुनहरी लकीर।
उसने उसे हथेली पर रखकर आगे बढ़ाया।
और शबनम आपा — जो पूरे मोहल्ले की सबसे तेज़ ज़ुबान वाली औरत थीं, जो किसी को भी दो शब्दों में चुप करा सकती थीं — उनका हाथ अपनी साड़ी के पल्लू के नीचे गया।
वो अपनी जेब से कुछ निकाल रही थीं।
मैंने देखा कि उनके हाथ भी काँप रहे थे।
उन्होंने एक टुकड़ा निकाला।
उसी चूड़ी का दूसरा टुकड़ा।
उन्होंने उसे हथेली पर रखा। दोनों टुकड़े एक दूसरे से उल्टे थे, पर मैं दूर से भी देख सकता था कि वो एक ही चूड़ी के हैं। किनारों पर वही सुनहरी लकीर। वही घिसाव। वही रंग।
दोनों औरतों की आँखें भर आईं।
कोई नहीं बोला।
समोसों का थाल वहीं पड़ा रहा। चाय ठंडी होने लगी। दीयों की लौ हवा में हिल रही थी और किसी ने उन्हें रोका नहीं।
रज़िया ने पहले हाथ बढ़ाया।
फिर रोक लिया।
फिर उसने अपना सूटकेस नीचे रखा — बहुत संभालकर, जैसे उसके अंदर कुछ बहुत नाज़ुक रखा हो — और दोनों हाथों से अपनी चादर सीधी की।
तभी भोला भाई ने धीरे से कहा, "आपा, बैठिए न।"
शबनम आपा ने उनकी तरफ़ ऐसी नज़र की कि भोला भाई एक कदम पीछे हट गए।
पर फिर उन्होंने खुद ही एक कटोरी उठाई, उसमें चाय डाली, और आगे बढ़ाकर रज़िया के हाथ में थमा दी।
"पहले पी ले," उन्होंने कहा। आवाज़ रूखी थी, पर रूखी में भी कुछ था। "रास्ते से आई है।"
रज़िया ने कटोरी दोनों हाथों से पकड़ी।
उसके हाथ काँप रहे थे। चाय किनारे पर आ गई।
उसने एक घूँट लिया।
फिर उसने कटोरी नीचे रखी और अपनी आँखें पोंछीं — आस्तीन से नहीं, हाथ की पीठ से, जैसे वो बच्ची हो।
और तब उसने वो बात कही जो वो पंद्रह साल से अपने अंदर लिए घूम रही थी।
"आपा।"
शबनम ने उसकी तरफ़ देखा। पहली बार पूरी तरह देखा।
"आपने माँ के आख़िरी दिनों में मुझे अस्पताल से बाहर क्यों धकेल दिया था?"
चौक में इतनी चुप्पी फैली कि पीपल की पत्तियों की आवाज़ सुनाई देने लगी।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी — न गरम, न बोलती। बस चुप। जैसे वो भी सुन रही हो।
शबनम आपा ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बस अपनी हथेली में रखा चूड़ी का टुकड़ा देखा, और उनकी उँगलियाँ उसे इस तरह दबाने लगीं जैसे वो उससे कोई जवाब निकालना चाहती हों।
रज़िया ने अपनी आवाज़ नीची कर ली — इतनी नीची कि सिर्फ़ पास बैठे लोग सुन सकें। पर चौक में सब पास ही बैठे थे।
"मैं रोज़ आती थी," उसने कहा। "रोज़। सुबह दूध लेकर, शाम को दवा लेकर। और एक दिन आपने दरवाज़े पर खड़े होकर कह दिया कि अब तू मत आ।"
किसी औरत ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
"मैंने कहा था," शबनम आपा ने कहा। आवाज़ सपाट थी। "और मैं आज भी कहूँगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि तू उस वक़्त गर्भवती थी," शबनम आपा ने कहा।
चौक में फिर सन्नाटा।
"अस्पताल में बुखार फैल रहा था," शबनम आपा ने आगे कहा, और उनकी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो पंद्रह साल में जम गई थी। "माँ को क्या हो गया था, किसी को पता नहीं चला। डॉक्टर बोले — किसी को अंदर मत आने देना। और तू रोज़ आती थी, रोज़, बिना मास्क, बिना कुछ। मैंने तुझे रोका। तूने नहीं सुना। तो मैंने तुझे धक्का दिया।"
"धक्का नहीं," रज़िया ने कहा, और उसकी आवाज़ काँपी। "आपने मेरी बाँह पकड़ी और सीढ़ी से नीचे उतार दिया। और जब मैं फिर ऊपर आई, तो दरवाज़े पर ताला लगा था।"
"वो ताला डॉक्टर का था," शबनम आपा ने कहा। "मैंने नहीं लगाया था।"
"तो आपने खोला क्यों नहीं?"
ये सवाल हवा में लटक गया।
शबनम आपा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने चूड़ी का टुकड़ा उठाया और उसे देखने लगीं, जैसे उसमें जवाब लिखा हो।
"माँ ने तुझे बुलाया था," उन्होंने अचानक कहा। "आख़िरी रात। उन्होंने तीन बार तेरा नाम लिया।"
रज़िया की साँस अटक गई।
"और मैंने तुझे बुलाया था," शबनम आपा ने कहा। "मैंने तेरे घर फोन किया था। पर तेरे ससुराल वालों ने कह दिया कि तू सो रही है और वो तुझे जगाएँगे नहीं।"
वो चुप हो गईं।
"और मैंने उन्हें ज़ोर नहीं दिया," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ कहा — ठीक है। और फोन रख दिया।"
रज़िया की आँखों से आँसू गिर रहे थे, और वो उन्हें पोंछ नहीं रही थी।
"मैंने तुझे अस्पताल से बाहर नहीं धकेला था," शबनम आपा ने कहा, और अब उनकी आवाज़ टूट रही थी। "मैंने अपने आप को अंदर बंद कर लिया था। मैं अकेली रह गई थी उस कमरे में। और मैं तुझे अंदर नहीं आने देना चाहती थी, क्योंकि अगर तू आ गई, तो मुझे बोलना पड़ता। और मुझे बोलना नहीं आता, रज़िया। मुझे सिर्फ़ चूल्हा जलाना आता है।"
ये सुनकर चौक में जो आवाज़ उठी, वो किसी के बोलने की नहीं थी। वो कई लोगों के एक साथ साँस भरने की थी।
टिंकू मेरे पास आया और उसने मेरी कमीज़ खींची।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसकी आँखें भरी हुई थीं। और उसके होंठ कुछ कहना चाह रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
मैंने धीरे से कहा, "बोल।"
"उस्ताद," उसने फुसफुसाकर कहा, "मेरी अम्मी भी नहीं बोलतीं। जब भी मेरे अब्बा की बात आती है, वो बस चूल्हे के पास चली जाती हैं।"
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तो तू उनसे चूल्हे के पास जाकर बात करना," मैंने कहा। "कभी-कभी लोग चूल्हे के पास इसलिए जाते हैं क्योंकि वहाँ कोई सवाल नहीं पूछता।"
शबनम आपा ने आगे बढ़कर रज़िया का हाथ पकड़ा।
उन्होंने अपनी हथेली में रखा चूड़ी का टुकड़ा उसकी हथेली पर रखा — दोनों टुकड़े अब एक साथ थे।
"ये मैंने नहीं फेंका था," शबनम आपा ने कहा। "पंद्रह साल मेरी जेब में रहा। हर दिन।"
"मैंने भी नहीं फेंका," रज़िया ने कहा।
और फिर दोनों बहनें बैठ गईं।
बस बैठ गईं, पीपल की जड़ के पास, दीयों के घेरे में, जैसे पंद्रह साल पहले बैठी थीं।
किसी ने कुछ नहीं कहा।
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