The Mysterious Bell – Chapter 1399
गली में सुबह की हलचल शुरू हो गई थी। नल पर दो बाल्टियाँ पहले से खड़ी थीं। किसी की चप्पल की आवाज़ आ रही थी। उस्ताद की दुकान से अभी शटर नहीं उठा था, पर सिलाई मशीन की धीमी टिक-टिक आ रही थी, जैसे वो चुपचाप अपना काम कर रही हो।
मैं पीपल के नीचे पहुँचा। शालिनी पहले से थी। उसके हाथ में मोटी काली फाइल थी और आँखों में वो नींद नहीं थी, जो रात भर काग़ज़ पढ़ने वालों की आँखों में होती है।
मेरे पीछे-पीछे मीरा आई। काजल आई। फिर उस्ताद आए, हाथ में कैंची। फिर गोविंद भाई — सफ़ेद कुर्ता, काँपते हाथ, पर आज कुछ अलग। आज उनकी आँखों में वो डर नहीं था, जो कल था। आज उनकी आँखों में थकान थी। और थकान, डर से बहुत बेहतर होती है।
पापा सबसे आख़िर में आए। धीरे चलते हुए। पर मेरी तरफ़ देखकर सीधे आँख से देखा। नीचे नहीं।
मैंने काग़ज़ निकाला। सबको दिखाया।
"ये रात में ताले से निकला," मैंने कहा। "पता है — बिजलीघर के पीछे वाली काली कोठरी। और नाम है — हरिप्रसाद।"
शालिनी ने काग़ज़ देखा। दोनों तरफ़ पलटा। अपनी फाइल से मिलाया। फिर बोली —
"अंकुश, मैं मानती हूँ कि ये रास्ता है। पर सुन — अगर हम आज शाम सात बजे मैदान में जाकर सिर्फ़ ये काग़ज़ लहराएँगे, तो रणवीर एक ही रात में उल्टा खेल कर देगा। वो कहेगा ये काग़ज़ हमने बनाया है। वो कहेगा हरिप्रसाद नाम किसी और का है। वो कहेगा ये पता झूठा है।"
मैं चुप हुआ।
"तो फिर क्या करें?" मीरा ने पूछा।
"पहले काग़ज़ पक्के करो," शालिनी ने कहा। "और गवाह। जो भी सामने आएगा, उसका लिखा हुआ हो। हस्ताक्षर हो। तारीख़ हो। स्याही सूखी हो। वरना सात बजे वो हमें मंच पर खड़ा करके इस तरह घुमाएगा जैसे हम खुद झूठे हों।"
गोविंद भाई ने अपना हाथ उठाया। धीमे से।
"मेरा बयान," उन्होंने कहा। "मैं लिखूँगा। आज। अभी।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"मैंने कल रात सोचा," गोविंद भाई ने कहा। "बाईस साल से मैं एक ही चीज़ से डरता आया हूँ — कि मेरा नाम कहीं आ जाएगा। और आज मुझे लगता है — अगर मेरा नाम नहीं आया, तो मेरा पूरा जीना ही किस काम का?"
उनकी आवाज़ में कंपन था, पर रुकावट नहीं।
मैंने उन्हें दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठाया। मेज़ साफ़ की। काग़ज़ रखा। कलम रखी। मैंने कहा —
"आप लिखिए। जो याद है, जैसा याद है।"
वो बैठे। कलम उठाई। और फिर लिखने लगे।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मैंने देखा — उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं, पर जैसे-जैसे लिखते गए, कंपन कम होता गया। पहली लाइन में उन्होंने लिखा कि उन्होंने कितने अंगूठे लिए। दूसरी में — किसके लिए झुके। तीसरी में — किसने उन्हें डराया।
तीसरी लाइन पर उनका हाथ रुका।
मैंने पूछा, "क्या हुआ?"
"ये नाम," उन्होंने कहा। "मैं इस नाम को बाईस साल से जानता हूँ, पर इसका पूरा पता नहीं जानता। बस इतना जानता हूँ — जब भी मैंने 'नहीं' कहना चाहा, ये नाम सामने आ गया।"
"तो वो लिखिए," मैंने कहा। "नाम नहीं पता तो ये लिखिए कि इस आदमी की शक्ल कैसी है।"
उन्होंने लिखा — मोटा आदमी नहीं, दुबला भी नहीं। सफ़ेद कुर्ता। चमकते जूते। और पहली मुलाक़ात में ही उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा था।
जब वो आख़िरी पंक्ति पर पहुँचे, तो कलम रोकी।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "एक बात है जो मैंने आज तक किसी से नहीं कही।"
"कहिए।"
"जिस रात मैंने तुम्हारे पापा का अंगूठा लिया था," उन्होंने कहा, "उस रात मैंने तुम्हारे पापा को रोते देखा था। वो मेरी मेज़ के सामने बैठे थे और उनका हाथ काँप रहा था। और मैंने — मैंने उन्हें एक गिलास पानी भी नहीं दिया।"
उनका हाथ रुका। काग़ज़ पर एक बूँद गिरी। पानी की नहीं।
"आज से पहले मैंने ये बात कभी किसी को नहीं बताई," उन्होंने कहा। "इसे भी लिख दूँ?"
"लिख दीजिए," मैंने कहा। "यही सबसे ज़रूरी लाइन है।"
उन्होंने लिखा।
और फिर, आख़िर में, नीचे हस्ताक्षर किए।
मैंने उनका हाथ देखा।
नहीं काँप रहा था।
गोविंद भाई ने कलम रखी। अपना हाथ देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा। और हँस पड़े — ऐसे हँसी, जैसे बहुत दिन बाद मुँह खुला हो।
"देखो," उन्होंने कहा। "हाथ नहीं काँप रहा।"
"मैं देख रहा हूँ," मैंने कहा।
"बाईस साल बाद।"
"तो अब रोज़ लिखिएगा," मैंने कहा। "आदत डालिए।"
वो हँसे। मीरा ने काग़ज़ उठाया, दोनों तरफ़ से देखा, और एक काग़ज़ की कॉपी बनाई। बोली —
"मैं इसे रात तक तीन जगह रखूँगी। एक आपके पास, एक शालिनी के पास, और एक… एक मेरे पास।"
गोविंद भाई ने सिर हिलाया। और मैंने पहली बार देखा कि उनकी आँखों में डर की जगह कुछ और था।
अब पापा की बारी थी।
वो दुकान के बाहर छत पर गए। मैं भी गया।
सूरज ऊपर आ चुका था। पीपल की छाया छोटी हो रही थी। गली में बच्चों का शोर उठ रहा था। नीचे उस्ताद की मशीन चल रही थी — टिक-टिक, टिक-टिक।
पापा ने काग़ज़ मेज़ पर रखा।
"मैं सच बोलूँगा," उन्होंने कहा। "पर एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"तुमने कभी मुझसे नहीं पूछा," उन्होंने कहा। "कि उस रात मैंने तुम्हारी माँ को क्यों नहीं बताया।"
मैं चुप हुआ। मैंने देखा, उनकी आँखें छत की ईंट पर थीं।
"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा, "कि जिस औरत का ऑपरेशन चल रहा है, उसे अगर ये भी पता चले कि उसका आदमी झूठ बोलकर ज़िंदगी खींच रहा है — तो वो डॉक्टर की मेज़ पर ही दम तोड़ देगी।"
"और बाद में?"
"बाद में," पापा ने कहा, "बाद में मैं डर गया। डर गया कि अगर बताया तो तुम मुझे देखना बंद कर दोगे।"
मेरा गला भारी हुआ। मैंने कुछ नहीं कहा।
पापा ने कलम उठाई। और लिखने लगे। दो पन्ने लिखे। फिर तीसरे पर पहुँचकर रुके।
"आगे क्या लिखूँ?" उन्होंने मुझसे पूछा।
"वो लिखिए," मैंने कहा, "जो रात को सोते वक़्त सोचते हैं।"
उनका हाथ रुका।
फिर वो धीरे से बोले —
"अंकुश, मुझे हर रात एक ही बात दिखती है। तुम्हारी माँ अस्पताल के बेड पर लेटी हैं, तुम बाहर बरामदे में खड़े हो, और मैं — मैं एक कोने में खड़ा हूँ, हाथ जेब में, चुप। मैं जागता हूँ और मुझे लगता है कि मैंने अपना सबसे बड़ा काम नहीं किया — मैंने अपने बेटे को अपनी गवाही नहीं दी।"
उनका हाथ काँपा। पर फिर वो सीधा हुआ।
"आज मैं चुप नहीं रहूँगा," उन्होंने कहा। "आज शाम जो भी मुझसे पूछेगा, मैं बताऊँगा। चाहे सामने रणवीर बैठा हो, चाहे उसका सारा मंच। और अगर मुझसे कहा जाए कि इसके बाद सब खत्म हो जाएगा — फिर भी मैं बताऊँगा।"
वो काग़ज़ पर झुके और लिखने लगे।
मैंने देखा — उनकी लिखाई टेढ़ी थी, पर साफ़। जैसे कोई बहुत साल बाद लिख रहा हो, और लिखने की जल्दी में नहीं हो।
जब वो हस्ताक्षर कर रहे थे, तभी नीचे से आवाज़ आई —
"अरे ऊपर क्या साजिश चल रही है?"
माँ थीं। हाथ में बड़ा तसला। पल्लू कमर में खोंसा। माथे पर चंदन का टीका।
हम दोनों हँस पड़े।
"आ जाओ," पापा ने कहा। "तुम्हारे बेटे ने मुझसे कुछ लिखवा लिया।"
माँ सीढ़ी चढ़कर आईं, काग़ज़ देखा, और बोलीं —
"अच्छा? तो अब तुम लिखते भी हो?"
"सीख रहा हूँ," पापा ने कहा।
माँ ने काग़ज़ दोनों हाथों से पकड़ा। पढ़ा। पढ़ती गईं। और फिर बिना कुछ बोले काग़ज़ मेज़ पर रख दिया और नीचे उतरने लगीं।
"माँ?"
"मुझे खाना बनाना है," उन्होंने कहा। "आज बहुत लोग आएँगे।"
"कितने?"
"पूरी गली," उन्होंने कहा। "और जो गली से बाहर है, वो भी।"
वो नीचे उतर गईं।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno