The Mysterious Bell – Chapter 1396
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“और मैंने तुझे चुन लिया।”
कमरे में मेरी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी। घंटी मेरी हथेली पर ठंडी हो रही थी, धीरे-धीरे, जैसे कह रही हो कि उसने अपनी बात कह दी।
मैंने पर्ची को दोनों हाथों से सीधा किया। उस पर बस वही एक लाइन थी। न तारीख़, न नाम, न कोई मुहर। सिर्फ़ एक बाप की लिखी हुई आख़िरी उम्मीद।
“पापा,” मैंने कहा।
“हूँ।”
“तुमने मुझे बाहर नहीं रखा था।”
उन्होंने देखा।
“तुमने मुझे इसी दिन के लिए तैयार रखा था,” मैंने कहा। “चाबी गले में डालकर, ताला संदूक में छिपाकर, घंटी चुप कराकर — तुमने मुझे सिर्फ़ बचाया नहीं था। तुमने मुझे बोलने के लिए बचाया था।”
पापा की आँखों से आँसू गिरा। उन्होंने इस बार पोंछा नहीं।
“मुझे डर था कि मैं बोलूँगा और सब टूट जाएगा,” उन्होंने कहा।
“सब पहले ही टूट चुका था, पापा,” मैंने कहा। “अब जोड़ने का वक़्त है।”
मैंने पर्ची को अपनी कमीज़ की जेब में रखा — उस जेब में जहाँ घंटी नहीं थी, जहाँ सिर्फ़ वो काग़ज़ था जो मुझे याद दिलाएगा कि मैं इस दुकान पर सिर्फ़ साइकिल ठीक करने नहीं आया हूँ।
फिर मैंने घंटी उठाई और उसे एक बार हल्के से हिलाया।
वो बजी — साफ़, छोटी, कमरे की चुप्पी में फूटती हुई।
“आज शाम,” मैंने कहा। “मैदान में। सबके सामने।”
पापा ने सिर हिलाया।
“और माँ की हँसी?” उन्होंने पूछा।
मैंने ताला उठाया। उसकी कड़ी मेरी हथेली में हल्की गरम थी, जैसे अंदर कोई साँस भर रहा हो।
“वो भी आएगी,” मैंने कहा। “और इस बार किसी ताले में बंद नहीं होगी।”
बाहर गली में किसी बच्चे की आवाज़ आई — शायद चिंटू, शायद गुड्डू। शबनम आपा की गुमटी से चाय की भाप उठ रही थी। दूर कहीं पीपल की डालियाँ हिल रही थीं।
और मेरे पास — मेरी जेब में — पापा की लिखी वो एक लाइन थी, जो बाईस साल से मंसूर के ताले की कड़ी में बंद थी।
अगर मैं न बोल सका, तो मेरा बेटा बोलेगा।
मैंने ताले को मेज़ पर रखा और पापा के कंधे पर हाथ रखा।
“चलो,” मैंने कहा। “आज शाम तक एक और रोज़ है। और उसमें सबसे पहले हम दोनों को अपना डर बाहर लाना है।”
पापा उठे। दरवाज़े तक गए। फिर रुके। पीछे मुड़े।
“बेटा।”
“हाँ?”
“तेरे दादा कहते थे — घंटी सिर्फ़ बजती नहीं, गवाही देती है।”
“आज शाम वो गवाही देगी,” मैंने कहा।
पापा बाहर निकल गए।
मैं कमरे में अकेला रह गया — घंटी हथेली पर, ताला मेज़ पर, और पर्ची दिल के पास। बल्ब फिर गुनगुनाया। मैंने आँखें बंद कीं और उस पर्ची की लाइन को मन में दोहराया।
अगर मैं न बोल सका, तो मेरा बेटा बोलेगा।
मैंने आँखें खोलीं।
“मैं बोलूँगा, पापा,” मैंने धीरे से कहा। “आज शाम। सबके सामने।”
घंटी मेरी हथेली में ठंडी थी। पर उसकी आवाज़ अभी भी कमरे में लौट रही थी, जैसे कह रही हो — अब सिर्फ़ बोलने का नहीं, जोड़ने का वक़्त है।
॥
घंटी मेरी हथेली में ठंडी थी, पर उसकी आवाज़ अभी भी कमरे की दीवारों से टकराकर लौट रही थी। मैंने पर्ची को एक बार फिर खोला। वही लाइन। वही पेंसिल की झुकी लिखाई। बाईस साल पुरानी स्याही अब भी काग़ज़ पर ज़िंदा थी, जैसे उसे पढ़ने वाले का इंतज़ार हो।
मैंने घंटी को ऊपर उठाया।
"अब बोल," मैंने कहा। "जो कहना है, साफ़ कह।"
कमरे में चुप्पी थी। बल्ब गुनगुनाता रहा। बाहर गली से किसी बर्तन की आवाज़ आई, फिर चली गई।
फिर घंटी बोली।
और इस बार उसकी आवाज़ पहले जैसी नहीं थी।
ये आवाज़ धीमी थी। नरम। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बरसों बाद चुप्पी तोड़कर पहली बार धीरे से मुस्कुरा रहा हो।
"अब सिर्फ़ काग़ज़ नहीं बोलेगा," घंटी ने कहा। "अब लोग बोलेंगे।"
मेरी उँगलियाँ काँपीं।
"मतलब?"
"जो पन्ना सड़ता है, वो काग़ज़ होता है। जो पन्ना ज़िंदा रहता है, वो आदमी होता है। तेरे घर में आज ऐसा ही काग़ज़ बैठा है। उससे बुलवा।"
मैंने घंटी को नीचे रखा और पर्ची को जेब में ठीक से दबाया। कमरे का दरवाज़ा खुला था। बाहर आँगन में पीली धूप गिर रही थी, जैसे गली ने आज खुद जागकर सब कुछ साफ़ कर दिया हो।
मैं बाहर निकला ही था कि माँ ने दरवाज़े पर आकर मुझे रोका।
"रुक।"
मैं रुक गया।
माँ के हाथ में चाय का कप था और कप काँप रहा था। उनके बाल ठीक से बँधे नहीं थे, माथे पर चंदन का टीका आधा मिटा हुआ था। बुखार से उनका चेहरा उतरा हुआ था, पर आँखें वही थीं — सीधी। ऐसी सीधी, जो बहाने नहीं सुनती।
"तूने ताला देखा?" उन्होंने पूछा।
"देखा।"
"और अंदर क्या था?"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। पापा की पर्ची जेब में थी, पर माँ की आँखें जेब पर नहीं थीं। वो सीधे मेरे चेहरे पर थीं।
"पापा की लिखाई थी," मैंने कहा।
माँ ने कप पास की मेज़ पर रखा। धीरे से। जैसे उन्हें कोई कीमती चीज़ रखनी हो, जो अब इस हाथ में नहीं चाहिए।
"मुझे पता था," उन्होंने कहा।
मैं चुप खड़ा रहा।
"कब से?" मैंने पूछा।
"बाईस साल से।"
माँ ने कुर्सी खींची। बैठ गईं। मेरी तरफ़ नहीं देखा। दरवाज़े की तरफ़ देखा, जहाँ से गली की आवाज़ें आ रही थीं।
"तू उस रात को बच्चा था," उन्होंने कहा। "छोटा। तुझे क्या याद रहेगा। मुझे याद है। मैं उस वक़्त ऑपरेशन थिएटर से बाहर आई थी, पट्टी लगी, आधी नशे में। और तेरे पापा कोने में खड़े थे, चेहरा उतरा हुआ। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं था।"
उनकी आवाज़ ज़रा टूटी।
"मैंने सोचा — कोई काग़ज़ है, कोई पैसा है, कोई दिक्क़त है। कुछ दिन में खुद बता देंगे। फिर कुछ नहीं बोले। फिर महीने बीत गए। साल बीत गए।"
"और तुमने पूछा नहीं?" मैंने कहा।
"पूछा था," माँ ने कहा। "एक बार। काजल के जन्म के छह महीने बाद। मैंने पूछा — शंकर, कुछ छिपा रहे हो क्या? उन्होंने मेरी तरफ़ ऐसे देखा, मानो मैंने उनका दिल ही निकाल लिया हो। फिर वो कभी नहीं बोले। और मैंने दोबारा नहीं पूछा।"
"क्यों?"
माँ ने पहली बार मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि मुझे डर लगा, बेटा," उन्होंने कहा। "मुझे लगा अगर मैं पूछती रहूँगी, तो वो खुल जाएंगे, और जो उन्होंने अंदर दबाया है, वो बाहर आ जाएगा। और बाहर आया तो घर टूट जाएगा। बच्चे बिखर जाएंगे। मैंने सोचा — घर बचा रहे, बस। चुप रहूँ।"
वो रुकीं।
"पर वो चुप्पी उन्होंने अकेले नहीं ढोई," उन्होंने कहा। "मैंने भी ढोई। और शायद मेरी चुप्पी उनकी चुप्पी से भी भारी थी। क्योंकि मेरे पास पूछने का हक़ था। और मैंने पूछने की जगह सह लिया।"
मैं कुर्सी के पास गया। बैठा। माँ के हाथ की तरफ़ देखा। उनकी उँगलियों में चाय के कप के गरम निशान थे।
"माँ," मैंने कहा। "तुमने कुछ ग़लत नहीं किया।"
"किया।"
"तुमने घर बचाया।"
"घर बचाने की कोशिश में मैंने उस रिश्ते को सड़ने दिया," माँ ने कहा। "जो टूटता है, वो टूटकर साफ़ हो जाता है। जो सड़ता है, वो पूरे घर को सड़ा देता है। बाईस साल मैंने सड़ते हुए रिश्ते के बीच खाना पकाया, टिफ़िन भेजा, हिसाब लिखा। और हर रात सोचती रही — कुछ है, जो मुझसे छिपाया जा रहा है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
"आज सुबह जब तूने वो ताला मेज़ पर रखा और जो पर्ची गिरी, मैंने सुना। मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी थी। मैंने पापा की आवाज़ सुनी। मैंने सुना कि उन्होंने मेरी हँसी उस ताले में बंद कर दी थी।"
मेरी साँस रुक गई।
"तुमने सुना?"
"हाँ।"
"और तुम चुप रहीं?"
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