The Mysterious Bell – Chapter 1405
शालिनी ने पर्चा उसके हाथ से लिया। उसने कुछ देर देखा, और फिर उसके होंठ खुले रह गए। उसकी आवाज़ जैसे किसी और गले से आई।
"ये मेरे पापा की प्रेस है," उसने कहा।
गलियारे में जो लोग बैठे थे, उन्होंने भी सिर उठाया।
"मेरे पापा की मशीन," शालिनी ने कहा। "वही मशीन जो छत की रिपोर्ट छापती थी। वही मशीन जो झूठी रसीदें छापती थी। और वही मशीन — अब ये काग़ज़ छाप रही है। मेरे हाथ ने आज दिन भर जो काग़ज़ उठाए, उन सब पर यही टूटी 'ट' है और मैंने इसे नहीं देखा। मैंने इसे देखा ही नहीं।"
वो बेंच पर बैठ गई। धम से नहीं, धीरे से — जैसे उसके घुटने खुद फ़ैसला ले चुके हों।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"शालिनी," मैंने कहा। "तुमने नहीं देखा, इसका मतलब ये नहीं कि तुम ग़लत हो। इसका मतलब ये है कि तुम दिन भर वो चीज़ें देख रही थी जिनसे ज़िंदगी बचती है। ये काग़ज़ तुमने नहीं छापा। ये काग़ज़ तुम्हारे पापा की मशीन पर दूसरे हाथों ने छापा है। और अब तुम अपनी मशीन को उन हाथों से छीनकर लाओगी — यही तुम्हारा काम है।"
उसने सिर हिलाया। फिर कुछ ऐसा कहा जो मुझे आज तक याद रहेगा।
"मेरी मशीन," उसने कहा, "ने पहले शादी के कार्ड छापे थे। एक भी कार्ड ऐसा नहीं था जिस पर मेरे पापा ने अपनी मर्ज़ी से मुहर लगाई हो और वो मुहर झूठी निकली हो। आज वो ही मशीन मरीज़ों को डरा रही है। अब वो मेरी मशीन नहीं है। पर जब तक मैं इसे वापस नहीं लेती, मैं सो नहीं सकती।"
दुबे अंकल ने अपनी पुरानी कॉपी खोली। काग़ज़ की सुगंध से गलियारे में जैसे एक पुराना दिन खुल गया।
"मैंने इक्कीस साल पहले एक शिकायत में यही लिखा था," उन्होंने कहा। "कि शहर में दो ही जगह से झूठ निकलता है — एक मुंह से, दूसरी उस प्रेस से। मुंह तो बंद हो जाता है, अंकुश। प्रेस नहीं होती। उसको बंद करना पड़ता है।"
"आज रात नहीं," मैंने कहा। "आज रात हम कुछ बंद नहीं करवाएँगे। आज रात हम सिर्फ़ एक काम करेंगे — जागेंगे।"
मैं मुड़ा और गलियारे के बीच में खड़ा हो गया। लालटेन की पीली रोशनी में सबके चेहरे आधे अंधेरे में, आधे रोशनी में थे। किसी की आँख में डर था, किसी की आँख में गुस्सा, और एक बूढ़े की आँख में सिर्फ़ थकान — ऐसी थकान जो सालों से जमा हुई हो।
"मैं नाम से सबको नहीं जानता," मैंने कहा। "पर मैं इतना जानता हूँ कि आज रात यहाँ जो बैठा है, वो इस अस्पताल में इलाज कराने आया है, गुज़ारिश करने नहीं। और इस गली की हर चीज़ — ये अस्पताल, वो पीपल, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी, स्कूल — ये किसी के बाप की जागीर नहीं है। ये हमारी है। हमने इसे अपने हाथों से बनाया है, अपने पैसों से नहीं, अपने दिनों से।"
मैंने रुककर देखा। बुज़ुर्ग औरत ने बक्से को अपने सीने से और चिपका लिया।
"कल सुबह तक काग़ज़ पूरा करना है," मैंने कहा। "और हम करेंगे। पर सुनो — अगर इस बीच कोई आए और कहे कि तुम बाहर निकलो, तो तुम एक बात कहना। बस एक बात। ये कहना — मेरा इलाज शुरू हो चुका है, मेरा काग़ज़ डॉक्टर साहब के पास है, और मेरा नाम आज रात किसी दस्तख़त के नीचे नहीं जाएगा। बस इतना कहना। बाक़ी मैं देख लूँगा।"
"देख लूँगा" कहते हुए मुझे खुद अपनी आवाज़ में वो डर सुनाई दिया जो मैं छिपा रहा था। क्योंकि सच ये था — मैं कुछ देख नहीं रहा था। मैं सिर्फ़ गिनती कर रहा था। जेब में चौंतीस अंक बचे थे। माँ की दवा दस दिन की थी। और आज शाम सात बजे की सभा में सबको जगह मिलनी थी, वरना पूरी गली का सच उसी अंधेरे में बह जाता जिसमें अभी हम खड़े थे।
शबीना ने अचानक कहा, "मेरा बच्चा बोल नहीं रहा। वो मुझे देख रहा है, पर बोल नहीं रहा।"
मैं उसके पास गया। मैंने बच्चे की आँखों में देखा। बच्चा डरा हुआ था। मैंने धीरे से कहा, "क्या नाम है?"
शबीना ने कहा, "अहमद।"
मैंने कहा, "अहमद, मेरा नाम अंकुश है। सुन, तेरी अम्मी कल सुबह जब तुझे उठाएगी, तुझे यही छत दिखेगी। और तू उस वक़्त भी यही छत देखेगा जब तू बड़ा होकर इसी अस्पताल में किसी को लाएगा। ये छत हमारी है। इसे कोई उठाकर नहीं ले जा सकता।"
बच्चे ने मेरी तरफ़ देखा। उसने कुछ नहीं कहा। पर उसकी साँस, जो पहले छोटी थी, ज़रा लंबी हुई।
डॉक्टर इसरानी ने उस वक़्त कहा, "अंकुश, एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"मैं आज रात सबको जगाए रखने की बात मानता हूँ। पर जागने का मतलब ये नहीं कि सब डरते रहें। जागने का मतलब ये है कि सब कुछ करते रहें।" उन्होंने मोमबत्ती उठाई। "मैं रसोई में जाता हूँ। हमीदा दाई को बता दूँ कि आज रात चाय दो बार बनेगी, पानी की बदली भी होगी, और दवा की खिड़की कभी नहीं बंद होगी।"
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप बूढ़े हैं, आपको आराम करना चाहिए।"
उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कुछ बहुत बड़ा गुनाह कहा हो।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं साठ के पार हूँ, ये सही है। पर इस अस्पताल में एक भी मरीज़ ऐसा नहीं है जिसे मैंने अपने हाथ से दवा देकर न छोड़ा हो। मुझे आराम करने की सलाह उस रात देना जिस रात यहाँ कोई बीमार न हो।"
वो चले गए। मोमबत्ती की लौ उनके साथ गलियारे की दीवार पर डोलती हुई दूर तक गई।
तभी मुझे लगा — कोई मेरी तरफ़ देख रहा है।
मैंने सिर घुमाया।
पाँचवें बेड के पास वो आदमी अभी भी बैठा था। लालटेन की पीली रोशनी में उसका चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था, पर इतना दिख रहा था कि उसके हाथ में एक मोड़ा हुआ काग़ज़ है और वो उसे पढ़ नहीं रहा — वो उसे पकड़े हुए था, जैसे किसी पुरानी तस्वीर को पकड़ा जाता है।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने सिर हिलाया, यानी वही आदमी।
मैंने कुछ कहना चाहा। पर उस वक़्त डॉक्टर इसरानी की आवाज़ दूर से आई, "हमीदा दाई, पानी गरम रखो — आज रात बहुत लोग जागेंगे।" और उस आवाज़ में जो उम्मीद थी, उससे मेरा ध्यान बँट गया।
मैं उस आदमी से बात करने के लिए दो क़दम बढ़ा ही था कि—
दरवाज़े पर पैरों की आवाज़ आई। तेज़। धूल में फिसलती हुई जैसी।
और फिर वो आवाज़ आई जिसे सुनकर मेरा पूरा शरीर एक पल के लिए ठंडा हो गया।
"उस्ताद!"
टिंकू।
मैं दौड़कर गेट की तरफ़ गया। वो बेंच से टकराया, गिरा, फिर उठा। उसके घुटने पर पट्टी खुल गई थी और उसके होंठ सूखे हुए थे। उसकी साँस इतनी तेज़ थी जैसे उसने सारी गली दौड़कर आई हो।
"टिंकू," मैंने कहा, "साँस ले। बोल।"
उसने साँस लेने की कोशिश की। और फिर उसने वो कहा।
"उस्ताद, स्कूल के पीछे कोई आग लगा रहा है!"
एक पल के लिए गलियारे में सब कुछ रुक गया। बूढ़ी औरत का बक्सा भी, शबीना के हाथ भी, पीले वार्ड की सील भी।
"कैसे?" मैंने कहा।
"मैं स्कूल की छत पर था," टिंकू ने हाँफते हुए कहा। "गुड्डू और रफ़ीक़ पीपल पर थे। मैं छत से देख रहा था कि गली खाली है या नहीं। फिर मैंने पीछे की तरफ़ देखा — वहाँ से काला धुआँ उठ रहा था, दीवार के पीछे से। और आग नहीं थी, उस्ताद। पहले सिर्फ़ धुआँ था। फिर मैंने सुना — किसी ने मिट्टी का तेल डाला।"
"किसने?" शालिनी ने पूछा।
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