The Mysterious Bell – Chapter 140
"दादा का नाम," उसने दोहराया। "मैंने ये नाम बोर्ड पर पढ़ा था। माँ के संदूक में एक पुरानी तस्वीर है न — उसके पीछे लिखा है। और पापा ने एक बार मुझे बताया था कि दादा की दुकान का बोर्ड पीतल का था, और उस पर उनका नाम खुदा था।"
मैंने पट्टी को दोनों हाथों से पकड़कर ऊपर उठाया।
उस पर नाम के नीचे एक और लाइन थी, आधी टूटी हुई — दो अक्षर और फिर खाली जगह। और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, मिट्टी से भरा हुआ एक शब्द, जिसे मैंने उँगली से खुरचकर निकाला।
साइकिल।
और उसके बाद खाली जगह। और उस खाली जगह के बाद एक शब्द का आख़िरी हिस्सा, जिसे टूटे किनारे ने काट दिया था।
टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से झाँका।
"उस्ताद," उसने धीरे से कहा, "ये अस्पताल के पीछे कैसे आया?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया।
मेरे गले में चाबी लटक रही थी। वो चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह साल की उम्र में दी थी, और ये कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है।
और अब मेरे हाथ में पीतल की पट्टी थी, जिस पर मेरे दादा का नाम था — वो दादा जिनकी साइकिल मैंने मेले से खरीदी थी, वो दादा जिनकी घंटी मेरी जेब में थी, वो दादा जो पच्चीस साल पहले बुखार में चले गए थे, और जिनकी दवा देर से आई थी।
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने पट्टी को अपने सीने से लगा लिया, जैसे कोई बच्चा गिरी हुई चीज़ को छिपाने की कोशिश करता है।
और पीछे, अस्पताल की पहली मंज़िल की खिड़की से, डॉक्टर इसरानी खड़े थे। उन्होंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस अपना टूटा चश्मा उतारा और दीवार पर टँगी अपनी बीवी की तस्वीर की तरफ़ देखने लगे।
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
"अंकुश," उसने कहा, और इस बार वो मुझे उस्ताद नहीं बोली, "पापा को फ़ोन करना है।"
"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी। "पापा को फ़ोन नहीं करना है। पापा को आना है। और वो अपने आप आएँगे, जब वक़्त होगा।"
"तू क्या कह रहा है?"
मैंने पट्टी को उठाया और सूरज की तरफ़ किया। रोशनी उस पर पड़ी और वो अक्षर चमक उठे, जैसे पच्चीस साल बाद किसी ने उन्हें जगा दिया हो।
"मैं ये कह रहा हूँ," मैंने कहा, "कि ये पट्टी यहाँ अपने आप नहीं आई। इसे यहाँ कोई लाया है, और वो कोई भी हो, उसे पता है कि ये हमारे लिए कितनी बड़ी चीज़ है।"
"तो?"
"तो ये धमकी है," मैंने कहा। "ये कह रहे हैं — तेरे पास जो भी है, वो हमारे पास है। तेरे दादा का नाम भी हमारे पास है, तेरे पापा का अंगूठा भी, और तेरी घंटी वाला राज़ भी।"
काजल की आँख से एक आँसू निकला और उसने उसे पोंछा नहीं — उसने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "उस्ताद, तेरी जेब में जो है, उससे पूछ। अब तो पूछ।"
मैंने जेब से घंटी निकाली।
हथेली पर रखी। उसे सूरज की रोशनी में रखा, और वो पीतल जैसी चमकी, वैसी ही चमक, वैसा ही रंग, जैसा हाथ में पकड़ी पट्टी का था।
"बोल," मैंने धीरे से कहा।
घंटी चुप रही।
"बोल," मैंने फिर कहा, और इस बार मेरी आवाज़ में वो चीज़ आई जो मैं छिपाना चाहता था। "कुछ बोल। पूरे दिन चुप रही है, अब बोल।"
बच्चे पीछे खड़े साँस रोककर देख रहे थे। टिंकू ने मेरी बाँह छुई और फिर छोड़ दी।
और तब घंटी ठंडी हुई। बहुत ठंडी, बर्फ़ जैसी नहीं, पर उस ठंड से ज़्यादा ठंडी जो पीतल में होती है जब वो किसी पुरानी जगह से निकलता है।
और उसने कहा, एक छोटा वाक्य, इतनी धीमी आवाज़ में कि मुझे लगा वो मेरी हड्डियों से बोली —
"ये टुकड़ा नहीं है। ये ताले का मुँह है।"
मैंने पट्टी को गौर से देखा।
और तब मैंने वो देखा जो पहले नहीं देखा था — पट्टी का टूटा किनारा, और उसके नीचे, पीतल के भीतर, एक छोटा सा छेद। नाम के नीचे। ऐसा छेद जिसमें कोई सालों से कुछ घुसाया जाता रहा हो।
मैंने अपने गले से चाबी निकाली।
चाबी वैसी ही पीली थी। पुरानी, घिसी हुई, एक तरफ़ हल्की मुड़ी हुई।
मैंने उसे छेद के पास लाया।
हाथ काँप रहे थे। काजल ने मेरा हाथ सहारा दिया, और टिंकू ने मेरी कमर पकड़ ली, जैसे मैं गिरने वाला हूँ।
मैंने चाबी अंदर डाली।
और वो तीन चौथाई तक अंदर गई, फिर रुक गई — ठीक उतनी ही, जितनी कोई पच्चीस साल से अंदर जाती रही हो। चिकनी, बिना ज़ंग के, जैसे किसी ने उसे रोज़ चलाया हो।
काजल ने फुसफुसाकर कहा, "ये ताले की चाबी है।"
"हाँ," मैंने कहा।
"तो ताला कहाँ है?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
उसके चेहरे पर वही सवाल था जो मेरे सीने में ठोकर मार रहा था — कि ताला कहाँ है, कि ये पट्टी किस ताले के दरवाज़े से निकली है, कि दादा की दुकान कहाँ थी, कि पीछे की गली में उस्ताद अली बक्श की उस पुरानी दुकान के नीले दरवाज़े पर लगा ज़ंग लगा ताला किसका था।
मैंने चाबी बाहर निकाली और उसे गले में वापस डाल दिया।
फिर मैंने पट्टी को अपनी जेब में रखा, और काजल की तरफ़ देखा, और टिंकू की तरफ़, और सानिया की तरफ़, और गुड्डू और रफ़ीक़ की तरफ़।
"सब सुनो," मैंने कहा। "अभी यहाँ से कोई किसी को एक शब्द नहीं बोलेगा। न माँ को, न पापा को, न उस्ताद को, न मीरा को।"
"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "पर ये तो बड़ी बात है —"
"हाँ," मैंने कहा। "इसीलिए अभी नहीं। जो आदमी इस पट्टी को यहाँ गाड़कर गया है, वो ये देखना चाहता है कि हम क्या करते हैं। हम अभी कुछ नहीं करेंगे। हम सिर्फ़ उसका इंतज़ार करेंगे।"
"कब तक?"
मैंने अस्पताल की दीवार की तरफ़ देखा। पीली दीवार, उखड़ी ईंटें, और बगल में गड्ढा।
"दो दिन," मैंने कहा। "मशीन सुबह सात बजे आने वाली है। तब तक हम तैयार रहेंगे।"
और मेरी जेब में घंटी, जो पूरे दिन चुप थी, बहुत धीरे से फिर बोली, इतनी धीरे से कि सिर्फ़ मैं सुन सका —
"अब वो मिल गया जिसका ताला तेरे गले में है।"
॥
मैंने पट्टी जेब में डाली और वहीं, अस्पताल की पीली दीवार के नीचे, मिट्टी के उस गड्ढे के किनारे खड़े-खड़े घंटी को हथेली पर रखकर फिर पूछा।
"अब बता। ये ताला किस चीज़ का है। और वो काग़ज़, जिस पर दादा का नाम है, कहाँ है।"
बच्चे मेरे पीछे खड़े थे। टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी हुई थी, सानिया ने गुड्डू का कंधा दबा रखा था, और रफ़ीक़ अपने होठ काट रहा था, जैसे उसे भी कुछ बोलना है पर डर है कि बोलेगा तो सब बिगड़ जाएगा।
घंटी चुप रही।
फिर बोली, धीमे से, जैसे कोई पुराना आदमी सीढ़ी उतरते-उतरते एक-एक कदम गिन रहा हो।
"पुरानी परत। सत्तर अंक।"
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
"सत्तर?" मैंने कहा। "तूने अभी कहा कि अब ताले की बारी है। और अब कहती है सत्तर अंक?"
"परत खोलनी है तो कीमत लगेगी," घंटी बोली। "मुफ़्त में सिर्फ़ चुप्पी मिलती है।"
"ये तीसरा सच नहीं है?" मैंने पूछा। "ये वही नहीं जो पीपल के नीचे बाकी है?"
"पीपल के नीचे वाला सच लोगों का है," घंटी बोली। "ये सच पत्थर का है। पत्थर की कोई ज़ुबान नहीं होती, इसलिए उसे खोलना पड़ता है।"
मैंने गड्ढे की तरफ़ देखा।
मिट्टी ताज़ी थी। जिस आदमी ने ये पट्टी यहाँ गाड़ी थी, उसने ऊपर से पैर भी नहीं पोंछा था। दो दिन पहले की बारिश की नमी अंदर तक बैठी थी, और गड्ढे के किनारे नीचे से पीली मिट्टी बाहर आई थी, ऐसी पीली जैसे दीवार का रंग। मुझे लगा जैसे दीवार ने अपना ही कोई हिस्सा उगल दिया हो।
"उस्ताद," टिंकू ने धीरे से कहा। "सत्तर अंक मतलब हमारे पास बहुत कम बचेंगे।"
"हाँ," मैंने कहा। "बहुत कम बचेंगे।"
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