The Mysterious Bell – Chapter 1394
"मतलब," मैंने कहा, "मैंने बाईस साल में अपनी माँ की असली हँसी नहीं सुनी?"
"तूने नहीं सुनी," पापा ने कहा। "वो मैंने छीन ली। उस रात। घंटी में बंद करते वक़्त।"
मैं खड़ा हो गया।
और मेरी जेब में घंटी — एक बार, बहुत छोटी आवाज़ में, जैसे कोई मुझसे बहुत दूर से कह रहा हो — बोली।
"ताला खुला है। पर अंदर से बंद है।"
मैंने ताले को देखा। वो मेज़ पर पड़ा था। आधा खुला। जैसे कोई दरवाज़ा जो बाहर से खुला लगता हो पर अंदर की तरफ़ कोई कुंडी लगा दे।
"पापा," मैंने कहा। "ये हँसी माँ को लौटाने का कोई तरीक़ा है?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"है," उन्होंने कहा। "पर वो वो तरीक़ा नहीं है जो तू सोच रहा है।"
"क्या मतलब?"
"मतलब," उन्होंने कहा, "ये ताला चाबी से खुलेगा ही नहीं। ये ताला सिर्फ॰ उस आदमी से खुलेगा जिसने इसे बंद किया था। और मैं—"
वो चुप हो गए।
"और आप?" मैंने कहा।
"मैं ही वो आदमी हूँ।"
मैं फिर से बैठ गया। उनके सामने।
"तो खोलिए," मैंने कहा। "अभी।"
पापा ने मेरी आँखों में देखा। बहुत देर देखा।
"अभी नहीं," उन्होंने कहा। "मैं उसे अभी नहीं खोल सकता।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे नहीं पता कि उस रात मैंने उस हँसी को सिर्फ़ घंटी में बंद किया या उसके साथ कुछ और भी बंद हो गया।"
मैंने घंटी हाथ में ली।
"कुछ और क्या?"
पापा ने मेरी हथेली पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था, पर शांत था — जैसे बहुत लंबी लड़ाई के बाद हाथ पहली बार जमीन पर रखा गया हो।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "आज शाम मैं मंच पर उस हँसी को खोलूँगा। सबके सामने। और अगर उसके साथ मेरा डर भी बाहर आ गया, तो जो होगा — मैं इस बार भागूँगा नहीं।"
मैंने घंटी जेब में रखी।
"ठीक है," मैंने कहा। "आज शाम।"
और तभी माँ की आवाज़ आँगन से आई—
"अंकुश! चाय ठंडी हो रही है!"
मैं हँसा। पापा भी हँसे — बहुत हल्का, बहुत छोटा, पर हँसे।
मैं आँगन में गया। माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, बाल सफ़ेद, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ, हाथ में मेरी चाय का कटोरा। उन्होंने मुझे दिया।
"ठंडी हो गई," उन्होंने कहा। "पापा से पता नहीं क्या बातें कर रहा था।"
मैंने कहा, "कुछ पुरानी बातें।"
"अच्छा।"
मैंने चाय पी। और मैंने माँ को देखा — उनकी आँखों को, उनके होंठों को, उनके हाथों को जो कटोरा पकड़े थे। और मुझे एहसास हुआ कि बाईस साल से मैं इस औरत को रोज़ देख रहा हूँ, पर उसकी असली हँसी नहीं सुन पाया।
"माँ," मैंने कहा।
"हूँ?"
"आज शाम मैदान में आओगी?"
वो थोड़ी देर मेरी तरफ़ देखती रहीं।
"तू आने को कह रहा है?" उन्होंने पूछा।
"हाँ।"
"तो आऊँगी।"
मैंने सिर हिलाया।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। पीछे मुड़ा। पापा आँगन में आए और माँ के पास बैठ गए। माँ ने उन्हें चाय का दूसरा कटोरा दिया। पापा ने लिया। उन्होंने चाय पी।
मैंने सोचा — आज शाम, मैदान में, जब पापा उस ताले को खोलेंगे — क्या होगा? क्या माँ की हँसी बाहर आएगी? क्या फिर कभी घर में वो हँसी सुनाई देगी?
मैं दरवाज़े से बाहर निकला। गली की धूप आँखों में लगी। सामने पीपल का पेड़ खड़ा था, उसके नीचे पत्थर की चबूतरी, और चबूतरी पर शबनम आपा की गुमटी से उठता धुआँ।
मेरी जेब में घंटी हल्की थी। ताला दूसरी जेब में भारी।
मैं चला।
आज शाम तक एक और रोज़ था। और उस रोज़ में — मैं जानता था — एक ऐसा सवाल था जिसका जवाब मंसूर चाचा के ताले में बंद था। और जो हँसी उस ताले में थी, वो सिर्फ़ माँ की हँसी नहीं थी — वो मेरे बचपन की हँसी भी थी, वो हँसी जो मैंने बाईस साल से सुनी नहीं, बस माँ की आँखों में हल्की-हल्की देखी थी, बिना जाने कि वो कहाँ से आती है।
आज शाम वो हँसी लौटेगी या नहीं — ये नहीं पता। पर मैंने ठान लिया था कि अगर ताले को खोलने के लिए पापा को अपना डर बाहर लाना पड़ेगा, तो मैं भी अपना डर बाहर लाऊँगा।
और मेरा डर क्या था?
ये नहीं कि रणवीर जीत जाएगा।
ये नहीं कि गली बिक जाएगी।
मेरा डर ये था कि मैं उस हँसी को पहचान भी नहीं पाऊँगा जो बाईस साल से मेरे घर से गायब थी।
मैं दुकान की तरफ़ बढ़ा। शटर उठाया। अंदर अँधेरा था, ग्रीस की गंध थी, और बस एक चीज़ थी जो साफ़ दिख रही थी — मेज़ पर रखा पापा का पुराना पेचकस।
मैंने उसे उठाया। उसके लकड़ी के हत्थे पर उँगली फिराई। और मुझे तभी याद आया — कल इसी पेचकस के हत्थे से निकले काग़ज़ में शंकरलाल का नाम था।
पापा का भाई।
जो पचास साल पहले गायब हुआ था।
मेरी जेब में घंटी हिली।
"कुछ और है," वो बोली।
"क्या?"
"ताले में सिर्फ़ हँसी नहीं है।"
मैंने उसे जेब से निकाला और हथेली पर रखा।
"तो क्या है?"
घंटी कुछ देर चुप रही। फिर बोली — बहुत धीमे, जैसे खुद भी नहीं जानती हो।
"तेरा बचपन।"
मैं दुकान के बाहर आया। आसमान में धूप चढ़ रही थी।
और मैंने उस लम्हे में शपथ ली — आज शाम के बाद, अगर माँ की हँसी लौटी, तो मैं उसे कभी किसी ताले में बंद नहीं होने दूँगा।
चाहे वो ताला रणवीर का हो।
चाहे पापा का डर।
चाहे मेरा अपना।
॥
मैंने पेचकस वापस मेज़ पर रखा और दुकान के पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। पीछे का कमरा हमेशा की तरह ठंडा था — आधा अंधेरा, आधी धूप, और पुराने औज़ारों की गंध। दीवार से टिकी लोहे की अलमारी, कोने में चारपाई, ऊपर लटकता वही बल्ब जो कभी-कभी गुनगुनाता था, और नीचे पुराना ट्रंक जिसकी पीतल की पट्टियों पर बरसों की धूल जमी थी।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पापा दरवाज़े पर खड़े थे।
उनके हाथ में चाय का कटोरा नहीं था। चश्मा कान पर टेप से बँधा था, कमीज़ की आस्तीन चढ़ी हुई थी, और आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने उनमें पहले कभी इतनी साफ़ नहीं देखी थी — डर नहीं, थकान नहीं, बस एक अधूरी बात जो बरसों से उनके सीने में खड़ी थी।
“बैठ जाओ, पापा,” मैंने कहा।
वो अंदर आए। धीरे से चारपाई के किनारे बैठे। मैंने ट्रंक पर बैठकर अपने घुटनों पर हाथ रखे। जेब में घंटी थी — हल्की, ठंडी, चुप।
कुछ देर कमरे में सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट रही।
फिर पापा ने साँस ली और बोलना शुरू किया।
“उस रात मैं अस्पताल में था। तेरी माँ का ऑपरेशन था। डॉक्टर ने कहा था कि पैसा जल्दी लगेगा। मेरे पास था ही नहीं। मैं खुद को कोस रहा था। फिर एक आदमी आया — सफ़ेद कुर्ता, हाथ में फाइल। उसने कहा कि साहब ने मदद के लिए कहा है, बस एक अंगूठा लगाना है। काग़ज़ मेरे सामने रखा गया। मैंने पढ़ा नहीं। मैंने सोचा — बीवी बच जाए, बाकी बाद में देखेंगे।”
उन्होंने रुककर अपने हाथों को देखा।
“मैंने अंगूठा लगा दिया।”
कमरे में हवा जैसे भारी हो गई।
“और उसी वक़्त घंटी बजी।”
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
“कौन सी घंटी?” मैंने पूछा, हालाँकि मुझे जवाब पता था।
“वही। दादा की साइकिल वाली। उस दिन मैं साइकिल से ही अस्पताल आया था। मेरी जेब में घंटी रखी थी — ब्रैकेट खुला था, मैंने सोचा कि जल्दी में साइकिल पर लगा दूँगा। फिर वो बजी। एक बार नहीं — दो बार। जैसे कोई मेरी कमीज़ के अंदर से मुझे रोक रहा हो।”
“तुमने सुना?”
“सुना।”
“तो फिर?”
पापा ने अपना चश्मा उतारा। टेप से बँधा हुआ चश्मा उनके हाथ में काँप रहा था।
“डर गया,” उन्होंने कहा। “आदमी जब डरता है ना, बेटा, तो उसे हवा भी भगवान की आवाज़ लगती है और अपनी ही आवाज़ भी मुर्दे की चीख। मैंने सोचा — नहीं, ये हवा है। जल्दी में ब्रैकेट से टकराई होगी। मैंने उसे जेब में और गहरे दबा दिया और अंगूठे वाले काग़ज़ की तरफ़ देखता रहा।”
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