The Mysterious Bell136 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 136

7 min read November 5, 2026

"क्योंकि मैं अभी मरम्मत कर रहा हूँ," मैंने कहा। "और जो आदमी मरम्मत करता है, वो मरम्मत के वक़्त झूठ नहीं बोल सकता। मेरे लिए ये नियम है। अगर मैंने झूठ बोला, तो मेरा सारा हिसाब शून्य हो जाएगा। इसलिए मैं तुझे सच बताऊँगा, चाहे वो कड़वा हो।"

शाहिद ने आँखें उठाईं।

"तो… तो क्या मेरे पापा बचेंगे?"

मेरा गला सूखा।

यही वो सवाल है, जिससे मैं हमेशा डरता हूँ। हर वो आदमी जो किसी बीमार के पास बैठा हो, यही सवाल पूछता है — और सच ये है कि कोई भी, जिसके हाथ में औज़ार हो, या स्टेथोस्कोप हो, या घंटी हो, उसका जवाब नहीं दे सकता।

"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में अजनबी लगी। "मुझे यक़ीन नहीं है।"

शाहिद की आँखें भर आईं।

"पर मैं ये भी नहीं कहूँगा कि वो नहीं बचेंगे," मैंने कहा। "क्योंकि मुझे वो भी नहीं पता। और जो मुझे नहीं पता, उसे मैं बोलकर अपने हाथ ख़राब नहीं करूँगा।"

"तो फिर आप क्या जानते हैं?"

"मैं सिर्फ़ इतना जानता हूँ," मैंने कहा, "कि तेरे पापा की साँस आज सुबह से दो बार भारी हुई है। और दोनों बार ऐसा तब हुआ जब तेरी माँ की बात आई, या तेरी नौकरी की बात आई।"

डॉक्टर इसरानी ने धीरे से सिर हिलाया। उन्होंने पहली बार कुछ नहीं कहा। बस देखते रहे।

"और अब," मैंने कहा, "तू मुझे बता — तुझे अपने पापा से क्या डर लगता है?"

शाहिद ने मुँह खोला, बंद किया।

"मैं नहीं—"

"शाहिद," मैंने कहा, "मैंने अभी कहा था कि मैं झूठ नहीं बोलूँगा। इसलिए तू भी मत बोल। मैंने देखा है कि झूठ बोलने वाले का हिसाब भी बिगड़ जाता है, और झूठ के बाद आदमी के पास बचता क्या है? सिर्फ़ चुप्पी। और चुप्पी वो चीज़ है जिसने मेरे घर में पाँच साल पहले घुसकर आज तक दरवाज़ा नहीं छोड़ा।"

शाहिद ने हाथ से आँखें ढक लीं।

और फिर, बिस्तर से, यूसुफ़ मियाँ बोले।

उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, फटी हुई, जैसे पुराने रेडियो की आवाज़ जो दूर से आ रही हो।

"मुझे यह डर लगता है," उन्होंने कहा, "कि यह बेटा बड़ा होकर मुझे छोड़कर चला जाएगा।"

कमरे में जैसे किसी ने ठहरा हुआ हवा का पंखा चला दिया।

"मैं रात भर सो नहीं पाता," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "कुर्सी की पहिया चरचराती है, और मैं सुनता रहता हूँ कि क्या ये उठकर बाहर जा रहा है। एक बार ये आधी रात को उठकर दरवाज़ा बंद करने गया था। मैंने सोचा, बस, अब चला, अब नहीं लौटेगा। मैं बैठा रहा, सुबह तक, पलंग पर, चादर पकड़कर। ये तीन बजे लौटा। बोला कि बाहर कुत्ते भौंक रहे थे और उसने दरवाज़ा देखकर बंद किया।"

वो रुके। उनकी साँस की आवाज़ तेज़ हुई।

"मैं उस दिन से रात को कुर्सी हिलाकर देखता हूँ," उन्होंने कहा, "कि कहीं ये जाने की तैयारी में तो नहीं।"

शाहिद ने हाथ आँखों से हटाया।

"पापा," उसने कहा, "मैं कहाँ जाऊँगा?"

"वही तो डर है," यूसुफ़ मियाँ ने कहा। "तू बड़ा है। तेरे हाथ-पैर ठीक हैं, मेरे नहीं हैं। तुझे नौकरी मिलेगी अच्छी, तू दूसरी जगह रहेगा, कभी-कभी आएगा, ठीक है। पर मैं… मैं इस कुर्सी पर बैठा इंतज़ार करता रहूँगा। और वो इंतज़ार मुझे खा जाएगा।"

शाहिद की आवाज़ काँपी।

"और मैं," उसने कहा, "मैं डरता हूँ कि आप मर गए तो—"

वो रुक गया। जैसे शब्द मुँह में ही अटक गए।

"बोल," यूसुफ़ मियाँ ने कहा।

"मुझे डर है," शाहिद ने रोते हुए कहा, "कि आप मर गए तो ये मकान का किराया कौन देगा, और मेरी नौकरी क्या होगी, और मुझे कौन सिखाएगा कि फड़ देखकर बीमारी कैसे पहचानते हैं, और माँ की याद किसके पास रहेगी। मुझे डर है कि आपके जाने के बाद मैं अकेला नहीं रहूँगा — मैं अधूरा रह जाऊँगा। आधा। जैसे कोई साइकिल जिसका एक पहिया निकाल दिया गया हो और उसे सिर्फ़ इसलिए खड़ा रखा गया हो कि गिर न जाए।"

यूसुफ़ मियाँ ने उसकी तरफ़ देखा।

और फिर वो कुछ ऐसा हुए जो मैंने उस कमरे में पहले कभी नहीं देखा था।

यूसुफ़ मियाँ ने अपना हाथ उठाया। बहुत मुश्किल से, बहुत धीरे, जैसे कोई पुराना दरवाज़ा अपने आप खुल रहा हो। और उन्होंने अपने बेटे का सिर पकड़ लिया।

"तू अधूरा नहीं है," उन्होंने कहा। "तू मेरा बेटा है। और मेरी एक ही चीज़ है दुनिया में। ये कुर्सी जाए तो जाए, ये कमरा जाए तो जाए। तू जाता है तो मैं सच में मर जाऊँगा। मरना बीमारी से नहीं होता, बेटा। मरना तब होता है जब कोई तेरे पास बैठना बंद कर दे।"

शाहिद ने उनका हाथ पकड़ लिया और उनके हाथ पर सिर रखकर रोने लगा।

और मैं वहीं खड़ा था, और मुझे लगा कि मेरे अंदर कहीं कोई पुरानी लकीर खिंच गई है — वो लकीर जो पापा और मेरे बीच भी है। मुझे लगा कि सामने ये बाप-बेटा नहीं, पापा और मैं बैठे हैं। और मैं वहीं खड़ा हूँ, हाथ में औज़ार लिए, और समझ नहीं पा रहा कि कहाँ से शुरू करूँ।

रज्जो बाई दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उन्होंने अपना पल्लू आँखों पर रख लिया।

डॉक्टर इसरानी ने खिड़की की तरफ़ मुँह कर लिया।

और दरवाज़े पर, सफ़ेद कोट में, काजल खड़ी थी — हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप, आँखें भरी हुईं।

शाहिद ने रोते-रोते अपनी जेब से वो पीला काग़ज़ निकाला, जो उसने बबलू से लेकर छिपाया था — कुचला हुआ, मुड़ा हुआ, कोने से फटा हुआ।

"ये," उसने कहा, और अपनी आवाज़ फाड़कर बोला, "ये मेरे काम का नहीं है।"

और उसने उसे बीच से फाड़ दिया।

एक बार। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी बार।

काग़ज़ के टुकड़े हवा में उड़े और बिस्तर पर, फर्श पर, और यूसुफ़ मियाँ की चादर पर गिरे।

"शाहिद!" डॉक्टर इसरानी ने कहा। "वो सबूत था—"

"सबूत नहीं था," मैंने कहा। "जाल था।"

मैंने झुककर एक टुकड़ा उठाया। उस पर सिर्फ़ "तीस दिन" लिखा था।

"सबूत असली काग़ज़ होता है," मैंने कहा। "और असली काग़ज़ उनके पास है। जो फटा, वो उनका दिया हुआ डर था। डर को फाड़ना अच्छा काम है।"

तभी मेरी जेब में घंटी गरम हुई।

ठंडी नहीं। गरम। जैसे किसी ने उसे धूप में रख दिया हो।

मैंने उसे निकाला और वो अपने आप बजी — एक बार, साफ़, तेज़, ऐसी आवाज़ जो कमरे के कोनों तक गई और खिड़की के शीशे पर अटक गई।

"साफ़ हिसाब," घंटी ने कहा। "एक ही है। दो सौ अठाईस।"

मैंने आँखें सिकोड़ीं।

"पर तूने पहले एक सौ अठासी कहा था," मैंने कहा। "फिर दो सौ अठाईस। फिर एक सौ बीस। मैं हिसाब लिखता हूँ, और मेरा हिसाब कभी इतना बिगड़ा नहीं।"

"हिसाब नहीं बिगड़ा था," घंटी ने कहा। "तेरा डर हिसाब में घुस गया था। डर हिसाब की कॉपी में बैठ जाए तो हर जोड़ गलत निकलता है। अब डर बाहर निकला। साफ़ हिसाब दो सौ अठाईस।"

मैंने धीरे से साँस छोड़ी।

"और अब?"

"अब जोड़ बयालीस का जुड़ा," घंटी ने कहा। "दो सौ सत्तर।"

मैंने घंटी को हथेली में दबाया और आँखें बंद कर लीं।

दो सौ सत्तर।

मुझे नहीं पता कि ये आँकड़े किस तराज़ू पर तोले जाते हैं। मुझे नहीं पता कि इनका कोई मोल है भी या नहीं। पर उस वक़्त, उस कमरे में, मुझे लगा कि ये आँकड़े वो नहीं हैं जो मैंने कमाए हैं। ये वो हैं जो लोगों ने मुझे दिए हैं — अपनी चुप्पी तोड़कर, अपना डर कहकर, अपना हाथ बढ़ाकर।

मैंने आँखें खोलीं।

"अब पहिया," मैंने कहा।

शाहिद ने मुझे देखा, आँखें सूजी हुईं।

"अभी?"

"अभी।"

मैंने अपना बैग खोला। उसमें से टिंकू की दी हुई छोटी बॉल बियरिंग निकाली। फिर रिंच। फिर वो छोटी सी कील जो हमेशा काम आती है।

"शाहिद, कुर्सी को थोड़ा आगे खींच।"

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