The Mysterious Bell – Chapter 1398
"शालिनी," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"तू क्यों लड़ रही है?"
वो एक पल रुकीं। फिर मेज़ के कोने पर रखी किताब की तरफ़ देखा, जो उनके पापा की थी — जो उन्होंने मुझे एक बार दिखाई थी।
"मेरे पापा ने कहा था — जो आदमी काग़ज़ के डर से चुप रहता है, वो काग़ज़ के बाद हर चीज़ के डर से चुप रहेगा। मैं वो नहीं बनना चाहती।"
वो उठीं। फाइल बंद की।
"चार बजे मैं अदालत जा रही हूँ," उसने कहा। "छह बजे तक वापस आ जाऊँगी। सात बजे मैदान में होऊँगी। और अगर मैं देर कर दूँ — तो ये फाइल मीरा के पास रहेगी। कम से कम वो ज़िंदा रहे।"
उसने फाइल मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"तू रख," मैंने कहा। "तू जानती है इसका हिसाब।"
"नहीं," उसने कहा। "तू रख। तेरे पास घंटी है। तेरे पास पापा की पर्ची है। और अब तेरे पास ये भी रहेगा। अगर कुछ हो जाए, तो तू जानेगा क्या दिखाना है।"
मैंने फाइल ली। भारी थी। काग़ज़ भारी नहीं होते, पर सच भारी होते हैं।
पाँच बजे मैं पीपल के नीचे पहुँचा। वहाँ पहले से ही भीड़ थी — बच्चे, बुज़ुर्ग, कुछ औरतें। मेज़ पर एक बड़ी लालटेन जल रही थी, और उसके सामने टिंकू खड़ा था, हाथ में पर्चियों का बंडल लिए।
"उस्ताद आ गए," उसने कहा। "ये सब पर्चियाँ बाँटनी हैं। मैंने सोचा — सबको बताना है कि शाम सात बजे मैदान में आएँ।"
"क्या लिखा है पर्ची पर?" मैंने पूछा।
उसने एक पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ाई। छोटी पर्ची थी, सफ़ेद, हाथ से लिखी। उस पर लिखा था —
"आज शाम सात बजे मैदान में आओ। अपना सच लेकर। काग़ज़ नहीं — बस जो तुम्हारे अंदर है। कोई अंगूठा नहीं। कोई मुहर नहीं। सिर्फ़ तुम्हारी ज़ुबान।"
मैंने पर्ची पढ़ी। फिर टिंकू की तरफ़ देखा।
"ये तूने लिखी?"
"सानिया ने," उसने कहा। "मैंने सोचा था कि सिर्फ़ 'आओ' लिखें। पर सानिया ने बोला — अगर सिर्फ़ 'आओ' लिखेंगे तो लोग आएंगे नहीं। डरेंगे। इसलिए साफ़ लिखो कि अपना सच लाना है।"
मैंने पर्ची वापस दी।
"बाटो," मैंने कहा।
टिंकू और बच्चे भागे। गली के हर दरवाज़े पर, हर दुकान पर, हर खिड़की पर — वो पर्चियाँ पहुँचाई गईं। सानिया ने एक दुकान पर दो पर्चियाँ दीं — एक दुकानदार को, एक किरायेदार को। गुड्डू ने किराने वाली दुकान पर पर्ची दी तो बूढ़ा काका ने पढ़ी और सिर हिलाया। रफ़ीक़ ने किताबों की दुकान पर दी — उसके मामा ने लिया, पढ़ा, और फिर धीरे से कहा, "शाम आऊँगा"।
मैं पीपल के नीचे खड़ा था, और मेरी नज़र लगातार मोड़ पर थी।
छह बजे वो आया।
बबलू।
वो अकेला था। सफ़ेद कुर्ता पहने था, पर बिना चेन। बिना पानदान। बिना पान। उसका चेहरा थका हुआ था, आँखें लाल, और हाथ में वो एक पर्ची थी जो बच्चों ने कहीं उसे भी दी थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
वो रुका। फिर आगे आया। पीपल के नीचे आकर खड़ा हुआ। उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो पहले थी। डर था, सच में। वो डर जो किसी बहुत बड़ी चीज़ से होता है।
"पर्ची मिली," उसने कहा। "मैंने पढ़ी।"
"और?"
"मैं आज शाम आऊँगा," उसने कहा। "और मैं कल… कल मैं अपने बक्से वाली बात बोलूँगा। सबके सामने।"
मैं चुप खड़ा रहा।
"चाहे साहब कुछ भी करें," उसने कहा। "मैंने गली का नुक़सान किया है। मैंने लोगों को डराया है। मैंने काग़ज़ों पर अंगूठे लगवाए हैं। पर मैंने बक्से में जो देखा है, वो मुझे रात को सोने नहीं देता।"
वो रुका।
"और एक बात," उसने कहा। "मैंने उस रात बक्से में देखा था — सफ़ेद कुर्ते वाला जो आज तेरे सामने आया, वो साहब का आदमी नहीं है। वो साहब के ऊपर है।"
मेरी साँस रुकी।
"क्या बोल रहा है?"
"साहब भी उससे डरते हैं," बबलू ने कहा। "मैंने एक बार सुना — साहब ने फोन पर उससे 'सर' कहा था। साहब। उस आदमी से।"
उसने पर्ची जेब में रखी।
"मैं जा रहा हूँ," उसने कहा। "सात बजे यहाँ रहूँगा।"
वो मुड़ा। दो कदम गया। फिर रुका। पीछे मुड़कर देखा।
"अंकुश," उसने कहा। "मैंने तेरी घंटी कई बार छिपाने की कोशिश की। कई बार मोड़ने की। पर आज मुझे लगता है — ये घंटी शायद मेरे लिए भी बजती है।"
वो चला गया।
मैं पीपल के नीचे खड़ा रहा। घंटी मेरी जेब में हल्की गरम थी, जैसे सुन रही हो।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"बबलू के पीछे कोई है?" मैंने पूछा।
"नहीं," टिंकू ने कहा। "वो अकेला आया था। अकेला गया।"
रात नौ बजे मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में लौटा। ताला मेज़ पर था। माँ ने मुझे गर्म रोटियाँ दीं और बिना कुछ पूछे चली गईं। काजल ने एक बार झाँका और बोली, "आज जल्दी सो जा" — और चली गई।
मैं बैठा। ताले को अपने सामने रखा। घंटी मेज़ पर। पापा की पर्ची कमीज़ की जेब में।
फिर मैंने ताले को दोनों हाथों से पकड़ा। वो हल्का गरम था। हल्का सा। जैसे अंदर कोई साँस भर रहा हो।
"कल शाम," मैंने धीरे से कहा। "सबके सामने। पापा तुझे खोलेंगे। और मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा।"
ताले ने कुछ नहीं कहा।
मैंने घंटी उठाई, हल्के से हिलाई।
वो बजी। छोटी। धीमी। एक बार।
"कल," मैंने कहा।
फिर मैंने बत्ती बुझाई। चारपाई पर लेटा। ताला मेज़ पर था और मुझे लगा जैसे कोई मेरे साथ सो रहा हो।
रात कितनी बजी होगी — शायद दो, शायद तीन — तभी आवाज़ आई।
खट।
हल्की। एक बार।
मैं जागा। आँखें खोलीं। कमरे में अंधेरा था। बल्ब बंद था, पर बाहर की गली से एक फीकी पीली रोशनी आ रही थी, शायद पीपल वाली लालटेन।
मैं उठा। ताले की तरफ़ देखा।
ताले का ढक्कन थोड़ा सा खुला था।
मैं उसके पास गया। हाथ बढ़ाया। ढक्कन और उठाया।
अंदर से एक काग़ज़ निकला।
पीला। मुड़ा। फटा हुआ।
और उस पर, किसी ने नीली स्याही में लिखा था — एक पता, और सिर्फ़ एक नाम।
बिजलीघर के पीछे वाली काली कोठरी।
और नीचे —
हरिप्रसाद।
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा। मेरी उँगलियाँ काँपीं।
घंटी मेज़ पर बजी। एक बार। नरम। बस एक बार।
और फिर कमरे में चुप्पी वापस आई — बस एक बात छोड़कर, जो दीवार से लौटती नहीं, सीधे दिल में उतरती है :
अब हर परत खुल रही है। अब सिर्फ़ ताला नहीं, आदमी खुलेंगे।
॥
सुबह की पहली किरण जब दुकान के पीछे वाले कमरे की खिड़की से आई, मैं उस काग़ज़ को तीसरी बार पढ़ रहा था।
काग़ज़ पीला था। किनारों से फटा। मोड़ पर उसकी परत टूटकर दो हिस्सों में बँट गई थी। ऊपर नीली स्याही में एक पता लिखा था — बिजलीघर के पीछे वाली काली कोठरी। और नीचे, बड़े अक्षरों में, कोई नाम नहीं, बस एक शब्द था।
हरिप्रसाद।
मैंने उसे मोड़ा। पलटा। फिर से देखा। काग़ज़ पर इतना ही लिखा था। कोई तारीख़ नहीं, कोई लकीर नहीं, वो दो लकीरें और बीच का बिंदु भी नहीं, जो अब मुझे हर काग़ज़ पर दिखने लगा था। सिर्फ़ पता और नाम।
मैं उठा। मुँह धोया। पानी का छींटा चेहरे पर मारा। आईने में देखा — आँखें लाल थीं, बाल ऐसे बेतरतीब कि जैसे किसी ने पकड़कर खींच दिए हों।
ताले को मैंने मेज़ पर ही रहने दिया। ढक्कन अब भी थोड़ा सा खुला था। जैसे वो अपनी बात कहकर थक गया हो और साँस ले रहा हो।
मैंने घंटी उठाई। हिलाई।
बजी नहीं।
बस हल्की गरम थी। और अंदर से ऐसा लगा जैसे कोई बहुत धीरे बोल रहा हो — पर शब्द नहीं बन रहे थे। जैसे कोई सपने में बोले और जगने पर बात भूल जाए।
मैंने घंटी जेब में डाली। काग़ज़ तह किया, कमीज़ की अंदरूनी जेब में रखा। और कमरे से बाहर निकला।
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