The Mysterious Bell – Chapter 1389
गोविंद भाई ने कुछ देर खिड़की की तरफ़ देखा। फिर बोले, "हरिप्रसाद रणवीर का पहला हिस्सेदार था। नीव की तस्वीर में जो चौड़े कंधों वाला जवान खड़ा है — वो हरिप्रसाद है। रणवीर और वो मज़दूरी में साथ थे। पहले ठेके में हरिप्रसाद का भी हिस्सा था। फिर हिसाब बदला, नाम कटा, और हरिप्रसाद गायब हो गया।"
"मरा?"
"मरे हुए आदमी का नाम इतनी बार नहीं लिखा जाता," गोविंद भाई ने कहा। "मरे हुए आदमी का नाम एक बार लिखा जाता है, और फिर एक लकीर। यहाँ लकीर के नीचे 'नहीं' लिखा है। ये लकीर किसी और ने खींची। ये नहीं किसी और ने लिखा। मतलब कोई चाहता है कि हम जानें कि वो मरा नहीं।"
मीरा उठ खड़ी हुई। उसके हाथ में कैमरा था और आँखों में वो चमक जो हमेशा सच के बहुत पास होने पर आती है।
"अगर हरिप्रसाद ज़िंदा है," उसने कहा, "तो वो आज शाम की सभा में सबसे बड़ा गवाह बन सकता है। उसके पास वो काग़ज़ हो सकते हैं जो रणवीर ने खुद जलाए नहीं, क्योंकि वो जलाना भूल गया था — क्योंकि उसे लगा था कि हरिप्रसाद मर चुका है।"
"और अगर वो ज़िंदा है," शालिनी ने कहा, "तो उस तीसरी तस्वीर में उसका चेहरा कटा हुआ क्यों है? क्योंकि कटा हुआ चेहरा सबसे ज़्यादा पहचाना जाता है। अपने ही लोगों के द्वारा।"
कमरे में फिर सन्नाटा।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। वो गरम थी। बहुत गरम नहीं — संभलने लायक़। मैंने उसे हथेली में रखा और धीरे से पूछा, "हरिप्रसाद कहाँ है?"
घंटी ने जवाब देने से पहले एक लंबी साँस ली — मुझे पता है घंटी साँस नहीं लेती, पर जो आवाज़ आई, वो साँस जैसी थी।
फिर उसने कहा, "वो वहीं है जहाँ पुरानी आवाज़ें अब भी गुनगुनाती हैं।"
मेरा हाथ ठिठक गया।
पुरानी आवाज़ें।
मेरे मन में पिछले कुछ दिनों का पूरा हिसाब एक साथ चला — छत से आती गुनगुनाहट, छठा बक्सा, माँ की रोटी बेलने की धुन, वो गुनगुनाहट जो बच्चों के आने पर रुक गई थी। और उससे पहले — स्टूडियो की अलमारी में टिन का डिब्बा, जिसमें राख थी और जिसे किसी ने बहुत जल्दी में छुआ था।
और मुझे एक और चीज़ याद आई — जो उस्ताद ने कहा था, कि मरम्मत की पाठशाला में इलाही पुराने ताले खोलना सिखाता था और कभी-कभी अपनी गुनगुनाहट में पूरा दिन बिता देता था। उनकी गुनगुनाहट। वो धुन। जो उस्ताद ने आज भी कभी-कभी सुनी थी।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"अगर घंटी सही कह रही है," मैंने कहा, "तो हरिप्रसाद उसी जगह के आसपास है जहाँ पुरानी आवाज़ें रखी गई हैं। और हमें उस तक पहुँचने के लिए सिर्फ़ तीन घंटे हैं।"
शालिनी ने अपनी काली फाइल खोली और उसमें से एक पन्ना निकाला।
"तो हम नामों की सूची बनाएँ," उन्होंने कहा। "हर पन्ने से एक नाम। और उस नाम के आगे वो जगह जहाँ वो आज है। जो नाम मरे हैं, उनके आगे मरा। जो ज़िंदा हैं, उनके आगे ज़िंदा। और हरिप्रसाद के आगे — 'ढूँढना है'।"
"और यही सूची आज शाम," मैंने कहा, "मैदान में सबके सामने पढ़ी जाएगी।"
गोविंद भाई ने अपना हाथ उठाया, जैसे स्कूल में बच्चा उठाता है।
"मैं पढ़ूँगा," वो बोले। "मैंने लिखा था। मैं ही पढ़ूँगा।"
पापा ने उनके कंधे पर हाथ रखा। कमरे में किसी ने कुछ नहीं कहा। शबनम आपा ने चुपचाप एक कप चाय गोविंद भाई के आगे बढ़ा दिया। उन्होंने कप नहीं उठाया — बस उसकी गर्मी को हथेलियों से सहलाया।
मैं बही के आख़िरी पन्ने तक गया।
और वहाँ मेरा हाथ रुक गया। क्योंकि वो पन्ना और सब पन्नों से अलग था। उस पर कोई तारीख़ नहीं थी। कोई रकम नहीं थी। सिर्फ़ एक लाइन थी, नई नीली स्याही में — इतनी नई कि लगा अभी सूखी नहीं है।
वो लाइन थी —
"हरिप्रसाद मरा नहीं, छिपा है।"
मैंने पन्ना उठाया और सबको दिखाया। मेरा हाथ नहीं काँप रहा था। मेरी आवाज़ नहीं काँप रही थी। मैं सिर्फ़ बहुत ठंडा हो गया था — उस तरह का ठंडा जो दुश्मन को पहचानने से पहले आता है।
"ये स्याही नई है," शालिनी ने कहा, पन्ने को रोशनी में उठाकर।
"ये लिखाई किसकी है?" मीरा ने पूछा।
मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा। उन्होंने एक लंबी नज़र डाली और फिर सिर नीचे कर लिया।
"ये हाथ मेरा नहीं है," उन्होंने कहा। "पर ये इतना साफ़ लिखा है… जैसे लिखने वाले को अपनी लिखाई छिपानी ही नहीं थी।"
"क्योंकि उसे हमें बताना था," मैंने कहा। "कि हरिप्रसाद ज़िंदा है।"
"या क्योंकि उसे हमें बताना था," उस्ताद ने कहा, बहुत धीरे, "कि वो जानता है — हम आज हरिप्रसाद को ढूँढने निकलेंगे।"
कमरे में जो अगला सन्नाटा आया, वो पहले से भारी था। बच्चे साँस तक धीरे ले रहे थे।
घंटी मेरे हाथ में धीरे-धीरे गरम हो रही थी। मैंने उसे कान के पास लाया। उसने बहुत छोटी आवाज़ में कहा —
"अब तू अंदर आ गया है। बाहर निकलने का रास्ता खुद बनाना पड़ेगा।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और बही बंद कर दी।
फिर मैंने सबकी तरफ़ देखा।
"तीन घंटे," मैंने कहा। "तीन घंटे में हमें हरिप्रसाद चाहिए, गवाह चाहिए, और हिसाब चाहिए। मीरा, तुम पुरानी आवाज़ों वाली सब जगहों की सूची बनाओ। शालिनी दीदी, आप हरिप्रसाद के नाम की हर तारीख़ अलग काग़ज़ पर लिखिए। टिंकू और सानिया, तुम पुराने बाज़ार के जिन मकानों में आजकल कोई नहीं रहता — उनका नाम और जगह याद करके आओ।"
"और आप?" सानिया ने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा और पहली बार उस दिन हल्का-सा मुस्कुराया।
"मैं," मैंने कहा, "इस घंटी से पूछूँगा कि वो पुरानी आवाज़ें आख़िर कौन सी हैं। और घंटी बड़ी चालाक है — वो पूरी बात कभी नहीं कहती। पर आज मैं उसका पीछा करूँगा, जब तक वो न कहे।"
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर शाम का आसमान पीला-गुलाबी हो रहा था और गली की धूल उड़ रही थी। दूर कहीं पीपल की छाया लंबी पड़ रही थी।
पापा मेरे पास आए और उन्होंने मेरा कंधा पकड़ा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "एक बात कहूँ?"
"कहिए।"
"आज सुबह तक मुझे लगता था कि सबसे बड़ा सच बोलना है," उन्होंने कहा। "अब लगता है, सबसे बड़ा सच ढूँढना है। बोलना तो बाद में आता है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वही शांत डर था, पर उसके पीछे कुछ और भी था। वो कुछ जो बाईस साल में पहली बार दिख रहा था — उम्मीद। बहुत छोटी, बहुत कमज़ोर, पर उम्मीद।
"पापा," मैंने कहा। "आप अंदर जाकर गोविंद भाई के पास बैठिए। उन्हें आपकी ज़रूरत है। आज वो अकेले टूटेंगे नहीं।"
वो सिर हिलाकर अंदर चले गए।
मैं बाहर निकला और सीढ़ी के नीचे खड़ा हो गया। मेरी नज़र धूल भरी गली पर थी और हाथ में घंटी थी, जो अब भी गरम थी — न ज़्यादा, न कम, बस इतनी कि पता चले कि वो साथ है।
मैंने धीरे से कहा, "अब बताओ।"
घंटी ने कहा, "जहाँ पुरानी आवाज़ें गुनगुनाती हैं, वहाँ एक आवाज़ ऐसी भी है जो आज तक बंद नहीं हुई।"
"कौन सी?"
"वो जिसे तूने पहली बार सुना था," घंटी ने कहा, "जब तूने छठा बक्सा छुआ था। और जिसे तूने तब भूत समझकर छोड़ दिया था।"
मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।
वो गुनगुनाहट। माँ की रोटी बेलने जैसी आवाज़। छठा बक्सा। हरिप्रसाद।
मैंने घंटी को जेब में रखा और दुकान के पीछे वाले कमरे की तरफ़ पलटा। मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी।
"कुछ मिला?" उसने पूछा।
"पुरानी आवाज़ों की जगह मिल गई," मैंने कहा। "अब बस वो आवाज़ ढूँढनी है जो इन बाईस सालों में कभी रुकी ही नहीं।"
और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी ने एक आख़िरी बार हल्का-सा कंपन किया, जैसे किसी ने दूर से मेरा नाम पुकारा हो और मैंने सुन लिया हो, और जैसे वो आवाज़ इस शहर की नहीं, बल्कि किसी बहुत पुराने कमरे की हो — जहाँ अब भी कोई गुनगुनाता बैठा है, और जहाँ अगले कोई तीस मिनट में हम पहुँचेंगे।
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