The Mysterious Bell – Chapter 1393
काजल ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "तू पूछेगा?"
"सुबह," मैंने कहा। "जब वो उठें।"
"और अगर वो न बताएँ?"
मैंने ताले को देखा। वो मेज़ पर पड़ा था, आधा खुला, जैसे कोई दरवाज़ा जो अभी पूरा खुलने का इंतज़ार कर रहा हो।
"तो ये ताला खुद बता देगा," मैंने कहा।
काजल ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो मेरी आँखों में भी था।
"भैया," उसने कहा, "मुझे नींद नहीं आएगी।"
"मुझे भी नहीं।"
हम दोनों बैठ गए। मैं चारपाई पर, वो फ़र्श पर, पीठ दीवार से टिकाकर। मैंने ताले को सीने से लगाए रखा। वो थोड़ी देर में ठंडा हो गया, पर उसका वज़न वही रहा — भारी, ऐसा जैसे उसके अंदर कोई चीज़ बैठी हो।
रात बीती, बहुत धीरे। बाहर कभी कुत्ता भौंका, कभी किसी की चप्पल की आवाज़ आई, कभी पीपल की डाल हिली। मैंने सोचा — यही है वो रात जो बाईस साल से इंतज़ार कर रही थी। और मैं उसमें बैठा था, ताले को पकड़े, जैसे कोई भिखारी किसी खज़ाने की चाबी पकड़े हो और न जानता हो कि ताला कहाँ है।
सुबह पाँच बजे माँ का चूल्हा जला। मैं जानता हूँ, क्योंकि चूल्हे की आवाज़ मेरे कमरे तक आती है — पहले लकड़ी का चटकना, फिर घी का धुआँ, फिर बर्तन की तीन खट-खट।
मैं उठा। मुँह धोया। ताला जेब में नहीं डाला — उसे मेज़ पर ही रखा, चिट्ठी के साथ। और फिर बाहर आया।
पापा आँगन में बैठे थे। वो अपने औज़ारों का ट्रंक खोलकर एक-एक औज़ार साफ़ कर रहे थे — यही उनका रोज़ का काम था, जब घर में कोई न हो। पीतल का पुराना पेचकस, रिंच, हथौड़ा, पेचकस का टेप बँधा हत्था। वो उन्हें पोछते थे, ऊपर उठाकर देखते थे, फिर तौलिये पर रख देते थे।
मैं उनके पास बैठ गया।
कुछ देर कुछ नहीं बोला। बस बैठा रहा। पापा ने मेरी तरफ़ देखा, फिर अपने औज़ारों में लौट गए।
"पापा," मैंने कहा।
"हूँ।"
"आज शाम सात बजे मैदान में सब कुछ खुलेगा।"
"हाँ।"
"तो एक सवाल भी खुल जाना चाहिए।"
पापा का हाथ रुका। वो एक रिंच पकड़े थे, आधी साफ़ की हुई। वो रुके रहे, फिर उसे धीरे से तौलिये पर रख दिया।
"कौन सा सवाल?" उन्होंने पूछा, बिना मेरी तरफ़ देखे।
मैंने चिट्ठी जेब से निकाली और उनकी तरफ़ बढ़ा दी।
पापा ने पढ़ा। बहुत धीरे पढ़ा — एक-एक अक्षर जैसे तौल रहे हों। फिर वो उसे वापस मेरी तरफ़ बढ़ाने लगे, फिर रोक दिया, और उसे अपने घुटनों पर रख लिया।
"तूने ये कहाँ से लिया?" उन्होंने पूछा।
"रात दरवाज़े पर पड़ी थी। ताले के साथ।"
"कौन सा ताला?"
"मंसूर चाचा के बक्से वाला। जिसका जुड़वाँ रणवीर के घर है।"
पापा ने एक लंबी साँस ली। बहुत लंबी, जैसे बहुत साल से रोकी हुई हो।
"और ये चिट्ठी?" उन्होंने पूछा।
"उसी ताले से चिपकी थी। बिना नाम, बिना मोहर।"
वो चुप हो गए।
मैंने उन्हें देखा। उनकी आँखें चश्मे के पीछे कुछ ऐसे देख रही थीं जो वहाँ नहीं था।
"पापा," मैंने कहा, "ये बात क्या है जो मैंने आज तक नहीं पूछी?"
पापा ने औज़ार साफ़ करना जारी रखा। पर मैं देख सकता था कि उनके हाथ काँप रहे थे। वो रिंच को तीन बार पोंछ चुके थे और अब चौथी बार पोछ रहे थे।
"ये सवाल आसान नहीं है," उन्होंने कहा, बहुत धीमे, जैसे हर शब्द किसी पुराने ताले से खींच रहे हों।
"आज कोई सवाल आसान नहीं है, पापा," मैंने कहा। "आज शाम सब कुछ खुलेगा। पूरी गली सामने होगी। मंसूर चाचा का ताला, हरिप्रसाद का नाम, पाँच नामों वाली दीवार, छठी खाली जगह, आठवाँ नाम, सात पन्ने, तीन हाथ — सब बाहर आएगा। तो ये एक सवाल भी खुल जाना चाहिए।"
मैंने रुककर उनकी आँखों में देखा।
"मैंने आपसे कभी नहीं पूछा कि आपने अंगूठा क्यों लगाया। शायद इसलिए कि मुझे जवाब से डर लगता था। या शायद इसलिए कि मुझे लगता था कि जवाब मुझे पता है।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "जवाब तुझे पता नहीं है।"
"तो बताइए।"
उन्होंने चश्मा उतारा। उसे पोंछा, फिर अपने घुटने पर रख दिया। उनकी आँखें बिना चश्मे के छोटी दिख रही थीं — जैसे वो बहुत थक गए हों, बहुत लंबी दूरी से आए हों।
"वो सवाल ये नहीं है," उन्होंने कहा। "सवाल ये है कि उस रात मैंने घंटी क्यों छिपाई थी।"
मैं ठिठक गया।
"कौन सी रात?"
वो चुप रहे।
"पापा —" मैंने कहा, "कौन सी रात?"
उन्होंने धीरे से अपना चश्मा उठाया और पहन लिया। फिर अपने औज़ार उठाकर ट्रंक में रखने लगे, बहुत धीरे, इतने धीरे कि जैसे उन्हें तोड़ने का डर हो।
"बाईस साल पहले," उन्होंने कहा। "जिस रात माँ का ऑपरेशन हुआ था।"
मेरा दिल रुक गया। या तेज़ हो गया। पता नहीं। पर तभी मेरी जेब में घंटी हिली — नहीं, हिली नहीं, काँपी। जैसे किसी ने उसे छुआ हो।
"उस रात," पापा ने कहा, "मैं अस्पताल के बाहर बैठा था। मेरे हाथ में यही घंटी थी — यही, जो आज तेरी जेब में है। वो उस रात अपने आप बजी।"
"बजी?" मैंने पूछा। "कैसे?"
"मुझे भी नहीं पता। फिर बजी। फिर बोली।"
"क्या बोली?"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में जो था, मैंने वो बाईस साल में कभी नहीं देखा था।
"उसने कहा — तेरे हाथ में वो है जो तुझे नहीं मिला।"
कमरे में चुप्पी छा गई। इतनी बड़ी कि दीवार भी सुन रही हो।
"और फिर उसने कहा," पापा की आवाज़ टूट रही थी, "कि ये घंटी सिर्फ़ दो लोगों के बीच बोलती है। जो सच बोलें। और मैं— मैं उस रात सच नहीं बोल सका।"
"कौन सा सच?"
पापा कुछ देर चुप रहे। फिर वो उठे और मेरे पास आकर बैठ गए — पहले कभी ऐसे नहीं बैठे थे।
"वो सच," उन्होंने कहा, "जो मैंने उस रात छिपाया। उस रात माँ को बचाने के लिए कुछ अंगूठे लगे, कुछ दस्तख़त हुए। पर उस रात जो घंटी बजी — वो माँ की हँसी से बजी थी।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"माँ की हँसी?"
"हाँ।"
"पर माँ तो—"
"माँ उस रात ठीक थीं। ऑपरेशन के बाद भी हँसी थीं। वो हँसती थीं, मुझे देखकर, तुझे देखकर। फिर बाद में — बाद में बहुत बीमार पड़ीं। और उनकी आख़िरी जो हँसी थी, वो इस घंटी में बंद हो गई।"
मैंने घंटी जेब से निकाली। वो ठंडी थी, पर जैसे कोई ठंडी चीज़ जिसे अभी-अभी हाथ से रखा गया हो।
"मैं समझा नहीं," मैंने कहा।
पापा ने उस घंटी को देखा। बहुत देर देखा। फिर उन्होंने कहा—
"उस ताले में — मंसूर चाचा के ताले में, जो तेरे पास है — वहाँ मेरा डर नहीं बंद है, अंकुश। वहाँ तेरी माँ की हँसी बंद है। वो हँसी जो मैंने उस रात घंटी में बंद कर दी थी, क्योंकि मुझे लगा था कि अगर वो हँसी घंटी में नहीं बंद रहेगी तो घंटी मुझे बोलती रहेगी।"
मैंने ताला जेब से निकाला। वो हाथ में ठंडा था। पर जैसे ही वो घंटी के पास आया — वो फिर हल्का गरम हुआ।
"और ऐसा इसलिए नहीं कि वो हँसी मरी," पापा ने कहा, "माँ अब भी हँस सकती हैं। वो अब भी तेरे सामने बैठकर हँसती हैं जब तू कुछ बेवकूफ़ी करता है। पर वो असली हँसी — वो हँसी जो पेट से आती थी, आँखों से — वो आख़िरी बार मैंने तब सुनी थी जब तू—"
वो रुक गए।
"जब मैं क्या?"
"जब तू बहुत छोटा था।"
मुझे कुछ याद नहीं आया। कोई हँसी, कोई आवाज़, कुछ भी नहीं।
"माँ की असली हँसी," मैंने धीरे से कहा, "कब से नहीं सुनी?"
पापा ने सिर झुका लिया।
"बाईस साल से," उन्होंने कहा।
और तभी मेरे हाथ में ताला और गरम हो गया। मैंने उसे मेज़ पर रख दिया। वो धड़ाम से नहीं गिरा, बस पड़ गया।
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