The Mysterious Bell – Chapter 1392
"पढ़िए।"
"पूरी?"
"पूरी नहीं," मैंने कहा। "जितनी उसका हक़ है, उतनी। हम किसी को बर्बाद नहीं कर रहे। हम सिर्फ़ उसका सच वापस कर रहे हैं जो उनसे छीना गया।"
वो कुछ देर मुझे देखते रहे। फिर बोले, "तुम पापा जैसे नहीं हो।"
"पता है," मैंने कहा। "पर आज मुझे लगता है कि मैं पापा जैसा होना चाहता हूँ। वो मुझसे बहादुर निकले।"
वो हँसे — बहुत छोटी सी हँसी, जैसे बूढ़े पेड़ पर एक पत्ता हिला हो। फिर बत्ती बुझ गई।
मैं दुकान के बाहर आया। गली सो रही थी। पीपल की छाया चाँद की रोशनी में ज़मीन पर लेटी थी और दूर कहीं कोई कुत्ता भौंक रहा था।
मैंने घंटी जेब से निकाली।
"अब बताओ," मैंने कहा।
वो गरम थी।
घंटी ने कहा, "आज रात कुछ खुलेगा नहीं। आज रात कुछ बंद होगा।"
"क्या?"
"तेरा डर," उसने कहा। "कि तू अकेले सब नहीं कर सकता।"
मैं मुस्कुराया।
"घंटी," मैंने कहा, "तू बड़ी फ़िलॉसफ़र हो रही है।"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस इतना गरम रही कि पता चले।
मैं घर गया। माँ ने दाल-रोटी रखी थी। काजल ने मेरी थाली में अचार डाला और अपनी किताब लेकर बैठ गई। पापा पहले से सो रहे थे — या सोने का नाटक कर रहे थे, पता नहीं।
मैंने खाना खाया। माँ ने पूछा, "गोविंद ने खाया?"
"खाया," मैंने कहा। "तीन समोसे और आपकी दाल-रोटी।"
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, "कल सुबह उसके लिए भी टिफ़िन ले जाऊँगी। उसका चेहरा देखकर लगता है कि वो बहुत दिनों से ठीक से नहीं खाया।"
मैंने सिर हिलाया।
और फिर हम सो गए।
मुझे नींद नहीं आई। मैं छत पर गया और लेट गया। आसमान में तारे थे और पीपल की डाल हवा में हिल रही थी।
मैंने सोचा — कल। कल शाम सात बजे। कल उस मैदान में वो सब होगा जिसका इंतज़ार बाईस साल से हो रहा था।
और मुझे नींद आ गई।
पता नहीं कब।
फिर मैं जगा — एक आवाज़ से। घर के दरवाज़े पर।
तीन धीमी दस्तकें।
धीमी। बहुत धीमी। ऐसी नहीं जैसे कोई माँगने आया हो। ऐसी जैसे कोई देने आया हो।
मैं उठा। सीढ़ी से नीचे उतरा। काजल भी जग गई थी और दरवाज़े के पीछे खड़ी थी, आँखें फुली हुई।
"कौन?" उसने धीरे से पूछा।
मैंने उसे हाथ से रोका और बोला, "मैं देखता हूँ। तू पीछे रह।"
दरवाज़ा खोला।
बाहर कोई नहीं था।
गली खाली थी। चाँद की रोशनी में धूल चमक रही थी और दूर कहीं साया भी नहीं था। हवा भी रुकी हुई थी, जैसे उसे भी बताया गया हो कि आज रात कुछ नहीं करना।
मैंने नीचे देखा।
दहलीज़ पर वही पुराना ताला पड़ा था — मोटा, काला, ज़ंग लगा। वही ताला जो मंसूर चाचा के बक्से से निकला था। जिसका जुड़वाँ रणवीर के घर में था। जिसके छेद में पीला काग़ज़ फँसा था।
मैं झुककर उसे उठाने ही वाला था कि देखा — उससे एक चिट्ठी चिपकी हुई थी।
मैंने उसे उतारा। चिट्ठी बहुत सादी थी, बिना नाम, बिना मोहर। पर उस पर जो लिखा था, वो पढ़कर मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"कल सच बोलना, पर पहले पापा से वो बात पूछना जो कभी नहीं पूछी।"
काजल ने मेरे कंधे से झाँका।
"क्या लिखा है?" उसने पूछा।
मैंने उसे चिट्ठी दी।
वो पढ़कर रुकी।
"कौन सी बात?" उसने धीरे से पूछा।
मैंने ताला उठाया। वो बर्फ़ जैसा ठंडा था और उसका वज़न हाथ में भारी उतर रहा था, जैसे उसके अंदर कोई याद बंद हो — ऐसी याद जो अभी बोली नहीं, बस साँस ले रही थी।
और मेरी जेब में घंटी, एक बार, बहुत छोटी आवाज़ में, जैसे कोई मुझसे बहुत दूर से कह रहा हो कि यह सवाल पूछने का वक़्त आ गया है — और मैं जानता था कि यह सवाल मैंने बाईस साल से नहीं पूछा था, और पापा ने भी नहीं पूछा था। और शायद यही वो सबसे बड़ी चुप्पी थी जो हमारे घर में पीढ़ियों से बंद थी।
मैंने दरवाज़ा बंद किया, ताला सीने से लगाया और काजल की तरफ़ देखा।
"कल सुबह," मैंने कहा, "मैं पापा से वो बात पूछूँगा।"
काजल ने सिर हिलाया। और उसकी आँखों में वो डर था जो मेरी आँखों में भी था — कि जो जवाब मिलेगा, वो शायद कल की सभा से भी भारी होगा।
॥
मैंने दरवाज़ा बंद किया और ताला सीने से लगाया। काजल सामने खड़ी थी, आँखें फुली हुई, होंठ काँपते हुए।
"क्या हुआ?" उसने पूछा। "कौन था?"
"कोई नहीं था," मैंने कहा। "बस ये पड़ा था।"
मैं कमरे के अंदर आया। बल्ब जलाया। पीली रोशनी फैली और मैंने ताला मेज़ पर रखा। काला, भारी, ज़ंग में लिपटा हुआ। मंसूर चाचा का ताला। जिसके छेद में पीला काग़ज़ फँसा था।
काजल ने चिट्ठी अपने हाथ में ले ली थी और बार-बार पढ़ रही थी, जैसे पढ़ने से उसका मतलब बदल जाएगा।
"भैया," उसने धीरे से कहा, "ये वही ताला है?"
"हाँ।"
"जिसका जुड़वाँ रणवीर के घर में है?"
"हाँ।"
वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "तो ये यहाँ कैसे आया? किसने लाया?"
"यही तो सवाल है," मैंने कहा। "मंसूर चाचा मरे। उसका भतीजा ताला बक्से के साथ लाया था। पर वो ताला तो बक्से के अंदर बंद था। ये अलग है।"
मैं झुका और ताले को गौर से देखने लगा। उसकी सतह पर जो ज़ंग थी, वो कहीं-कहीं टूटी हुई थी — जैसे किसी ने उसे हाल में छुआ हो। छेद के अंदर वो पीला कोना अब भी फँसा था। मैंने उँगली डालकर उसे निकालने की कोशिश की, पर वो अंदर से जैसे चिपक गया था।
और तभी — मेरी गर्दन में कुछ हिला।
पापा की पुरानी चाबी।
मैंने उसे पहनी हुई थी — वही काली, छोटी, घिसी हुई चाबी जो पापा ने मुझे पंद्रह-सोलह साल की उम्र में दी थी और कहा था, "इसे कभी मत उतारना। किस चीज़ की है, ये मैं नहीं बताऊँगा।"
वो चाबी ताले के करीब आई।
और ताला — हल्का गरम हो गया।
इतना हल्का नहीं जितना कोई चीज़ जलाती हो। इतना, जैसे किसी ने उसे हथेली में पकड़ रखा हो और छोड़ देने का इंतज़ार कर रहा हो।
काजल ने देखा। "भैया, तुम्हारा हाथ… तुमने क्या किया?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस चाबी पास आई।"
मैंने चाबी उतारी और ताले के छेद के पास लाई। और ताला — मैं झूठ नहीं बोलूँगा — आधा खुल गया। धड़ाम से नहीं। चटककर नहीं। बस — जैसे किसी ने लंबी साँस छोड़ी हो और धातु भीतर से ढीली पड़ गई हो।
काजल ने मेरा हाथ पकड़ लिया। "भैया…"
"देख रहा हूँ," मैंने कहा।
मैंने ताले को कान के पास उठाया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी। न घंटी की, न मंसूर चाचा की, न किसी और की। बस एक एहसास था — जैसे धातु के अंदर कोई चीज़ साँस ले रही है, बहुत धीरे, बहुत थकी हुई।
और तभी, बहुत दूर से, मुझे एक आवाज़ सुनाई दी।
हँसी।
माँ की हँसी।
पर माँ तो ऊपर सो रही थीं, बुखार से कमज़ोर, बिस्तर से उठ नहीं सकती थीं। फिर ये हँसी कहाँ से?
ये हँसी मैंने बहुत सालों बाद सुनी थी। और ये वैसी हँसी थी जैसी माँ हँसती थीं, बहुत पहले — जब हमारा घर छोटा था और दुकान में पापा की जगह दादा बैठते थे और मैं साइकिल के पहिये के पास बैठकर चेन में उँगली डालने की कोशिश करता था और माँ मुझे डाँटती थीं, हँसते हुए। जैसे डाँट में भी हँसी छिपी हो।
वो हँसी कमरे में गूँजी — एक पल के लिए — और फिर सब चुप हो गया।
काजल मेरी तरफ़ देख रही थी।
"तूने सुना?" मैंने पूछा।
उसने सिर हिलाया। "माँ जैसा लगा," उसने कहा। "पर माँ तो ऊपर…"
"हाँ।"
हम दोनों कुछ देर चुप खड़े रहे। ताला मेज़ पर पड़ा ठंडा हो रहा था, धीरे-धीरे। जैसे उसने अपना काम कर दिया हो।
मैंने चिट्ठी उठाई और फिर से पढ़ी।
"कल सच बोलना, पर पहले पापा से वो बात पूछना जो कभी नहीं पूछी।"
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