The Mysterious Bell – Chapter 1388
लगभग बीस लोग थे। शबनम आपा ने अपनी गुमटी से बड़ी केतली और कपों की ट्रे भेज दी थी, जिसे उसका भांजा दो बार में लाया। उस्ताद ने दुकान से दो पुरानी लकड़ी की स्टूल मँगाई — एक की टाँग हिलती थी, जिसे टिंकू ने काग़ज़ की तह दबाकर ठीक किया। बच्चे फ़र्श पर बैठ गए। दुबे अंकल दरवाज़े पर ही खड़े रहे, जैसे अंदर आने के लिए कोई औपचारिकता पूरी करनी हो।
गोविंद भाई सबसे आख़िर में आए। उनके सीने से काली बही चिपकी थी, दोनों हाथों से पकड़ी हुई, जैसे कोई बच्चा पकड़ता है जिसे डर हो कि छीन ली जाएगी।
उनका चश्मा फिर टेप से बँधा था। हाथ काँप रहे थे। आँखें सूजी हुई थीं, जैसे पिछली रात सोए ही नहीं।
"गोविंद भाई," पापा ने कहा और उनके पास वाली स्टूल खींच दी।
वो बैठे। बही उनके घुटनों पर रखी रही। उन्होंने एक बार सबकी तरफ़ देखा — मीरा, शालिनी, उस्ताद, दुबे अंकल, बच्चे, पापा और फिर मुझे। उनकी आँखें उस वक़्त ऐसी थीं जैसे कोई बहुत लंबी सड़क चलकर आया हो और अब आगे रास्ता ही न हो।
"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा, आवाज़ में वो कँपकँपी जो अब कम नहीं होती, "कि हिसाब की किताब खोलने के लिए हिम्मत चाहिए। आज पता चला, हिम्मत नहीं — सिर्फ़ रोना चाहिए।"
मैंने उनके सामने बही रखने के लिए मेज़ की तरफ़ इशारा किया। मेज़ वो पुरानी लकड़ी की थी जिस पर ग्रीस के निशान थे और जिसे माँ ने एक बार कहा था, "इस मेज़ पर तीन पुश्तें खा चुकी हैं।"
गोविंद भाई ने बही रखी और दोनों हाथों से ढक्कन जैसे कुछ नहीं था — बस रस्सी खोली। बही की जिल्द काली थी, किनारों से घिसी, और उस पर सिर्फ़ एक पीली पट्टी चिपकी थी जिस पर हाथ से लिखा था — "हिसाब"।
बही खुली।
पहला पन्ना।
उस पर एक तारीख़ थी, बाईस साल पुरानी।
मैंने पढ़ा, और मेरी छाती में कुछ ऐसे धँसा जैसे कोई नाखून किसी लकड़ी में।
"गोविंद भाई," मैंने कहा। "ये पन्ना तो…"
"हाँ," उन्होंने कहा। "यही रात है। यही वो रात है जब तुम्हारे पापा का अंगूठा पहली बार लिया गया था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पापा ने नीचे देख लिया। माँ की कॉपी उनकी गोद में थी — वो कॉपी जिसमें उन्होंने बाईस साल पहले लिखा था कि उन्होंने अंगूठा क्यों लगाया।
गोविंद भाई ने उँगली पन्ने पर रखी।
"ये देखो," उन्होंने कहा। "यहाँ रकम लिखी है — दो हज़ार पाँच सौ। यहाँ नाम — शंकर यादव। और यहाँ," उन्होंने उँगली आगे बढ़ाई, "यहाँ लिखा है — मज़दूरी की एवज़ में। पर ये मज़दूरी नहीं थी। ये डर था। और मैंने इसे मज़दूरी लिखकर अपने ही हाथ से अपनी गर्दन बचाई थी।"
उनकी आवाज़ टूट गई।
"हर बार," उन्होंने कहा, "हर बार जब मैं किसी का अंगूठा लेता था, मैं नीचे एक शब्द लिख देता था — बाकी। मैंने खुद को समझाया कि मैं मजबूर हूँ। बच्चे हैं, घर है, बीवी बीमार है, नौकरी जाएगी तो क्या होगा। साहब कहते थे — गोविंद, तुम तो बस हाथ बढ़ाते हो, अंगूठा तो लोग खुद लगाते हैं।"
उन्होंने चश्मा उतारा और उसे मेज़ पर रखा। उनकी आँखें लाल थीं।
"पर आज मैं सोच रहा हूँ," उन्होंने कहा, "कि मजबूरी भी एक चोरी होती है, बेटा। जो आदमी मजबूरी के नाम पर चुप रहता है, वो भी चोर होता है — बस उसके हाथ में छुरी नहीं होती, काग़ज़ होता है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
कमरे में बच्चे भी चुप थे। टिंकू ने अपना चश्मा गोद में रख दिया था और सामने देख रहा था, जैसे इस वक़्त वो सिर्फ़ तेरह साल का नहीं, कोई बहुत पुराना आदमी हो।
पापा उठे। वो गोविंद भाई के पास गए और उन्होंने उनका कंधा पकड़ा।
"गोविंद भाई," उन्होंने कहा, बहुत धीरे। "मैंने अंगूठा लगाया था। आपने नहीं लगवाया था। मैं डरा था, इसलिए लगाया। मेरी बीवी अस्पताल में थी, मेरे बच्चे छोटे थे, और मैंने सोचा — एक अंगूठा, क्या फ़र्क़ पड़ेगा। आज बाईस साल बाद पता चला, सब फ़र्क़ पड़ता है।"
गोविंद भाई ने उनकी तरफ़ देखा।
"अब हिसाब सिर्फ़ इस काग़ज़ पर नहीं खुलेगा," पापा ने कहा। "आज शाम सबके सामने खुलेगा। और उसमें मेरा नाम भी होगा — पहले।"
गोविंद भाई ने सिर हिलाया। फिर उन्होंने बही के पन्ने पलटने शुरू किए।
पन्ने पलटते गए। एक, दो, तीन, चार — मैं गिनती खो चुका था। हर पन्ने पर एक तारीख़, एक रकम, एक नाम, और उसके नीचे एक अंगूठे का निशान — किसी का पूरा, किसी का आधा, किसी का सिर्फ़ कोना, किसी का धुँधला, जैसे उस वक़्त हाथ काँप रहा हो।
कुछ नाम मैं जानता था। नसीमा बाई। रमेश भाई। भोला भाई। किशनलाल काका। चूड़ी वाली बाई। साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई। वो बूढ़ा जो रोज़ अस्पताल के बाहर बैठता था। वो औरत जिसका बेटा सीमेंट ढोता था। वो शिक्षक जिसका नाम अब स्कूल की सूची में नहीं था।
हर नाम के नीचे वही शब्द — बाकी।
कमरे में सिर्फ़ पन्ने पलटने की आवाज़ थी। खिस। खिस। खिस। जैसे कोई बहुत धीरे से बता रहा हो कि ये सब तुम्हारे आस-पास ही हुआ है और तुम कभी देख नहीं पाए।
और फिर मेरा हाथ रुक गया।
क्योंकि एक पन्ने पर एक नाम था जिसे मैंने पहले दिन देखा था — राख में, आधे जले काग़ज़ पर, झुकी हुई लिखाई में।
हरिप्रसाद।
मैंने पन्ना पलटा।
अगले पन्ने पर फिर वही नाम।
तीसरे पर फिर।
चौथे पर — हरिप्रसाद, रकम दो सौ अस्सी, तारीख़ पाँच साल पहले, और नीचे एक नई काली लकीर खींची हुई थी, जैसे किसी ने नाम पर प्राण-वायु के बजाय क्रॉस लगाया हो।
मैंने नीचे की तरफ़ पढ़ा। लकीर के नीचे एक शब्द लिखा था — "मरा"।
फिर उसके नीचे, और भी छोटे अक्षरों में, थोड़ी अलग स्याही में — "नहीं"।
मैं रुक गया।
कमरा मेरे चारों तरफ़ धीमा हो गया। शबनम आपा के हाथ से कप की आवाज़ आई। दुबे अंकल ने खाँसा। मीरा ने कुछ लिखना शुरू किया और फिर रोक दिया।
"गोविंद भाई," मैंने कहा। "ये 'मरा' किसने लिखा?"
उन्होंने देखा। उनकी आँखें फैल गईं।
"ये… ये मैंने नहीं लिखा," उन्होंने कहा। "मैंने तो सिर्फ़ बाकी लिखा था।"
"और ये नीचे 'नहीं'?"
"ये भी नहीं।"
शालिनी आगे आईं। उन्होंने पन्ने को दोनों हाथों से उठाया और लालटेन के पास ले गईं। फिर उन्होंने उसे सूँघा, अपनी उँगली से किनारे को रगड़ा और बोलीं, "ये लिखाई अंदर से आई है। किसी ने इसी किताब में, इसी जगह, बाद में लिखा है — पर बहुत साल पहले नहीं। पाँच साल से ज़्यादा नहीं।"
"यानी ये नाम मिटाया नहीं गया, दबाया गया," मैंने कहा।
हाँ, मेरी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने और पन्ने पलटे। हरिप्रसाद। हरिप्रसाद। हरिप्रसाद। पाँच जगह। छह जगह। आठ जगह। हर बार अलग रकम, हर बार अलग तारीख़, हर बार अंगूठे की जगह कोई और निशान — कोई धब्बा, कोई छोटी लकीर।
शालिनी ने मेरा हाथ पकड़ा और पन्ने को रोक दिया।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "ये नाम हर पन्ने पर इसलिए है क्योंकि ये आदमी सिर्फ़ एक बार नहीं, बार-बार इस्तेमाल हुआ है। हर बार जब रणवीर को नया काग़ज़ चाहिए होता था, गोविंद भाई को हरिप्रसाद की ज़रूरत पड़ती थी। और हरिप्रसाद खुद अंगूठा नहीं लगाता था — कोई और लगाता था।"
"कौन?"
"हरिप्रसाद जानता था," शालिनी ने कहा, "कि ये हिसाब किसका है। इसीलिए वो कभी अपना अंगूठा नहीं लगाता था।"
मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा।
"हरिप्रसाद कौन है?"
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