The Mysterious Bell – Chapter 1401
बत्तियाँ बुझीं।
तीसरी बार झपकने के बाद वो लौटीं ही नहीं। गुमटी की पीली बत्ती, स्कूल की दूर वाली ट्यूबलाइट, अस्पताल के गेट पर जलता बड़ा बल्ब, गली के मुँह पर लगे खंभे की रोशनी, पीपल के नीचे बच्चों के हाथ की टॉर्च — सब एक साँस में बुझ गए।
और अंधेरा आया।
वो अंधेरा नहीं था जो रात में आता है। वो अंधेरा था जो किसी बंद कमरे से निकलकर पूरी गली पर चादर की तरह गिर जाता है। इतना घना कि अपनी ही उँगली दिखाई न दे। इतना भारी कि कानों में अपनी धड़कन सुनाई दे।
किसी ने चीख मारी। फिर एक औरत ने अपने बच्चे का नाम पुकारा। किसी ने "अरे, टॉर्च जलाओ" कहा। किसी ने "तार कट गया" कहा। किसी ने कहा कि बिजलीघर में कुछ हुआ है, वहाँ से आवाज़ आ रही है।
मैंने जेब में हाथ डाला।
घंटी वहीं थी।
मैंने उसे हथेली में निकाला। बर्फ़ जैसी ठंडी। एकदम चुप। ना कोई कंपन, ना कोई गुनगुनाहट। जैसे कोई बच्चा डरकर मुँह छिपा लेता है, वैसे वो मेरी हथेली में बैठी थी।
"बोल," मैंने धीरे कहा। "अब क्या है?"
कुछ नहीं।
"अरे, अभी तो कहा था कि वो खुद आ रहा है। अब आया तो चुप क्यों?"
घंटी ने जवाब नहीं दिया।
मैंने उसे मुँह से लगाया। ठंडी। मैंने हिलाया। आवाज़ नहीं। मैंने माथे पर रखा। सिर्फ़ धातु की ठंडक।
अंदर से एक डर उठा, छोटा सा — जैसे किसी ने दरवाज़ा खोलकर फिर बंद कर दिया हो। मगर मैंने उसे मुँह पर नहीं आने दिया।
"माँ," मैंने आवाज़ दी। "माँ, तुम वहीं हो?"
"हाँ," माँ की आवाज़ आई, कमज़ोर, पर साफ़। "कुर्सी पर हूँ। तेरे पापा का हाथ पकड़ा हुआ है।"
"चलो, ठीक है। किसी को हिलना नहीं है।"
"अंकुश," पापा की आवाज़ आई, धीमी और भारी। "गली में औरतें, बच्चे खड़े हैं। पहले उनका दरवाज़ा पक्का करो।"
ये पापा थे। बत्तीस साल की चुप्पी के बाद दो लाइन बोले थे, और पहली लाइन बेटे के लिए नहीं, गली के लिए थी।
मुझे मज़ा भी आया और गुस्सा भी।
"देखा," मैंने पापा की तरफ़ अंधेरे में हाथ बढ़ाया। "इतने साल चुप रहकर भी अंदर से आप ऐसे ही रहे। ठीक है, सुनो सब!"
मैंने आवाज़ ऊपर उठाई।
"जो अपने घर के दरवाज़े के पास खड़ा है, वो वहीं रहे। अंदर जाकर मोमबत्ती, लालटेन, जो हाथ लगे जलाओ। जो बाहर आया, अपनी औरत, अपने बच्चे का हाथ पकड़े। कोई अकेले भागने की कोशिश करेगा तो मैं उसका नाम अपनी कॉपी में लिखूँगा — अंकुश की कॉपी में, वही जिसमें सबका हिसाब है।"
किसी ने हल्की हँसी दी।
अंधेरे में हँसी आती है तो मालूम होता है कि डर फिर भी मरा नहीं ہے।
टिंकू की आवाज़ आई — "टिंकू — यानी मैं — यहाँ हूँ।"
"और बाक़ी सेना?"
"गिलहरी भी," सानिया बोली।
"तोता भी," गुड्डू बोला।
"चूहा," चिंटू ने कहा। "अच्छा चूहा।"
"और चिड़िया," रफ़ीक़ ने कहा।
"बहुत बढ़िया," मैंने कहा। "अब जल्दी करो — दुकान के पीछे छत पर मोमबत्तियों का डिब्बा रखा है, उसमें दादा के ज़माने की मोमबत्तियाँ हैं, पीली पड़ी हैं, पर जलेंगी। टिंकू, चाबी तेरे मोज़े में है।"
"उस्ताद, आप?"
"यहाँ," उस्ताद की आवाज़ आई। बिल्कुल शांत, जैसे कुछ हुआ ही न हो। "मेरे हाथ में मशीन का कपड़ा है। मशीन तकिया-सी खड़ी है। किसी ने छुई नहीं।"
"अच्छा है। शबनम आपा?"
"गुमटी के पीछे हूँ," शबनम आपा की भारी आवाज़ आई। "चूल्हा बंद है, पर तीन लालटेनें जल रही हैं। मेरे पास रखी हैं। बोलो, कहाँ लगाऊँ?"
"पीपल के नीचे और अस्पताल की तरफ़ जाने वाले रास्ते पर।"
"ठीक।"
मीरा ने अंधेरे में कहा, "मेरा कैमरा बंद हो गया। बैटरी बची है, एक ही है।"
"बचाकर रखो," मैंने कहा। "जो आज रात होगा, वो कल के काग़ज़ से ज़्यादा बोलेगा।"
मैंने एक कदम आगे बढ़ाया और ठोकर खाकर रुका।
वही मेज़ थी — जिस पर काजल ने दो थर्मस रखे थे, शालिनी ने फाइल रखी थी, गोविंद भाई बैठे थे। मैंने हाथ बढ़ाया। उँगलियों को कुछ छुआ।
काग़ज़।
मैंने उसे उठाया। मोटा, चिकना, स्याही की गंध वाला काग़ज़। तभी पीछे से लालटेन की पीली रोशनी आई — शबनम आपा गुमटी के पीछे से लालटेन लेकर आ रही थीं।
रोशनी पड़ी तो मैंने देखा।
गली की दीवार पर, उस्ताद की दुकान के शटर पर, गुमटी के पीछे की पीली दीवार पर, स्कूल की दीवार पर — जहाँ भी जगह मिली, सफ़ेद पर्चे चिपके हुए थे।
एक जैसे। बिल्कुल एक जैसे। मशीन से छपे हुए, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में नहीं, बल्कि साफ़ टाइप किए हुए। ऊपर कोई मुहर नहीं, कोई नाम नहीं, कोई तारीख़ नहीं।
मैंने एक पर्चा उतारा। पढ़ा।
"मैंने पढ़ा," मैंने धीरे कहा। फिर ज़ोर से, "सब सुनो। ये पर्चा कहता है कि कल सुबह से नूर अस्पताल के मरीज़ों को बाहर निकाल दिया जाएगा। ज़मीन का काग़ज़ कल सुबह तक पूरा न हुआ तो मरीज़ों को कहीं और भेजना होगा।"
गली में सन्नाटा छा गया।
फिर एक आवाज़ आई — वो बूढ़ी औरत जो अपने पोते का इलाज कराने आई थी, "मेरा पोता वहाँ है! वो बुखार में है!"
"मेरी बहू!" किसी और ने कहा। "तीन महीने से वहीं है!"
"हम कहाँ जाएँगे?"
"ये किसने चिपकाया?"
"अभी तो कोई नहीं था — अभी तो हम सब यहीं खड़े थे, किसी ने चिपकाया भी तो नहीं!"
वो आख़िरी बात सही थी। और वही सबसे डरावनी थी।
मैंने लालटेन की रोशनी में पर्चे को पलटा। पीछे कुछ नहीं। सिर्फ़ एक चीज़ थी — नीचे की तरफ़, बहुत छोटे अक्षरों में, लाल स्याही में लिखी एक लाइन।
मैंने उसे पढ़ा।
और मेरे हाथ से लालटेन लेने वाली शबनम आपा ने मेरा चेहरा देखकर कहा, "क्या लिखा है?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मैंने पर्चा मोड़ा और जेब में रख लिया।
"अंकुश?" शालिनी ने कहा।
"अभी नहीं," मैंने कहा।
"क्या लिखा है?"
"मैंने कहा, अभी नहीं।"
तभी काजल की आवाज़ आई। वो मेज़ के पास से ही घूमकर दौड़ पड़ी थी — थर्मस हाथ में, जैसे उसे फेंकना भी हो और पकड़ना भी।
"अंकुश!" वो चीखी। "अस्पताल में सब बाहर आ गए हैं!"
"कौन सब?"
"मरीज़ों के परिवार! सब — सब डर गए हैं। कोई कह रहा है कि इमारत गिर जाएगी, कोई कह रहा है कि काग़ज़ रद्द हो गया। एक औरत रो रही है, बच्चे को गोद में लेकर बैठी है। डॉक्टर इसरानी सबको संभाल रहे हैं, पर उनका हाथ काँप रहा है, अंकुश। मैंने उन्होंने पहली बार देखा कि वो… वो भी डर रहे हैं।"
मैंने अपनी माँ की तरफ़ देखा। पापा का हाथ उनके कंधे पर था। माँ लालटेन की रोशनी में बैठी थीं, चेहरा पीला, गिलास अब भी हाथ में।
"माँ," मैंने कहा। "मैं अस्पताल जा रहा हूँ।"
"जा," माँ ने बिना एक पल रुके कहा। "और सुन — मरीज़ों की सबसे पहले बिस्तर नहीं, तकिया संभालना। मरीज़ को याद रहता है कि उसके सिर के नीचे कुछ था या नहीं।"
मैं एक पल के लिए रुक गया।
"आप," मैंने धीरे कहा, "इस वक़्त भी पाकशाला की बात कर रही हो।"
"पाकशाला नहीं," माँ ने कहा। "इंसान की बात कर रही हूँ। तीन महीने से जो वहाँ लेटा है, उसका सब कुछ उसी बिस्तर पर है। अगर वो उठाकर बाहर फेंक दिया गया तो ज़िंदा रहकर भी मरा हुआ लगेगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं साथ चलूँगा," पापा ने कहा। "एक काम का आदमी हूँ। दो बिस्तर खुद उठा लूँगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "आप यहीं रहिए। माँ के साथ। आपकी आज शाम की सबसे बड़ी ताक़त यही है — कि आप इनके पास खड़े हैं। अस्पताल में आप नहीं, मैं चाहिए।"
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