The Mysterious Bell – Chapter 137
उसने खींचा। पहिया चरचराया। वो आवाज़ — ठीक वैसी, जैसी उस रात पत्थर के टैंक के पास बॉल बियरिंग की आवाज़ आई थी, जब मैंने पहली बार सोचा था कि भूत है। मैं मुस्कुरा दिया। कितना बेवकूफ़ था मैं उस रात। और कितना अच्छा लग रहा है आज वही आवाज़ सुनकर।
मैंने पहिये का ढक्कन खोला। चरचराती बियरिंग उसमें बैठी थी, जंग खाई हुई, दाने टूटे हुए।
"रज्जो बाई," मैंने कहा, "दो मिनट पानी ले आइए।"
वो भागीं। लाईं। मैंने ढक्कन साफ़ किया, अंदर जमी जंग को आराम से निकाला, नई बियरिंग डाली, हल्का तेल डाला, और ढक्कन बंद करके पहिये को घुमाया।
पहिया घूमा।
एक बार। दो बार। तीन बार। बिना आवाज़। बिना चरचराहट। बिना किसी रुकावट के।
शाहिद ने देखा और उसकी साँस रुक गई।
"पापा," उसने कहा, "देखिए। बिल्कुल चुप है।"
और यूसुफ़ मियाँ ने, पहली बार, मुझे नहीं पता कितने सालों में, हँसा।
वो हँसी अजीब थी — टूटी हुई, फूटी हुई, जैसे कोई पुरानी मशीन चलना भूल गई हो और अचानक चल पड़े। पहले उनका गला हिला, फिर कंधे, फिर आँखों से पानी आया, और वो हँसते रहे, बस थोड़ी देर।
"मिस्त्री हो कि जादूगर," उन्होंने कहा।
"मिस्त्री," मैंने कहा। "जादूगर होता तो पहले अपना हिसाब ठीक कर लेता।"
काजल ने दरवाज़े से कहा, "उस्ताद, बाहर बच्चे खड़े हैं। सानिया कह रही है कि गली से तीन ट्रक आए हैं।"
"कहाँ से?"
"पुराने बिजलीघर की तरफ़ से।"
मेरा चेहरा सख़्त हो गया।
"दो दिन," मैंने धीरे से कहा। "मशीन सुबह सात बजे।"
"उस्ताद," शाहिद ने कहा, "अब क्या?"
"अब कुछ नहीं," मैंने कहा। "अब मैं तेरे पापा से एक बात पूछने जा रहा हूँ, और ये बात मुझे किसी काग़ज़ से नहीं, किसी दफ़्तर से नहीं, इन्हीं से पूछनी है।"
मैं यूसुफ़ मियाँ के बिस्तर के पास गया और उनके सामने बैठ गया।
"यूसुफ़ मियाँ," मैंने कहा, "जो आदमी उस रात सफ़ेद कुर्ते में आया था, उसने आपको काग़ज़ दिया। आपने उसे देखा। आपने उसे छुआ। आपने बेटे को पढ़ने को दिया।"
"हाँ," उन्होंने कहा।
"उस काग़ज़ पर क्या था? असली पर।"
यूसुफ़ मियाँ ने आँखें बंद कर लीं। उनकी साँस फिर भारी हुई, पर इस बार शाहिद ने उनका हाथ पकड़ा हुआ था, और मैंने देखा कि साँस की भारीपन की आवाज़ थोड़ी कम हो गई।
"कुछ लिखा नहीं था," उन्होंने कहा। "मुझे पढ़ना भी नहीं आता। मैंने सिर्फ़ मोहर देखी — नीली गोल मोहर। और उसके नीचे लिखा था कि मुफ़्त इलाज। मैंने सोचा, मुफ़्त का तो कोई नुक़सान नहीं।"
"आपने अंगूठा नहीं लगाया?"
"नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब मैंने उँगली उस काग़ज़ पर रखी," यूसुफ़ मियाँ ने कहा, "तो मुझे अपने पापा की याद आई। वो भी कभी इसी तरह एक काग़ज़ पर उँगली रखते थे, और फिर ज़मीन चली गई थी।"
कमरा चुप।
मैंने उनकी तरफ़ देखा और मुझे लगा कि मुझे कुछ कहना चाहिए, पर कुछ नहीं आया।
मैं उठने लगा। मेरा हाथ उनकी चादर पर था।
और तभी यूसुफ़ मियाँ ने मेरी कलाई पकड़ ली।
बहुत ज़ोर से नहीं। बहुत धीरे से। उतने धीरे से जैसे कोई बोलने से पहले सोच रहा हो कि बोलूँ या नहीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
"हाँ?"
वो रुके। उन्होंने शाहिद की तरफ़ देखा, फिर खिड़की की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
"अगर तुझे असली काग़ज़ चाहिए," उन्होंने बहुत धीमे से कहा, "तो वो यहाँ नहीं है।"
मैंने साँस भी नहीं ली।
"चंद्रेश के दफ़्तर में भी नहीं है," उन्होंने कहा। "डॉक्टर साहब के पास भी नहीं है।"
"तो कहाँ है?"
यूसुफ़ मियाँ ने मेरी कलाई और कसकर पकड़ ली। उनके हाथ की हड्डियाँ मेरी कलाई पर चुभीं। उनकी आवाज़ में वो चीज़ आई जो सिर्फ़ उन आदमियों की आवाज़ में आती है जिन्होंने ज़िंदगी में कुछ ऐसा देखा है जो वो भूलना चाहते हैं और भूल नहीं पाते।
"वो उस ताले में है," उन्होंने कहा, "जो डॉक्टर साहब के पास नहीं था।"
मेरा गला सूख गया।
"किसके पास था?"
और यूसुफ़ मियाँ ने जो कहा, उससे कमरे की हवा जम गई।
"तेरे दादा के पास था।"
मैं वहीं बैठा रह गया। पहिये से तेल की बू आ रही थी। हाथ में चाबी लटक रही थी, वो चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह साल की उम्र में दी थी और ये कभी नहीं बताया कि किस चीज़ की है।
और मेरी जेब में घंटी, बहुत धीरे से, इतनी धीरे से कि जैसे मेरे कान में ही बोल रही हो, कह गई —
"अब ताले की बारी।"
॥
काजल ने मेरा हाथ पकड़कर खींचा, और मैं यूसुफ़ मियाँ के बिस्तर के पास से उठ गया।
"बाहर चल," उसने धीरे से कहा। "डॉक्टर साहब बुला रहे हैं। माँ की नई दवा के बारे में बात करनी है।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। यूसुफ़ मियाँ की आँखें बंद थीं, होंठ हिल रहे थे, और शाहिद उनका हाथ पकड़े बैठा था, ऐसे जैसे कोई रस्सी पकड़कर किसी को कुएँ में गिरने से रोक रहा हो।
मेरे गले में चाबी लटक रही थी। मैंने उसे उँगली पर लपेट लिया और जेब में रख लिया।
"डॉक्टर साहब का कमरा ऊपर है," काजल ने कहा। "सीढ़ियों के पास वाला।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "मैं तेरे अस्पताल में नया नहीं हूँ, बहन।"
"तो फिर सीढ़ी से चढ़ते वक़्त हाथ का सहारा सीढ़ी की रेलिंग पर रख, मेरी कमर पर नहीं।"
"मैंने कब कहा —"
"तू मुँह से कुछ नहीं कहता," उसने कहा, "और हाथ खुद-ब-खुद काम कर जाता है।"
मैं हँस पड़ा। दिन भर में पहली बार हँसा, और वो हँसी भी आधी ही निकली, क्योंकि सीढ़ियों पर डॉक्टर इसरानी का सफ़ेद कोट एक झलक दिखाकर गुज़र गया, और उसकी आवाज़ आई — "अंकुश, तीन मिनट, ऊपर आ जाओ।"
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसके माथे पर वो सिलवट आ चुकी थी, जो माँ के माथे पर आती है, जब वो बिना बोले कह देती हैं कि कुछ गड़बड़ है।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"कुछ नहीं," उसने कहा। "बस डॉक्टर साहब का चेहरा देख।"
"चेहरा?"
"हाँ, उस्ताद। चेहरा। तेरी दुकान के बोर्ड जैसा — टेढ़ा टँगा हुआ।"
डॉक्टर इसरानी का कमरा वैसा ही था जैसा आठ महीने पहले देखा था। मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर, एक गिलास आधा पानी भरा, उसके नीचे छल्ले का निशान लकड़ी पर बना हुआ, टूटा चश्मा एक कोने में, और दीवार पर वो तस्वीर — बिना तारीख़ वाली। औरत का सफ़ेद कोट, आँखें हँसती हुई, माथे पर छोटी सी बिंदी।
तीस साल से वही तस्वीर वहीं टँगी थी। डॉक्टर ने कभी नहीं बदली।
"बैठो," उन्होंने कहा, और खुद काग़ज़ों के ढेर के पीछे कुर्सी खींचकर बैठे। उनकी उम्र साठ के पार थी और हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप लिपटा पड़ा था, जिसकी रबर नली पर सालों पहले टेप चढ़ाया गया था।
काजल खड़ी रही।
"तू भी बैठ," मैंने कहा।
"मैं खड़ी रहूँगी," उसने कहा। "मैं अब इस अस्पताल की तरफ़ से बैठी हूँ, तेरी तरफ़ से नहीं।"
मैंने उसे देखा। सफ़ेद कोट उस पर ढीला था, आस्तीन मोड़नी पड़ी थी, और गले में स्टेथोस्कोप ऐसे लटक रहा था जैसे कोई बच्चा माँ का दुपट्टा ओढ़कर शेर बन गया हो।
"अँगूठा मत दबा," मैंने धीरे से कहा।
"चुप कर," उसने कहा, पर आधी आवाज़ में।
डॉक्टर साहब ने चश्मा पहना, फिर उतारा, फिर मेज़ पर रख दिया और बिना चश्मे के ही बोलने लगे, जैसे अब उन्हें साफ़ दिखने की ज़रूरत नहीं, सिर्फ़ कहने की है।
"माँ की साँस अब ठीक है," उन्होंने कहा। "होंठ का नीलापन काफ़ी उतर गया है। खाँसी भी अपनी जगह है, बिगड़ी नहीं।"
"तो ठीक है," मैंने कहा। "तो फिर कमरा क्यों खाली है? आप काग़ज़ों का पहाड़ इसलिए बनाते हैं ताकि सीधी ख़बर छिपी रहे?"
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