The Mysterious Bell – Chapter 1391
"मतलब, अब वो हमला नहीं कर रहा। वो बचाव कर रहा है। और जो बचाव करता है, वो जानता है कि उसके पास खोने को कुछ है।"
तभी टिंकू की आवाज़ आई — बहुत धीमी, दरवाज़े के पीछे से।
"उस्ताद।"
मैं उठा। "क्या हुआ?"
वो दरवाज़े की दरार से सिर निकालकर बोला, "वो दोनों निकल गए। शबनम आपा ने उन्हें दो कप चाय पिलाई, दो समोसे खिलाए, अठारह रुपये लिए और पुराने बाज़ार की तरफ़ भेज दिया।"
"किस रास्ते से?"
"ऐसे रास्ते से जो बंद है।"
मैं हँस पड़ा।
"टिंकू," मैंने कहा, "तू ज़रा अंदर आ जा।"
वो अंदर आया। मैंने उसे देखा तो पता चला कि उसके होठों पर समोसे की परत लगी थी और जेब से समोसे का काग़ज़ झाँक रहा था।
"तूने भी खाए?" मैंने पूछा।
वो सकपका गया। फिर ईमानदारी से बोला, "तीन।"
"तीन?"
"गोविंद भाई ने खाए," उसने कहा। "मैंने गिन लिए। उन्होंने तीन खाए। एक भी नहीं छोड़ा। और उस्ताद, मैंने देखा — पहला समोसा खाते वक़्त उनके हाथ काँप रहे थे, दूसरा खाते वक़्त कम, और तीसरा खाते वक़्त बिल्कुल नहीं।"
मैं चुप हो गया।
टिंकू ने जेब से काग़ज़ निकाला और फिर कुछ सोचकर पूछा, "उस्ताद, एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"ये तीन समोसे काली बही में लिखेंगे?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
"क्योंकि उस बही में हर चीज़ के आगे बाकी लिखा है," उसने कहा। "तो क्या समोसे भी बाकी में जाएँगे?"
कमरे में जो लोग थे, सब रुक गए।
और फिर, धीरे-धीरे, एक-एक करके, हँसी फूटने लगी। पहले काजल हँसी, फिर मीरा, फिर शबनम आपा बाहर से, फिर दुबे अंकल जिन्होंने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिका दी और हँसते हुए आँखें पोंछीं।
पीछे वाले कमरे के दरवाज़े से एक आवाज़ आई — फटी, भारी, पर हँसने की कोशिश करती हुई।
गोविंद भाई की आवाज़।
"लिख लो," उन्होंने कहा। "लिख लो, बेटा। तीन समोसे — बाकी। पूरी ज़िंदगी में पहली बार कोई मेरा ये हिसाब भी रख रहा है।"
और फिर उन्होंने फूट-फूटकर रोना शुरू कर दिया।
मैं अंदर गया। वो ट्रंक के पीछे बैठे थे, दोनों हाथ घुटनों पर, और रो रहे थे — वैसे नहीं जैसे बच्चे रोते हैं, वैसे भी नहीं जैसे बूढ़े रोते हैं। वैसे रो रहे थे जैसे कोई आदमी बहुत सालों बाद साँस ले रहा हो और उसे पता चल रहा हो कि उसकी छाती में जगह अभी भी बची है।
मैं उनके पास बैठ गया। कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप्पी भी एक चीज़ होती है जो इंसान को थाम लेती है।
तभी बाहर से आवाज़ आई। घर की सीढ़ी की आवाज़ — जानी-पहचानी, जल्दबाज़ नहीं।
माँ आई थीं।
उनके हाथ में टिफ़िन था। सिर पर दुपट्टा उतरा हुआ था और माथे पर चंदन का टीका था। वो अंदर आईं और एक पल को रुकीं, फिर सीधा पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ीं।
"माँ," मैंने कहा, "आप बैठिए, मैं ले आता हूँ।"
"तू हट," उन्होंने कहा — कड़क। "मैं खुद जाऊँगी।"
वो अंदर गईं। मैं पीछे खड़ा रहा।
माँ ने अंधेरे कमरे में उन्हें देखा, फिर टिफ़िन खोला और उनके सामने फ़र्श पर बैठ गईं।
"अब चुपचाप खाओ," उन्होंने कहा।
गोविंद भाई हड़बड़ा गए। "बहन जी, मैं… मैं हाथ धो लूँ—"
"हाथ बाद में। पहले दो कौर।"
उन्होंने अपनी हथेली में एक रोटी रखकर उनकी तरफ़ बढ़ाई और साथ में दाल का कटोरा।
गोविंद भाई ने हाथ जोड़े। उनके हाथ अब भी काँप रहे थे।
"आप…" उनकी आवाज़ रुक रुककर आ रही थी। "आप सब जानती हैं ना? मैंने क्या-क्या किया है?"
"जानती हूँ," माँ ने कहा। "मेरे पति का अंगूठा लेने वाले आदमी को मैं नाम से जानती हूँ।"
गोविंद भाई का सिर झुक गया। उनकी आँखों से पानी टपककर रोटी पर गिरा।
"तो फिर आप…" उन्होंने कहा।
माँ ने उनकी तरफ़ देखा।
"सुनो, गोविंद," उन्होंने कहा। "जो आदमी डरकर छिपा है, उसे भूखा नहीं रखा जाता। अगर हम भूखा रखेंगे तो वो वैसा ही रहेगा जैसा उसे डराने वाले चाहते हैं। खाओ।"
उन्होंने एक कौर मुँह में रखा। फिर दूसरा। फिर तीसरा।
और फिर, जैसे किसी टूटे ताले से आवाज़ आती है, उन्होंने हाथ जोड़कर मेरी तरफ़ देखा और कहा —
"बेटा, आज पूरी ज़िंदगी में पहली बार मुझसे किसी ने हिसाब नहीं पूछा। मेरा हाल पूछा। मैं… मैं बत्तीस साल से रोज़ डरता आया हूँ कि कोई मुझसे कहेगा — बता, तूने क्या किया। और आज जब किसी ने पूछा कि तू ठीक है, तो मैं जवाब नहीं दे पाया।"
कमरे में सन्नाटा था।
माँ ने उनके सिर पर हाथ रखा — वैसे ही जैसे वो मेरे सिर पर रखती हैं जब मैं आधा रात घर लौटता हूँ।
"खत्म करो अब," उन्होंने धीरे से कहा। "बत्तीस साल रोया जा चुका। अब कल की तैयारी करो।"
तभी बाहर से पापा की आवाज़ आई।
"काजल, मेरा कोट दे तो ज़रा।"
मैं बाहर आया। पापा सीढ़ी के पास खड़े थे। उन्होंने पुरानी नीली शर्ट पहन रखी थी — वही जो उन्होंने थाने के दिन पहनी थी — और हाथ में चश्मा था जिसका कान टेप से बँधा था।
"कहाँ जा रहे हैं?" मैंने पूछा।
"थाने," उन्होंने कहा। "काग़ज़ी शिकायत दर्ज कराने। कि गोविंद भाई के काग़ज़ उनकी मर्ज़ी के बिना थे।"
मैं रुक गया।
"पापा, अभी रात होने वाली है। और अभी दरोगा…"
"दरोगा जो भी करे," पापा ने कहा। "मैं कल मंच पर जब खड़ा होऊँगा, तब मेरे साथ गोविंद भी खड़ा होगा। और उसके साथ खड़े होने का मतलब यह नहीं कि मैं सिर्फ़ मंच पर उसका हाथ पकड़ लूँ। मतलब यह है कि आज रात, जब सब सो रहे हों, तब भी मैं उसके साथ हूँ।"
उन्होंने चश्मा पहना।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "मैंने बाईस साल काग़ज़ों में झुककर काम किया, अपना सिर नीचा रखा। आज मैं सीधा खड़ा होकर बोलूँगा। और जो मेरे साथ उस दिन सबसे पहले डरा था, वो भी सीधा खड़ा होकर बोलेगा।"
उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया और बाहर चले गए। मैं उन्हें देखता रहा।
और मुझे लगा — पापा आज शाम असल में पहली बार गली में ऐसे चल रहे हैं जैसे उनका घर उनका हो।
उसके बाद वो सब हुआ जो हर शाम होता है और आज हर शाम जैसा नहीं लगा।
शबनम आपा ने बाहर चूल्हा जलाया और सबको चाय पिलाई — इस बार पैसे लिए बिना। उन्होंने बताया कि उनके दो आदमी पुराने बाज़ार में एक बंद गली में धक्के खा रहे हैं और उन्होंने उन्हें "पीछे से जाने" का रास्ता बताया था, जिससे वो बिजलीघर की तरफ़ निकल गए।
"वहाँ कोई नहीं रहता," शबनम आपा ने कहा। "वहाँ सिर्फ़ बक्से रहते हैं। चले जाएँगे, थक जाएँगे, हार जाएँगे।"
दुबे अंकल ने थाने से आकर बताया कि दरोगा ने आज शाम की सभा पर एक आदेश लगा दिया है — "तनाव की आशंका" वाला। सभा कल शाम सात बजे होगी।
इस खबर पर किसी ने नाराज़गी नहीं दिखाई।
मैंने देखा, सबने राहत की साँस ली। क्योंकि सबको पता था कि एक रात और मिलना मतलब एक और मौका मिलना।
उस्ताद ने तब कहा — "जो आदमी अपना मुक़दमा एक दिन आगे खिसकाता है, वो अक्सर खुद डरा होता है।" और उन्होंने अपनी मशीन पर से सफ़ेद कपड़ा उतार लिया।
मीरा ने कहा कि वो रात भर जागकर सब काग़ज़ एक जगह लगाएगी। शालिनी ने कहा कि वो हरिप्रसाद के नाम की हर तारीख़ अलग पर्ची पर लिखेगी। काजल ने कहा कि वो माँ की दवा की सूची बनाएगी। सानिया और गुड्डू ने कहा कि वो पुराने बाज़ार के खाली मकानों की सूची बनाएँगे।
और रात ग्यारह बजे के आसपास, एक-एक करके, सब अपने घर चले गए।
मैंने गोविंद भाई को पीछे वाले कमरे में ही सोने दिया — चारपाई पर, अपना ही कंबल डालकर। उन्होंने पहले मना किया, फिर मान गए।
"बेटा," सोने से पहले उन्होंने कहा, "कल मैं बही पढ़ूँगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno