The Mysterious Bell – Chapter 1387
मीरा मेरे बगल में चल रही थी, कैमरा सीने से चिपकाए। उसने बीच में एक बार कहा, "अंकुश, अगर ये जाल है तो?"
"तो हम जाल में जाने वाले चूहे नहीं, वो हाथ हैं जो जाल बुन रहे हैं," मैंने कहा। "बस इस बार हम उनकी उँगली पकड़कर पूछेंगे — भाई, धागा किसके लिए बना रहे हो?"
वो हँसी नहीं। पर सिर हिलाया।
सानिया आगे-आगे चल रही थी, टिंकू उसके पीछे। टिंकू अब भी वो काला एक-काँच वाला चश्मा पहने था जो जासूसी किट का हिस्सा था, और जिसे उसने कभी नहीं उतारा। रास्ते में एक बार वो पीछे आया और फुसफुसाया, "उस्ताद, गोलू ने कहा था कि इस गली में कुत्ते भी नहीं रुकते।"
"तो तुम क्यों रुके हो?"
"क्योंकि मैं कुत्ता नहीं हूँ," उसने बड़ी गंभीरता से कहा।
पापा पीछे चल रहे थे, उनके हाथ में वो पुरानी लालटेन जो भैरों काका की टिन की लालटेन जैसी थी पर नहीं थी। उस्ताद की लाठी टक-टक कर रही थी और वो टक ही हमारे कदमों से पहले चल रही थी, जैसे ज़मीन हमें बता रही हो कि आगे आओ, पर सँभलकर।
बिजलीघर की गली में मुड़ते ही हवा बदल गई। बाहर की गर्मी वहीं रह गई, और भीतर की हवा ठंडी थी — उस तरह की ठंडी जो पुराने कमरों में सालों से बंद रहती है और जिसमें हल्की सी सीलन, हल्की सी मिट्टी और हल्की सी राख की गंध मिली होती है।
बाईं तरफ़, पिछले मकानों की पीठ के बीच, एक दरवाज़ा था — आधा नीला, आधा बिना रंग। उस पर ताला नहीं लगा था। दरवाज़ा एक हाथ की दरार तक खुला था, और उस दरार से भीतर से पीली रोशनी आ रही थी।
मैं रुका।
सानिया ने मेरी कमीज़ पकड़ ली।
"उस्ताद," उसने कहा। "रोशनी।"
"देख रहा हूँ," मैंने कहा।
टिंकू ने चश्मा ऊपर सरका दिया, जैसे इससे रोशनी कम दिखेगी। चश्मे का एक ही काँच था।
उस्ताद ने लाठी टिकाई और धीरे से बोले, "अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही।"
"और ये पीली रोशनी?" मीरा ने पूछा।
"रोशनी का मतलब आदमी नहीं होता," उस्ताद ने कहा। "कभी-कभी रोशनी सिर्फ़ इंतज़ार होती है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वही शांत डर था, जो पिछली बार थाने के कमरे में था और जो माँ ने उनके पसीने से पोंछा था।
"अकेले मत जाओ," पापा ने कहा।
"अकेले नहीं जा रहा," मैंने कहा। "आप सब मेरे साथ हैं।"
दरवाज़ा धकेलते ही वो अपने आप खुल गया। अंदर छोटा कमरा था — इतना छोटा कि सिर्फ़ एक चारपाई, एक चूल्हा और एक लकड़ी की अलमारी की जगह बचती थी। चूल्हे में राख थी। मैंने उँगली डाली — राख गरम नहीं, पर ठंडी भी नहीं। जैसे अभी-अभी कोई उठा हो और बुझा कर गया हो।
अलमारी खुली थी। उसमें एक तह किया हुआ मैला कपड़ा था और एक कोने में मिट्टी का छोटा कटोरा।
और ऊपर, दीवार पर, कोयले से कुछ लिखा था।
मैंने लालटेन ऊपर उठाई।
पाँच नाम थे। कोयले से। बड़े अक्षरों में। एक के नीचे एक। पाँच नाम, और उनके नीचे एक खाली लकीर थी, जैसे छठे नाम की जगह छोड़ी गई हो और फिर छोड़ दी गई हो।
पाँच नाम में से तीन मैं पहचानता था — जगदीश यादव, शंकर यादव, उस्ताद अली बक्श। चौथा — हरिप्रसाद। पाँचवाँ — मंसूर।
और उस खाली लकीर के नीचे, बहुत छोटे अक्षरों में, नुकीली चीज़ से खुरचकर लिखा था — "अब तुम आ गए। तो अपना हिसाब देखो।"
मैंने तीन सेकंड तक साँस रोक ली। बच्चे भी चुप हो गए। टिंकू ने चश्मा उतार दिया, जैसे इस वक़्त मज़ाक का कोई मतलब नहीं रहा था।
मीरा ने कैमरा उठाया और फिर धीरे से नीचे कर दिया। उसके हाथ अचानक ठंडे हो गए थे।
"ये नाम किसी ने आज नहीं लिखे," उस्ताद ने लाठी से कोयले की एक लकीर के पास इशारा करते हुए कहा। "ये रात भर में नहीं बनते। ये बार-बार लिखे जाते हैं — हर बार पुराने अक्षरों पर नया कोयला चढ़ता है।"
"मतलब यहाँ कोई आता-जाता है," शालिनी ने कहा।
"यहाँ कोई रहता है," पापा ने कहा।…
उनकी आवाज़ में कोई झिझक नहीं थी, सिर्फ़ पहचान थी। मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"आप कैसे इतने यक़ीन से—"
"क्योंकि चूल्हे की राख के पास रोटी के तीन टुकड़े हैं," पापा ने कहा। "रोटी बेलने की जगह से मिट्टी उड़ी है। बर्तन में पानी अभी-अभी भरा गया है। और देखो — अलमारी के नीचे जूते का निशान है, एक ही तरफ़ का। जो जूता बायें पैर से पहले पहनकर चलता है, वो जल्दबाज़ होता है। और जल्दबाज़ आदमी अपना टुकड़ा छोड़कर भागता है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा और पहली बार इतने सालों में महसूस किया कि मेरे पापा सिर्फ़ चुप नहीं थे। वो सब देख रहे थे। हमेशा से देख रहे थे। बस बोलने के लिए कोई सही वक़्त नहीं था।
मीरा ने रोटी के टुकड़े का एक कोना उठाया, सूँघा और बोली, "इसमें गुड़ है। और ये टुकड़े दो दिन पुराने नहीं हैं। आज के हैं।"
टिंकू अचानक बोला, "उस्ताद, यहाँ से किसी ने बहुत जल्दी में भागकर, अलमारी में कुछ छिपाया है। ऊपर वाला कपड़ा ढीला है, नीचे वाला कसा हुआ है।"
मैंने अलमारी खोली। मैला कपड़ा उठाया। उसके नीचे रेत की पतली परत थी — और उस पर एक टुकड़ा पड़ा था, आधा जला हुआ, किनारे से काला।
मैंने उसे उठाया। उस पर बहुत महीन नीली स्याही में सिर्फ़ चार शब्द बचे थे — "तुम्हारा हिसाब बाकी है।"
और उसके नीचे, वही निशान — दो लकीरें, बीच में बिंदु।
घंटी मेरी जेब में बहुत हल्की गरम थी, जैसे किसी ने उसे उँगली से दबाया हो।
मैंने उसे बाहर निकाला और धीरे से कहा, "ये जाल है?"
घंटी ने थोड़ी देर ली। पहले एक छोटी सी आवाज़ आई, जैसे पीतल के अंदर किसी ने करवट बदली हो। फिर वो बोली —
"जाल नहीं। बुलावा है।"
"किसका?"
"उसका, जिसे तू अभी नाम से नहीं जानता," घंटी ने कहा। "पर वो तुझे जानता है। बहुत पहले से जानता है।"
मैं खिड़की के पास गया। खिड़की टूटी थी और उससे गली का धुँधला हिस्सा दिखता था। बाहर कहीं पानी टपक रहा था। टप। टप। टप।
मीरा ने मेरी कमीज़ पकड़ी। "अंकुश, यहाँ से निकलते हैं। सात बजे मैदान में सब होंगे। हमें वक़्त चाहिए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "वक़्त चाहिए या हिसाब?"
वो कुछ नहीं बोली।
"ये काग़ज़ हमें यहाँ लाया," मैंने कहा। "और ये दीवार हमें बता रही है कि हम सही जगह आए हैं, पर ग़लत चीज़ ढूँढ रहे हैं। हम आदमी ढूँढ रहे थे। हमें हिसाब ढूँढना चाहिए।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो तब आती है जब कोई पुराना उस्ताद अपने शागिर्द में अपना ही हुनर देखता है।
"गोविंद भाई की बही," उन्होंने कहा।
"हाँ," मैंने कहा। "अभी।"
हम बाहर निकले। पीली रोशनी को हमने वैसे ही जलता छोड़ दिया — क्योंकि अब मुझे लग रहा था कि उसे बुझाने का हक़ हमें नहीं, उसे जलाने वाले को है। और वो अभी वहाँ नहीं था। वो हमसे पहले हमारी दुकान की तरफ़ बढ़ चुका था, या हमें हमारे ही हिसाब के पास बुला रहा था।
रास्ते में सानिया ने पूछा, "उस्ताद, वो नाम जो दीवार पर थे — उनमें हरिप्रसाद कौन है?"
मैंने कुछ देर सोचा। मुझे पता था — पर उतना ही जितना उस आधे जले काग़ज़ से पता चला था। एक नाम, एक पता, और पापा की एक कबूली हुई गलती।
दुकान के पीछे वाला कमरा शाम के वक़्त हमेशा से अलग लगता था। दिन में वहाँ औज़ारों की खनक, ट्रंक का ढक्कन, और बल्ब की गुनगुनाहट रहती थी। शाम को वहाँ सिर्फ़ साये रहते थे — और आज सायों के साथ पूरी गली आ गई थी।
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