The Mysterious Bell1390 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1390

7 min read November 5, 2026

॥

"तीस मिनट," मैंने खुद से कहा। "तीस मिनट में हम वहाँ होंगे।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा और इशारा किया कि कैमरा बंद कर दे। वो समझ गई। भीड़ अभी भी कमरे के अंदर थी — कोई बही देख रहा था, कोई गोविंद भाई के पास बैठा था, कोई दरवाज़े पर खड़ा था। शाम की रोशनी दुकान के बाहर बरामदे तक आ रही थी और धूल में सुनहरा रंग घुल रहा था।

मैं सीढ़ी से नीचे उतरा ही था कि गली के मोड़ से टिंकू भागता हुआ आया। उसकी चप्पल एक हाथ में थी और दूसरे हाथ में कुछ ऐसा जो उसने भागते-भागते उठाया था — पता नहीं क्या।

"उस्ताद!" वो हाँफ रहा था। "उस्ताद, दो आदमी!"

मैं रुका।

"कौन से दो आदमी?"

"सफ़ेद कुर्ता, फाइल, और एक के हाथ में कुछ है — जैसे कोई लोहे का डिब्बा हो।" टिंकू ने साँस खींची। "वो पूछ रहे हैं गोविंद भाई कहाँ हैं।"

मेरे पेट में कुछ ठंडा-सा उतरा।

मैंने पलटकर दरवाज़े की तरफ़ देखा। अंदर गोविंद भाई बेंच पर बैठे थे, चश्मा हाथ में, आँखें लाल। वो अभी भी काँप रहे थे — वैसे ही काँप रहे थे जैसे बाईस साल से काँपते आ रहे थे, बस आज पहली बार किसी के सामने।

मैंने पीछे मुड़कर पूछा, "कहाँ हैं वो?"

"पीपल के पास," टिंकू ने कहा। "और सुनो — बबलू भैया ने उन्हें कुछ कह दिया है। मैंने दूर से देखा, वो उनके कान में कुछ बोले और वो दोनों गुमटी की तरफ़ मुड़ गए।"

मेरा मुँह खुल गया।

"बबलू ने?"

"हाँ। और बबलू भैया ने कहते वक़्त ऐसे हाथ हिलाए जैसे कोई रास्ता दिखा रहे हों।"

मैंने एक गहरी साँस ली और अंदर झाँका।

"गोविंद भाई," मैंने कहा, "उठिए।"

उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखों में वो डर था जो इंसान के चेहरे पर बचपन से बैठ जाता है और फिर कभी नहीं उतरता।

"वो… वो आ गए?" उनकी आवाज़ फटी।

"आए हैं," मैंने कहा। "पर आपको कुछ नहीं होगा। आप मेरे पीछे आइए।"

"कहाँ?"

"पीछे वाले कमरे में।"

पापा आगे आए। "मैं साथ चलता हूँ।"

"नहीं," मैंने कहा। "आप यहीं रहिए। अगर उन्होंने पूछा तो आप बैठे रहिए, चाय पीजिए, कुछ मत बोलिए। जितना कम बोलेंगे, उतना अच्छा।"

पापा ने मेरी आँखों में देखा और फिर सिर हिलाया। पिछले कुछ दिनों में उन्होंने यह सीख लिया था — हर जगह खुद खड़े होना ज़रूरी नहीं होता। कभी-कभी बैठे रहना भी एक काम होता है।

मैं गोविंद भाई को लेकर पीछे वाले कमरे की तरफ़ बढ़ा। वो लड़खड़ा रहे थे। उनका हाथ मेरे कंधे पर था और उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, जैसे कोई बूढ़ा काग़ज़।

कमरे में पहुँचकर मैंने उन्हें औज़ारों के ट्रंक के पीछे वाली जगह पर बैठाया। वहाँ अंधेरा था और बाहर से कोई सीधे नहीं देख सकता था।

"आप यहाँ रहिए," मैंने कहा। "साँस धीमी। कोई आवाज़ नहीं।"

"अंकुश," उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। "तुम्हें पता है मैंने क्या किया है?"

"पता है," मैंने कहा।

"फिर भी तुम मुझे छिपा रहे हो?"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। कमरे में जलता हुआ पुराना बल्ब गुनगुना रहा था।

"गोविंद भाई," मैंने कहा, "जिस आदमी ने अपनी गलती कबूल कर ली हो, उसे छिपाना मेरा काम नहीं, उसे बचाना मेरा काम है। बाकी बातें शाम को।"

मैं बाहर आया और दरवाज़े पर टिंकू को खड़ा किया।

"यहीं खड़ा रह," मैंने कहा। "जो भी अंदर आने की कोशिश करे, पहले तू।"

"और अगर वो ज़ोर लगाएँ?"

"तो ज़ोर मत लगाने दे।"

टिंकू ने गंभीरता से सिर हिलाया। फिर उसने जेब से एक टूटा हुआ शीशा निकाला और दरवाज़े की कील पर टाँग दिया।

"यह क्या है?" मैंने पूछा।

"जासूसी का शीशा," उसने कहा। "अगर कोई आया तो उसका चेहरा इसमें दिखेगा और मुझे पता चल जाएगा।"

"टिंकू, वो शीशा उल्टा टँगा है। उसमें तेरा ही मुँह दिखेगा।"

वो दो सेकंड रुका, फिर बोला, "तो मुझे भी पता चल जाएगा कि मैं यहाँ हूँ।"

मैं हँसा। आज पूरे दिन में पहली बार हँसा। और यह हँसी अंदर तक गई।

मैं बाहर बरामदे में आया। गली में शाम की धूल धीमी हो रही थी। दो सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी गुमटी की तरफ़ जा रहे थे और पीछे से बबलू उन्हें रास्ता दिखा रहा था — हाथ हिलाकर, बड़े भाई की तरह, ऐसे जैसे वो उनका हितैषी हो।

मैंने उसे देखा और मन ही मन कहा — बबलू, तू आज कुछ और है।

उन दोनों के जाने के बाद बबलू पलटा और सीधा मेरी दुकान की तरफ़ आया। वो सीढ़ी के नीचे रुका और मेरी तरफ़ देखकर धीरे से बोला, "पीछे वाले कमरे में है न?"

मेरे हाथ से घंटी फिसलने लगी।

"तूने उन्हें क्यों भेजा?" मैंने पूछा।

"क्योंकि अगर वो खुद ढूँढते तो तेरे यहाँ से शुरू करते," बबलू ने कहा। "मैंने उन्हें बता दिया कि गोविंद भाई सुबह गुमटी पर चाय पीने आए थे और शबनम आपा से कुछ पूछ रहे थे। अब वो वहाँ पहुँचेंगे और शबनम आपा उन्हें ऐसा रास्ता दिखाएँगी जिससे वो पुराने बाज़ार की तरफ़ निकल जाएँ।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"तूने ये क्यों किया?"

बबलू ने पान निकाला, फिर वापस जेब में रख दिया — जैसे उसे याद आया कि आज पान चबाने का दिन नहीं है।

"क्योंकि कल मैंने कहा था कि सच बोलूँगा," उसने कहा। "और जो सच बोलने की तैयारी करे, उसे किसी का खून अपने हाथ नहीं लेना चाहिए। गोविंद भाई अगर उनके हाथ लगे, तो कल सुनने को कोई नहीं बचेगा।"

वो मुड़ा और चला गया।

मैं कुछ देर खड़ा रहा। शाम की हवा में एक अजीब सी बात थी — जैसे पूरी गली ने साँस रोक ली हो और सब इंतज़ार कर रहे हों कि अगला कदम कौन उठाएगा।

फिर गुमटी की तरफ़ से आवाज़ आई। शबनम आपा की आवाज़ — तेज़, साफ़, और उसमें वो मिठास जो सिर्फ़ ग्राहक के लिए होती है।

"अरे, आइए आइए! चाय पीजिए, समोसा गरम है। दो रुपये की चाय, दस का समोसा! बैठिए, आराम से बैठिए।"

मैं हँसा। शबनम आपा को कोई गुमराह नहीं कर सकता। वो खुद गुमराह करती हैं।

मैं अंदर आया। काजल दरवाज़े पर खड़ी थी और उसके हाथ में नर्सिंग की किताब थी, जिसे वो खोल भी नहीं रही थी।

"गोविंद भाई ठीक हैं?" उसने पूछा।

"अभी ठीक हैं," मैंने कहा। "पर उनका चेहरा देखकर लगता है कि आज उन्होंने बाईस साल का पूरा बोझ एक साथ उतार दिया है और अब उनका शरीर उस बोझ के बिना चलना भूल गया है।"

काजल ने कुछ सोचा और फिर अंदर चली गई।

मैं बेंच पर बैठ गया। मीरा ने पास आकर पूछा, "वो दोनों क्या ढूँढ रहे थे?"

"गोविंद भाई को," मैंने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि गोविंद भाई के पास कुछ है जो उनके हिसाब से नहीं है।"

मीरा ने कैमरा मेज़ पर रख दिया और अपनी कॉपी निकाली।

"मैंने सब लिख लिया," उसने कहा। "हर नाम, हर तारीख़, हर जगह। पर एक बात समझ नहीं आ रही।"

"क्या?"

"रणवीर ने कल कहा था कि मैदान में सिर्फ़ दो कुर्सियाँ होंगी — एक उसकी, एक पापा की।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तो फिर वो गोविंद भाई को क्यों ढूँढ रहा है? अगर उसे लगता है कि गवाह मायने नहीं रखते, तो उसे गोविंद भाई की परवाह क्यों?"

मैंने घंटी जेब से निकाली। वो ठंडी थी, पर बिल्कुल ठंडी नहीं — इतनी गरम कि हथेली पर पता चले।

घंटी ने कहा, "जो गवाह से डरता है, वो उसका नाम पहले बोलता है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा।

"क्योंकि उसे डर है," मैंने कहा। "और जो डरता है, वो चुप नहीं रह सकता। वो कुछ न कुछ करेगा। और आज उसने कर दिया — उसने अपने आदमी भेजे।"

"मतलब?"

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho