The Mysterious Bell – Chapter 1395
“और बाद में?”
“बाद में माँ बच गईं। मैं घर लौटा। उस रात काग़ज़ याद आया, तो पसीना छूट गया। मैंने सोचा — कहीं कुछ बिगड़ जाएगा। रणवीर का आदमी घर आएगा। लोग पूछेंगे। तेरी माँ को पता चलेगा। काजल छोटी थी। तू भी छोटा था। मैंने सोचा — सबसे बचाना है।”
“कैसे बचाया?” मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मेरे कानों में ही कड़वी लगी।
“उस रात मैंने गले से चाबी निकाली और तेरे गले में डाल दी।”
मैंने सहज ही अपने गले की तरफ़ हाथ ले जाया। पुरानी चाबी मेरी कमीज़ के नीचे थी, ठंडी।
“तू तब चार-पाँच साल का था। तुझे क्या पता? मैंने सोचा, इसके पास रहेगी तो कोई और नहीं उठा ले जाएगा। और ताला — मंसूर का वो काला ताला — मैंने घर के पुराने संदूक में डाल दिया। ऊपर से कपड़े, साड़ियाँ, तेरे बचपन के कपड़े। ताकि कोई आए, कोई देखे, तो कहे — इस घर में कुछ नहीं है। बस एक मिस्त्री रहता है, उसकी बीवी बीमार है, उसके बच्चे छोटे हैं।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“मैंने सोचा — चुप रहूँगा तो सब बच जाएगा।”
मेरा हाथ ट्रंक की पीतल की पट्टी पर कस गया।
“सब बच गया?” मैंने पूछा। “माँ बच गई? घर बच गया? काजल बच गई? मैं बच गया?”
पापा कुछ नहीं बोले।
“पापा, तुमने क्या बचाया?” मेरी आवाज़ बढ़ गई। “तुमने बाईस साल अपने ही घर में एक ऐसी दीवार खींच दी जिसके उस पार तुम रहते थे और इस पार हम। माँ को पता था कि कुछ है। काजल को पता चल गया था। मुझे पता नहीं था — मैं तो बस यही समझता रहा कि मेरा पापा चुप है, सुस्त है, कुछ नहीं बोलता। और तुम… तुम काग़ज़ों के डर से अपने बेटे को भी नहीं बता सके?”
“हाँ,” उन्होंने कहा।
इतनी आसानी से हाँ कहा कि मैं रुक गया।
“तुम्हें गुस्सा आएगा, मुझे पता है,” पापा ने कहा। “आए तो अच्छा है। मैं बरसों से तेरे गुस्से का इंतज़ार कर रहा था। मैं सोचता था — कभी तो पूछेगा, कभी तो बोलेगा। पर तू हमेशा उस डर को हँसी में बदल देता था। और मैं उस हँसी के नीचे छिप जाता था।”
“क्यों नहीं बताया?” मैंने कहा। “जब मैं बड़ा हो गया, जब मैंने दुकान सँभाली, जब माँ बीमार पड़ीं, तब भी क्यों नहीं?”
“क्योंकि मुझे लगा था कि चुप रहकर मैं घर बचा लूँगा।”
उन्होंने धीरे से कहा, जैसे कोई बहुत पुरानी और भारी चीज़ ज़मीन पर रख रहा हो।
“पर मैंने घर को ही अजनबी बना दिया।”
मैं चुप हो गया।
कमरे में अब भी वही बल्ब गुनगुना रहा था। बाहर से किसी साइकिल की घंटी दूर किसी गली में बजी और खत्म हो गई। मेरी जेब में घंटी थी — वो नहीं बजी। मैंने महसूस किया कि मेरे हाथ काँप रहे हैं। ग्रीस के निशान उँगलियों पर थे, और उन्हीं उँगलियों में मैंने अपनी कमीज़ का किनारा भींच लिया।
“तुमने माँ की हँसी भी छिपा दी,” मैंने कहा। आवाज़ धीमी थी, पर अंदर से टूटी हुई।
“हाँ।”
“तुमने मेरा बचपन भी छिपा दिया?”
“हाँ।”
“तो फिर तुम क्या बचा रहे थे, पापा?”
पापा ने चश्मा वापस पहना। उनकी उँगलियाँ टेप पर रगड़ खा रही थीं।
“अपनी शर्म,” उन्होंने कहा। “बस अपनी शर्म बचा रहा था। और उस शर्म के नीचे तुम सब दब गए।”
मैंने ट्रंक से हाथ उठाया। मन किया कि कुछ पटक दूँ, कुछ तोड़ दूँ — जैसे बाईस साल का सन्नाटा एक ही झटके में टूट जाएगा। पर मैंने कुछ नहीं तोड़ा। मैंने सिर्फ़ अपनी हथेली ट्रंक पर रखी और साँस ली।
“मुझे गुस्सा है,” मैंने कहा। “सच में है। तुम पर, उस आदमी पर, उस रात पर, उन काग़ज़ों पर। पर सबसे ज़्यादा गुस्सा इस बात पर है कि तुमने सब अकेले क्यों सहा?”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“मैं तेरा बेटा हूँ,” मैंने कहा। “बेटा सिर्फ़ खाना खाने और दुकान सँभालने के लिए नहीं होता। बेटा उस वक़्त भी काम आता है जब बाप के हाथ काँप रहे हों। तुमने मुझे कभी मौक़ा ही नहीं दिया।”
“मुझे डर था कि तू भी फँस जाएगा।”
“तो फँस जाता! साथ फँसते! पर तुमने मुझे बाहर खड़ा रखा, पापा। मैं बाहर से देखता रहा कि मेरा घर अंदर से टूट रहा है और मुझे पता भी नहीं चला।”
पापा ने अपना सिर नीचे कर लिया।
कुछ देर हम दोनों चुप बैठे रहे।
फिर मैंने देखा कि उनके हाथ काँप रहे हैं। वही हाथ जो मेरे बचपन में साइकिल की चेन चढ़ाते थे, जो मेरी जेब में पहली बार पैसा रखते थे, जो माँ के सिर पर हाथ फेरते थे। वो हाथ अब सिर्फ़ एक पुराने चश्मे के टेप को पकड़े हुए थे।
मैंने अपनी गुस्से को थोड़ा और अंदर धकेला।
“पापा,” मैंने कहा।
“हूँ।”
“आज शाम तुम ताला खोलोगे?”
“खोलूँगा।”
“डर लग रहा है?”
वो कुछ देर चुप रहे। फिर बोले, “हाँ।”
“मुझे भी,” मैंने कहा।
मैंने अपना हाथ बढ़ाया और उनका हाथ पकड़ लिया। उनकी हथेली खुरदुरी थी, सूखी थी, और उसमें वो गरमाहट थी जो सिर्फ़ पापाओं के हाथ में होती है — जो कभी ज़्यादा नहीं बोलती, पर साथ ज़रूर रहती है।
“अब घंटी को छिपाने की ज़रूरत नहीं,” मैंने कहा। “न जेब में, न संदूक में, न किसी डर के नीचे। अब उसे सबके सामने बजना है।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें भरी हुई थीं, पर उन्होंने आँसू पोंछने के लिए हाथ नहीं छुड़ाया। वो सिर्फ़ बैठे रहे, मेरा हाथ थामे।
और तभी —
मेरी जेब से घंटी बजी।
न मैंने हिलाया, न छुआ। बल्ब फीका पड़ गया जैसे बिजली ने एक पल को साँस रोक ली हो। घंटी की आवाज़ कमरे में फैली — पहले एक बार, फिर दूसरी बार। मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी बाहर निकाली। वो मेरी हथेली पर गरम थी।
पापा ने घंटी देखी और उनकी साँस रुक गई।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“वो बजी,” उन्होंने कहा। “जैसे उस रात बजी थी।”
उसी वक़्त मेरी नज़र ट्रंक पर पड़ी। ट्रंक के ऊपर वो काला ताला रखा था — मंसूर का ताला, जो बाहर से खुला था और अंदर से बंद। उसकी आधी खुली कड़ी में कुछ फँसा हुआ था — पीला, मुड़ा हुआ, बहुत छोटा। जैसे कोई पुराना काग़ज़ का टुकड़ा बरसों से वहीं दबा बैठा हो और अब घंटी की आवाज़ से बाहर आ गिरा हो।
मैंने घंटी बाईं हथेली में ली और दाहिने हाथ से वो पर्ची उठाई।
पापा ने देखा और उनका चेहरा बदल गया।
“ये…” उन्होंने कहा। “ये कहाँ से?”
“ताले की कड़ी से गिरी,” मैंने कहा।
मैंने पर्ची खोली। वो पीली पड़ चुकी थी, किनारों से घिसी हुई, पर मोड़ अभी भी साफ़ थे। उस पर नीली स्याही में कुछ लिखा था — छोटे, टेढ़े अक्षर। पापा की लिखाई। मैं उनकी लिखाई पहचानता था — काग़ज़ों पर, बही पर, रोटी के काग़ज़ पर — जो भी वो लिखते थे, उसमें हर अक्षर थोड़ा झुककर खड़ा होता था, जैसे खुद भी किसी का सहारा ले रहा हो।
मैंने पढ़ा।
“अगर मैं न बोल सका, तो मेरा बेटा बोलेगा। और उसके पास घंटी होगी।”
मेरी आवाज़ कमरे में गूँजी और फिर चुप हो गई।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने धीरे से कहा, “मैंने ये… मैंने ये लिखा था?”
“ये तुम्हारी लिखाई है,” मैंने कहा।
“मुझे याद नहीं।”
“कब लिखा? उस रात?”
पापा ने अपना सिर हिलाया — नहीं, पता नहीं। उन्होंने पर्ची मेरे हाथ से लेने के लिए हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। जैसे उसे छूने से कोई पुराना दरवाज़ा फिर खुल जाएगा।
“शायद उस रात के बाद, किसी रात,” उन्होंने कहा। “जब मैं ताले को संदूक में छिपा रहा था। शायद मैंने खुद से वादा किया था — कि अगर मैं न बोल सका, तो कोई और बोलेगा।”
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