The Mysterious Bell – Chapter 1403
दीवार पर चार पर्चे चिपके थे। तीन एक जैसे, और चौथा कुछ अलग — उस पर लाल स्याही में कुछ लिखा था।
मैंने चौथा पर्चा उतारा। लालटेन नीचे रखकर पढ़ा।
"काजल," मैंने कहा। "आ।"
वो पास आई। लालटेन पकड़ी। मैंने पढ़ा।
सिर्फ़ एक लाइन थी, लाल स्याही में, बड़े अक्षरों में। सीधी, सपाट, जैसे किसी ने काग़ज़ पर नहीं, दीवार पर खींच दी हो।
"जो कल मैदान में बोलेगा, उसका अस्पताल से नाता हमेशा के लिए छूट जाएगा।"
काजल ने देखा। उसकी साँस रुक गई।
"ये," उसने धीरे कहा, "ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए है।"
"नहीं," मैंने कहा।
"कैसे?"
"ये हर उस आदमी के लिए है जो कल मैदान में सच बोलेगा," मैंने कहा। "पापा, माँ, गोविंद भाई, तू, डॉक्टर इसरानी — सबके लिए। पर लिखने वाले ने ये मान लिया है कि मैदान में सिर्फ़ एक ही आदमी बोलेगा। मैं।"
"तो?"
"तो लिखने वाले ने अपनी सबसे बड़ी गलती कर दी," मैंने कहा। "उसने मान लिया कि मैं अकेला आया हूँ।"
मैंने पर्चा मोड़ा।
"टिंकू," मैंने कहा। "ये पर्चा तेरे पास जाएगा। अपनी कॉपी में लिख — तारीख़, वक़्त, जगह, किस दीवार पर।"
"हाँ उस्ताद," टिंकू ने कहा और पर्चा अपने बस्ते में रख लिया, जैसे कोई खज़ाना रखता हो।
"अब वापस चलो," मैंने कहा।
हम लौटे। अस्पताल के गेट पर भीड़ अब भी थी। माँ की कुर्सी वहीं थी — पापा ने उसे अपनी तरफ़ खींच लिया था, जैसे भीड़ से बचाने के लिए। माँ ने मुझे देखा।
"क्या मिला?" उन्होंने पूछा।
"एक लाइन," मैंने कहा। "एक लाइन और एक डर।"
"कैसी लाइन?"
"जो कहती है कि सच बोलने पर अस्पताल छूट जाएगा।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने वो गिलास, जो अब भी उनके हाथ में था, मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"पानी पी," उन्होंने कहा।
"माँ।"
"पहले पानी पी," माँ ने कहा। "फिर तेरे उस सवाल का जवाब दूँगी जो तेरे चेहरे पर लिखा है।"
मैंने पानी पिया।
"अब सुन," माँ ने कहा। "ये अस्पताल मेरे नाम पर नहीं है। न तेरे पापा के नाम पर, न तेरे नाम पर। ये उस डॉक्टर के नाम पर है जो इसका चौकीदार है, और उस ज़मीन के सात आदमियों के नाम पर, जिन्होंने इसके लिए अंगूठा लगाया था। मेरा इलाज यहाँ चलता है, तो नाता है — और अगर ये ज़मीन बिक गई, तो मेरा इलाज कहीं और चलेगा। पर जिस आदमी ने ये लाइन लिखी है, वो चाहता है कि मैं सोचूँ — मेरी दवा अस्पताल से जुड़ी है, इसलिए मेरा बेटा चुप रहे।"
वो रुकीं। उनका हाथ काँपा, पर आवाज़ नहीं।
"मैं तुझे बताती हूँ," माँ ने कहा। "मेरी दवा अस्पताल से जुड़ी है। पर मेरा बेटा सच से जुड़ा है। दवा बंद हो गई तो कुछ दिन और मिलेंगे। सच बंद हो गया तो कुछ भी नहीं बचेगा।"
पापा ने उनका कंधा दबाया।
मैंने माँ के हाथ से गिलास लिया और उसे मेज़ पर रख दिया। फिर मैं भीड़ की तरफ़ मुड़ा।
"सब सुनो!" मैंने आवाज़ उठाई।
भीड़ धीरे-धीरे चुप हुई।
"आज शाम सात बजे की सभा," मैंने कहा, "अब भी है। जगह वही। कोई कुर्सी नहीं चाहिए। कोई मंच नहीं चाहिए। पीपल के नीचे ज़मीन बराबर है।"
किसी ने कहा, "पर बत्ती नहीं है।"
"बत्ती नहीं है," मैंने कहा, "तो लालटेन जलाओ। तीन जलेंगी तो पाँच जलेंगी। आज रात पूरी गली में एक ही बात जलेगी — और वो बात घंटी से नहीं, मुँह से जलेगी।"
तभी मेरे कान में आवाज़ आई।
बहुत हल्की। बहुत दूर से। जैसे कोई पीतल के बंद कमरे के भीतर से बोल रहा हो।
"अब तूने मुझसे नहीं पूछा," घंटी ने धीरे कहा।
मैं रुक गया।
मैंने जेब से घंटी निकाली। वो अब भी ठंडी थी, पर उस पर एक नई लकीर उभर आई थी — पहले वाली दो लकीरों के नीचे, तीसरी। पतली। जैसे किसी ने मेरे सच बोलने पर उसे अपने आप खींच दिया हो।
"पूछ रहा हूँ," मैंने धीरे कहा। "क्या है?"
घंटी ने तीन शब्द कहे।
"वो अंदर है।"
"कौन?"
"वो।"
"कहाँ?"
घंटी चुप हो गई।
मैंने चारों तरफ़ देखा। भीड़ थी, चेहरे थे, लालटेन थीं, अस्पताल की पीली दीवार थी, और उस दीवार पर सफ़ेद पर्चे चिपके थे।
और उसी पल मुझे लगा — जैसे दीवारों पर चिपके सारे पर्चे एक साथ मेरी तरफ़ मुड़कर देख रहे हों।
मैंने मुट्ठी में घंटी दबाई।
"काजल," मैंने कहा। "मरीज़ अंदर हैं?"
"हाँ," काजल ने कहा।
"कोई आज नया आया? कोई अजनबी? कोई सफ़ेद कुर्ता?"
काजल ने आँखें बड़ी कीं।
"अंदर तो बहुत लोग हैं," उसने कहा। "पर एक आदमी है — पाँचवें बेड के पास, जो किसी का मरीज़ नहीं है। वो बैठा है और कोई काग़ज़ पढ़ रहा है। मैंने उसे दो बार देखा। वो मुस्कुराया।"
मेरी रीढ़ से एक सुई सी गई।
"कैसे?"
"ऐसे," काजल ने कहा, "जैसे वो हमें पहले से जानता हो।"
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रहे थे। उनके हाथ में अब भी मोमबत्ती थी, और मोमबत्ती की लौ उनके चेहरे पर एक ऐसी परछाईं डाल रही थी जो अब तक नहीं दिखी थी।
"अंकुश," डॉक्टर ने कहा। "तुम इंतज़ार कर रहे थे कि वो आएगा। अब वो आ गया।"
"क्या आप जानते हैं?" मैंने पूछा।
"मैं नाम नहीं जानता," डॉक्टर ने कहा। "पर एक बात जानता हूँ। मेरी बीवी कहती थी कि जब कोई चीज़ बहुत ज़्यादा जल्दी हो जाए, तो उसके पीछे कोई पुराना हाथ होता है। आज सुबह से जो हो रहा है — पर्चे, अंधेरा, गुनगुनाहट, सब — ये एक ही हाथ है।"
मैंने पर्चा जेब से निकाला। मोड़ा हुआ, हल्का। मैंने उसे खोला।
फिर, सबसे नीचे, उस लाल लाइन के ठीक नीचे, मैंने एक और चीज़ देखी — जो पहली नज़र में दिखी ही नहीं थी। छोटी, नीली स्याही में, पेंसिल से खींची गई दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।
वही निशान।
मैंने घंटी को हथेली में दबाया।
"अच्छा," मैंने धीरे कहा, जैसे कोई अपने ही कान में बोल रहा हो। "तो तू भी आ गया।"
और घंटी, पहली बार उस रात, गरम हुई।
बहुत ज़रा सी। इतनी कि मेरी उँगलियों में हल्की गुदगुदी हुई। जैसे कोई जवाब नहीं दे रहा हो, बस साँस भर रहा हो।
मैंने घंटी को वापस जेब में रखा और पापा की तरफ़ देखा।
"पापा," मैंने कहा। "अब मैं आपसे एक बात पूछूँगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। माँ ने भी।
"वो बात," मैंने कहा, "जो माँ ने कहा था — सच बोलने से पहले पापा से वो बात पूछो जो कभी नहीं पूछी।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"पूछ," उन्होंने कहा।
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। भीड़ की तरफ़ देखा। फिर पापा की तरफ़।
"आपने बाईस साल पहले," मैंने कहा, "अगर आपको यक़ीन होता कि मैं — मैं, आपका बेटा — आपके साथ खड़ा रहूँगा, तो क्या आप वो अंगूठा लगाते?"
पापा ने एक पल कुछ नहीं कहा।
फिर उन्होंने माँ का हाथ छोड़ा। मेरी तरफ़ आए। मेरे दोनों कंधे पकड़े। और इतनी धीमी आवाज़ में बोले कि सिर्फ़ मैंने सुना।
"नहीं," उन्होंने कहा। "और यही मेरा सबसे बड़ा सच है।"
मैंने सिर हिलाया। फिर मुड़कर अस्पताल के अंधेरे गलियारे की तरफ़ देखा, जहाँ काजल के मुताबिक़ पाँचवें बेड के पास कोई बैठा था, काग़ज़ पढ़ रहा था, और मुस्कुरा रहा था।
"अच्छा," मैंने धीरे कहा। "तो अब अंदर चलें।"
और मेरे पीछे पूरी गली चल पड़ी।
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