The Mysterious Bell – Chapter 138
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और हल्का सा मुस्कुराए। वो मुस्कुराहट उनके चेहरे पर बैठी नहीं।
"दवा बदलनी है, अंकुश," उन्होंने कहा। "पुरानी दवा भी चलेगी, पर एक नई दवा जुड़ेगी — सूजन के लिए। उससे आराम ज़्यादा होगा, कमीज़ भी कम आएगी, और रात की साँस फूलने की शिकायत भी कम होगी।"
"तो खुशखबरी है," मैंने कहा। "फिर आपका चेहरा ऐसा क्यों है जैसे बोर्ड टँगा हो और बोर्ड पर लिखा हो — बकाया?"
डॉक्टर साहब ने हाथ मेज़ पर रख दिए।
"क्योंकि नई दवा के कार्टन दो महीने के आए हैं," उन्होंने कहा। "कंपनी ने सैंपल भेजे हैं, दो महीने के लिए। उसके बाद वो दवा बाज़ार में आ जाएगी, और खरीदनी पड़ेगी।"
मैं चुप हो गया।
"कितने का?"
"महीने का हिसाब बैठाऊँ?" उन्होंने कहा, और मेज़ पर पड़ी एक पर्ची उठा ली, फिर तुरंत रख दी। "नहीं, बैठाऊँगा नहीं। जब तक सैंपल चलेंगे, तब तक तो कोई किराया नहीं। और उन दो महीनों में हम रास्ता निकाल लेंगे।"
"अगर रास्ता न निकले तो?"
"तो मैं उस वक़्त बात करूँगा," उन्होंने कहा। "आज रात आठ बजे मैं उसी बात की चिंता नहीं करने वाला। आज रात मुझे कुछ और देखना है।"
काजल ने कहा, "डॉक्टर साहब, दो जाँच और हैं।"
"हाँ। एक फिर से खून की, एक साँस की। सुबह सात बजे भेज देंगे।"
"दोनों की रिपोर्ट कब?"
"कल शाम," डॉक्टर ने कहा। "और मैं तुम दोनों से एक बात साफ़ कह देना चाहता हूँ। मैं माँ को झूठी तसल्ली नहीं दूँगा। वो वैसी औरत हैं जिन्होंने अपनी हालत तीन महीने छिपाकर रखी। ऐसे लोगों को तसल्ली नहीं, सच चाहिए।"
मैंने कुर्सी पर पीछे टेक लगाई। कमरे में पुरानी दवा की गंध थी, और उसके नीचे एक और गंध — गीली दीवार की, बारिश के बाद की।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आपने कहा था कि माँ ने आपको कोई बात बताई है।"
वो रुके। उन्होंने काग़ज़ों के ढेर को उँगली से एक तरफ़ सरकाया, फिर दूसरी तरफ़, जैसे उन्हें कुछ ढूँढना हो और पता हो कि नहीं मिलेगा।
"सात सौ इकहत्तर रुपये," उन्होंने कहा। "लिफ़ाफ़े में। माँ ने मुझे रात में बताया, जब वार्ड में सब सो गए थे। उन्होंने कहा — डॉक्टर साहब, जाँच में कुछ निकले तो वो पैसे काम आएँगे।"
मेरा गला सूख गया।
"मुझे नहीं बताया," मैंने कहा। "उन्होंने आपको बताया, मुझे नहीं।"
"हाँ।"
"क्यों?"
डॉक्टर साहब ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर टालने वाली नहीं।
"क्योंकि उन्होंने कहा — ये पैसे काजल को देना, अंकुश को नहीं। और मैंने पूछा क्यों, तो वो बोलीं — क्योंकि अंकुश इन पैसों को लेकर कुछ और बेच देगा, और मैं ये नहीं चाहती।"
कमरे में चुप्पी बैठ गई। काजल ने मेरी तरफ़ नहीं देखा। वो दीवार पर टँगी तस्वीर की तरफ़ देखती रही।
मैं मुस्कुराया। मुझे मुस्कुराना पड़ता है, जब कुछ लगता है। ये मेरी आदत है, और ये आदत मेरे साथ बड़ी हुई है, माँ के हाथ की रोटी की तरह।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "ये भी तो देखिए। माँ मुझे तीन महीने से कह रही हैं कि मैं तेरी दुकान का हिसाब देख, और वो खुद मेरे पीछे काग़ज़ छिपाकर डॉक्टर को दे रही हैं। वाह। क्या परिवार है। मेरी बहन सफ़ेद कोट पहनकर मुझे घूर रही है, मेरी माँ डॉक्टर से मेरी निंदा कर रही है, और मेरे पापा घर पर बैठे हैं — वो चुप हैं, लेकिन उनका चुप रहना भी एक तरह की राय है।"
डॉक्टर साहब हँसे। इस बार हँसी सच्ची थी।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तेरी माँ ने मुझे भी एक बात कही थी।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा — मेरे बेटे की ज़ुबान के नीचे एक और आदमी बैठा है, जो हँसी में सब दबा देता है। उसे लगता है कि अगर वो हँसेगा नहीं, तो सब रो पड़ेंगे।"
मैं कुर्सी पर सीधा बैठ गया।
"ये माँ ने कहा?"
"हाँ। और उन्होंने यह भी कहा — उससे मत बोलना कि मैंने कहा है।"
"तो आप बोल रहे हैं।"
"क्योंकि मैं डॉक्टर हूँ, भगवान नहीं," उन्होंने कहा, "और मेरे पास इस वक़्त माँ को ठीक करने की दवा है, तुझे ठीक करने की नहीं।"
काजल ने तब कहा — "डॉक्टर साहब, वो लिफ़ाफ़ा?"
"वो मैंने खुद नहीं छुआ," उन्होंने कहा। "जब माँ ने बताया, मैंने कहा कि ये तुम्हारा है, तुम्हीं रखो। वो लिफ़ाफ़ा उनकी कॉपी के पीछे है। और मेरी बात साफ़ है — वो काजल को दिया जाएगा। जिस दिन ज़रूरत पड़ेगी, काजल के हाथ में जाएगा।"
काजल ने एक बार मेरी तरफ़ देखा, फिर तुरंत नज़र नीचे कर ली।
"क्यों?" मैंने पूछा। "मैं बड़ा हूँ, मैं कमाता हूँ —"
"नहीं, तू बड़ा नहीं है," काजल ने कहा। "तू सबसे बड़ा दिखता है। तेरे सिर पर सबसे ज़्यादा बोझ है और तू सबसे ज़्यादा मज़ाक करता है। माँ ने गलत नहीं किया।"
मैंने हाथ उठाकर हार मान ली।
"ठीक है," मैंने कहा। "ठीक है। मैं हार गया। पर एक बात सुन लो।"
"क्या?"
"वो सात सौ इकहत्तर रुपये मैं नहीं खाऊँगा।"
"कौन कह रहा है तू खाएगा," काजल ने कहा। "तू वो नहीं खा सकता। तू तो अपनी दुकान के पैसे भी नहीं खाता — वो सीधे टिंकू की पेंसिल और मेरी किताबों में चले जाते हैं।"
डॉक्टर साहब हँसे, और हँसते हुए उन्होंने पानी का गिलास उठाया, हिलाया, फिर रख दिया।
मैंने हल्का सा मज़ाक करने की सोची। मुझे नहीं पता क्यों, पर जब भी कमरा भारी होता है, मेरी ज़ुबान हल्का करने पर उतर आती है।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, "आपकी घड़ी भी मेरे यहाँ से ठीक हुई थी। याद है? पिछली बार। इसलिए बिल में थोड़ी छूट चलेगी। दो-चार रुपये नहीं, थोड़ी अच्छी छूट।"
काजल ने मुझे घूरा। वो घूरना उसने माँ से सीखा है — आँखों से, बिना पलक झपकाए, जैसे दीवार पर कील ठोंक रही हो।
डॉक्टर साहब ने कहा, "छूट चलेगी।"
"सच?"
"हाँ। पर एक शर्त पर।"
"बोलिए।"
"तेरे हाथ में जो चाबी है, उसे आज रात ताले में लगाने से पहले सोच लेना कि उस ताले के पीछे क्या है।"
मैं रुक गया।
"आपको कैसे पता कि ये चाबी किसी ताले की है?" मैंने पूछा।
डॉक्टर साहब ने तस्वीर की तरफ़ देखा।
"क्योंकि मेरी बीवी के पास भी एक चाबी थी," उन्होंने कहा, "और वो कहती थी कि जिस ताले की चाबी गले में लटकती है, वो ताला कभी पूरा बंद नहीं होता।"
और मेरी जेब में घंटी चुप रही।
न ठंडी हुई, न गरम। न कुछ बोली।
मैंने जेब में हाथ डालकर उसे छुआ। वो बस पड़ी थी। जैसे किसी ने उसे अभी उठाया ही न हो।
मुझे ये चुप्पी सबसे ज़्यादा डराती है। घंटी जब बोलती है, तब भी डर लगता है, पर जब वो चुप हो जाती है, तब ऐसा लगता है कि कोई मेरे कंधे के पीछे खड़ा है और जानबूझकर साँस नहीं ले रहा।
मैं उठा, कमरे में दो कदम चला और खिड़की के पास पहुँचा। बाहर अस्पताल का गेट दिख रहा था, नीम का पेड़, और उसके नीचे पान की पीक का पुराना निशान।
और तभी मेरी नज़र दीवार पर पड़ी।
वही पोस्टर। चमकदार, नया, पीली दीवार पर चिपकाया हुआ। रणवीर भारद्वाज हाथ जोड़े, सफ़ेद कपड़े, साफ़ कटा हुआ चेहरा, और नीचे बड़े अक्षरों में लिखा था — नई शुरुआत, नए सपने।
मैंने काजल की तरफ़ देखा।
"ये कब लगा?"
काजल ने कंधे उठाए।
डॉक्टर साहब ने कहा, "मैंने नहीं लगाया।"
"किसी ने लगाया तो होगा।"
"हाँ," उन्होंने कहा। "पर मुझे नहीं पता किसने। तीन दिन पहले जब मैं सुबह आया, ये यहीं लगा मिला। और उसी सुबह —"
वो रुके।
"उसी सुबह क्या?"
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