The Mysterious Bell – Chapter 139
"उसी सुबह पीछे के प्लॉट में गड्ढा खुदा मिला।"
मैंने खिड़की के काँच में अपना चेहरा देखा।
"कितना बड़ा गड्ढा?"
"उतना बड़ा नहीं," डॉक्टर ने कहा। "पर उसकी जगह ऐसी थी कि मुझे रात को नींद नहीं आई।"
"कहाँ?"
डॉक्टर साहब उठे। उन्होंने कुर्सी पीछे खिसकाई, और उसकी टाँग फर्श पर चरचराई। फिर वो खिड़की के पास आए, मेरे बगल में खड़े हुए, और उन्होंने उँगली बाहर की तरफ़ की।
"देख," उन्होंने कहा, "अस्पताल की पिछली दीवार के ठीक उस कोने में, जहाँ से ईंटें उखड़ी हुई हैं। जहाँ से बरसात का पानी रिसता है।"
मैंने देखा।
नीचे पीछे के प्लॉट में मिट्टी का ढेर पड़ा था। मिट्टी गीली थी, हाल की थी, और उसके इर्द-गिर्द ईंटें रखी थीं।
"वहाँ तो पहले से ही ढेर था," मैंने कहा।
"हाँ, था," उन्होंने कहा। "पर ये ढेर उस ढेर से अलग है। ये दीवार के नीचे से निकली मिट्टी है, ऊपर से नहीं आई।"
काजल मेरे पास आ गई। उसने भी बाहर झाँका।
"डॉक्टर साहब," उसने कहा, "आपने किसी से पूछा नहीं?"
"पूछा," उन्होंने कहा। "चौकीदार से पूछा। वो कहता है कि रात को उसे कुछ सुनाई नहीं दिया। वो कहता है कि उस रात उसे नींद की गोली की तरह नींद आई थी — अपने आप।"
"अपने आप," मैंने धीरे से दोहराया।
"तीस साल में वो आदमी कभी अपने आप नहीं सोया," डॉक्टर ने कहा। "हमेशा वो दो बजे उठकर चारों तरफ़ एक चक्कर लगाता है। उस रात नहीं लगाया।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को बाहर निकाला। लोग कहते हैं कि घंटी बजाने से कुछ होता है। मेरे लिए बजाने की ज़रूरत नहीं थी। मैंने बस उसे हथेली में पकड़ा और उँगली उसके ठंडे पीतल पर रख दी।
कुछ नहीं हुआ।
और यही सबसे बड़ी बात थी।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आप ऊपर रहिए। मैं नीचे जाता हूँ।"
"अंकुश —"
"आप मना मत कीजिए," मैंने कहा। "आपने खुद कहा था कि पोस्टर लगने देना भी उसी हिसाब का हिस्सा है। तो ये भी उसी हिसाब का हिस्सा है।"
डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। काजल ने अपना सफ़ेद कोट सीधा किया।
"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।
"तू ऊपर रुक, माँ के पास।"
"माँ सो रही हैं। और उनके पास अभी कोई और बैठा है — शाहिद। वो उन्हें देख रहा है।"
"शाहिद को तूने बिठाया?"
"नहीं," उसने कहा, "उसने खुद कहा — चाची जी के पास मैं बैठूँगा, आप जाइए।"
मैंने कुछ नहीं कहा। मेरे सीने में एक अजीब सी गरमाहट हुई। कल का वो लड़का, जो पक्की नौकरी के लिए काग़ज़ छिपा रहा था, आज मेरी माँ के बिस्तर के पास बैठा है और मुझे कह रहा है कि आप जाइए।
गली का हिसाब कभी काग़ज़ों में नहीं बैठता। वो हिसाब सीने में बैठता है, और वहाँ से कोई उसे मिटा नहीं सकता।
नीचे उतरते वक़्त सीढ़ियों के पास की खिड़की से गेट दिख रहा था। सफ़ेद गाड़ी वहाँ नहीं थी। नीम के पेड़ के नीचे सिर्फ़ एक बूढ़ा आदमी बैठा था, अपनी लाठी पर झुका हुआ, और पास में एक साइकिल खड़ी थी।
"उस्ताद," काजल ने कहा, "तूने सानिया को बुलाया?"
"नहीं," मैंने कहा। "पर बच्चे इन बातों के बिना नहीं रहते।"
सच यह था कि सानिया गेट के बाहर खड़ी थी।
मैंने उसे देखा तो वो दौड़कर आई। उसके हाथ में लाल कवर की कॉपी थी, जिसमें वो ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती है।
"उस्ताद," उसने कहा, "तीन ट्रक। पुराने बिजलीघर की तरफ़ से। उन्होंने मिट्टी डाली और वापस गए।"
"मिट्टी?"
"हाँ। और एक ट्रक पर मशीन का हिस्सा था — लोहे का बड़ा सा।"
मैंने उसकी कॉपी की तरफ़ देखा।
"कितने बजे?"
"सुबह छह बजे के आस-पास। मैं स्कूल जाते वक़्त देख रही थी। फिर गुड्डू ने भी देखा, रफ़ीक़ ने भी। और चिंटू ने कहा कि उसने अस्पताल के पीछे गड्ढा भी देखा।"
मैं रुका।
"चिंटू कहाँ है?"
"वहीं पीछे," सानिया ने कहा। "वो कह रहा है कि मिट्टी में कुछ चमक रहा है।"
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
और उसके बाद हम दोनों एक साथ चले, बिना कुछ बोले, जैसे दोनों को एक ही आवाज़ ने बुलाया हो।
अस्पताल के पीछे वाला प्लॉट वैसा ही था — उजाड़, टूटी ईंटों का ढेर, एक कोने में सूखा पीपल का पत्ता, और दूसरे कोने में बिना ढकी सीमेंट की बोरियाँ, जिन पर नमी की सफ़ेद फफूँद आ गई थी। ज़मीन पर पीली पट्टी बँधी थी, वो पट्टी जो रणवीर के लोगों ने दी थी, और उस पट्टी के आगे एक पुरानी फावड़ी पड़ी थी।
चिंटू वहीं घुटनों के बल बैठा था।
गुड्डू और रफ़ीक़ दोनों उसके पीछे खड़े थे, और टिंकू सबसे आख़िर में — मेरी दुकान का टिंकू, जिसके घुटने पर पट्टी थी और जिसकी आँखों में वो तेज़ी थी जो सिर्फ़ उन बच्चों की आँखों में होती है जिन्होंने कम उम्र में ज़्यादा देख लिया है।
"उस्ताद," चिंटू ने कहा, "आओ। यहाँ।"
"क्या है?"
"देखो।"
मैंने झुककर देखा।
गड्ढा छोटा था — दो हाथ गहरा, तीन हाथ चौड़ा। उसका एक किनारा दीवार के नीचे तक घुसा हुआ था, जैसे किसी ने दीवार को सहारा देने वाली नींव की ईंटें ढूँढी हों। मिट्टी गीली थी, और उसके ऊपर ट्रक के पहियों के निशान साफ़ थे — मोटे, गहरे, एक-दूसरे से जुड़े हुए, जैसे किसी बड़े जानवर ने रेंगकर रास्ता बनाया हो।
"ये पीतल है," चिंटू ने उँगली से दिखाया।
मिट्टी के बीच से कुछ झाँक रहा था। हल्का पीला, हरा-भूरा, जैसे राख के नीचे से कोई चीज़ झाँकती है।
मेरा दिल एक बार ज़ोर से धड़का।
"हाथ मत लगाओ," मैंने कहा, और मैं खुद घुटनों के बल बैठ गया।
टिंकू ने झट से अपनी जेब से एक पुराना काग़ज़ निकाला — वो काग़ज़ जिसमें माँ ने उसके लिए कुछ रखा था — और मिट्टी हटाने के लिए आगे कर दिया। मैंने उसे हाथ से रोक दिया और अपने हाथ से मिट्टी हटाने लगा।
मिट्टी ठंडी थी। उसमें वो गंध थी जो बरसात के तीन दिन बाद आती है — सड़ी जड़ और गीली ईंट की। मेरी उँगलियों में मिट्टी भर गई, ग्रीस के पुराने निशानों के ऊपर नया मिट्टी का नक्शा बन गया।
पहले मुझे किनारा मिला। फिर ऊपर का हिस्सा। फिर वो पूरी चीज़ मेरी हथेली में आ गई, और वो जितनी छोटी दिख रही थी, उतनी भारी थी।
पीतल की पट्टी। मोटी, आधी टूटी, किनारे से एक कोना गायब। ऊपर हरी परत जमी थी, और उस पर उभरे हुए अक्षर — खुदे हुए नहीं, ढाले हुए, जैसे पुराने बोर्ड पर होते हैं।
"उस्ताद," काजल ने कहा, "क्या है?"
"रुक," मैंने कहा।
मैंने पट्टी को अपनी कमीज़ से पोंछा। एक बार, दो बार, तीन बार। हरी परत उतरने लगी, और नीचे पीतल का साफ़ चमकता रंग आने लगा।
पहला अक्षर उभरा।
दूसरा।
फिर एक पूरा शब्द।
मैंने बिना सोचे, जैसे कोई काग़ज़ पढ़ते हुए ज़ोर से पढ़ देता है, पढ़ दिया —
"जगदीश यादव।"
और काजल, जो मेरे पीछे खड़ी थी और जो अभी कुछ कह रही थी — "उस्ताद, ये तो कोई पुराना…" — उसकी आवाज़ बीच में ही रुक गई।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
काजल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उसके होंठ खुले रह गए, और वो अपने सफ़ेद कोट की जेब में हाथ डालकर खड़ी थी, जैसे कहीं गिरने से पहले सहारा ढूँढ रही हो।
"काजल?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, और उसकी आवाज़ जब निकली तो ऐसी निकली जैसे किसी ने गले में कुछ फँसा दिया हो।
"ये… ये तो दादा का नाम है।"
मेरे हाथ से पीतल की पट्टी फिसलने लगी। मैंने उसे कसकर पकड़ लिया।
"क्या?"
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