The Mysterious Bell – Chapter 1386
मैंने राख हटाई। तीन चीज़ें साफ़ दिखीं — दो लकीरें, और बीच में एक बिंदु।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने सिर्फ़ उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने बहुत धीरे सिर हिलाया, इतना धीरे कि शायद सिर्फ़ मैंने देखा।
फिर पापा ने कहा, "हरिप्रसाद।"
हम सब उनकी तरफ़ मुड़े।
"उसका पूरा नाम हरिप्रसाद था," पापा ने कहा। "वो मेरे सामने एक बार आया था। बाईस साल पहले, रात को। उसने मुझे कहा था कि मैं अपने काग़ज़ पर अंगूठा न लगाऊँ।"
"और आपने लगाया?" मैंने पूछा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में कुछ था — न शर्म, न पछतावा। सिर्फ़ एक आदमी जो अपना हिसाब बराबर कर रहा है।
"लगाया," उन्होंने कहा। "और उसके बाद मैं उससे कभी नहीं मिला।"
ज़ुबैर ने अचानक कुर्सी से उठने की कोशिश की। वो लड़खड़ाए, शालिनी ने उनका हाथ पकड़ा।
"आप कहाँ जा रहे हैं?" उसने पूछा।
"अंदर," उन्होंने कहा। "मुझे मेरा नेगेटिव दूसरी जगह रखना है। अगर ये लोग इतनी जल्दी पहुँच गए हैं, तो वो अंदर भी आ सकते हैं।"
"चाचा, रुकिए," मैंने कहा। "अभी नहीं। पहले एक बात।"
"क्या?"
"आपने अभी कहा कि वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी आया था," मैंने कहा। "अकेला?"
ज़ुबैर रुके। उनका मुँह खुला रह गया, जैसे किसी ने उन्हें बीच में रोक दिया हो। मीरा ने अपनी कॉपी उठाई, हाथ में कलम लेकर खड़ी हो गई, और मैंने देखा कि उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"मैंने बाईस साल किसी को नहीं बताया," ज़ुबैर ने कहा।
"आज बता दीजिए," पापा ने कहा। "आज के बाद तो मैं भी नहीं बताऊँगा, ये मेरी आख़िरी बात है।"
ज़ुबैर ने आँखें बंद कीं। कमरे में इतनी चुप्पी थी कि मैं अपनी साँस सुन सकता था।
"वो अकेला नहीं था," उन्होंने कहा। "उसके साथ एक और आदमी था। जवान, चौड़े कंधे, हाथ जोड़कर मेरे पास खड़ा रहा, जैसे मुझसे माफ़ी माँग रहा हो। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। उसने सिर्फ़ एक बार सफ़ेद कुर्ते वाले की तरफ़ देखा और फिर ज़मीन कि तरफ़।"
"कौन?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सूख रही थी।
ज़ुबैर ने आँखें खोलीं।
"रणवीर," उन्होंने कहा। "वो खुद आया था। सफ़ेद कुर्ते वाले के साथ। और वो मेरी दुकान के बाहर खड़ा रहा — जब मेरी तस्वीरें जल रही थीं।"
बाहर की गली से किसी साइकिल की घंटी सुनाई दी, फिर बच्चों की आवाज़ें, फिर दूर कहीं किसी के बर्तन गिरने की आवाज़। दोपहर के तीन बजे की आवाज़ें।
और मेरे हाथ में घंटी, जो बहुत हल्की थी, अचानक भारी हो गई।
मैंने उसे जेब से बाहर निकाला। वो गरम थी।
"अब?" मैंने धीरे पूछा।
और वो बोली। इस बार उसकी आवाज़ में अफ़सोस था, और अफ़सोस मुझे घंटी में सबसे ज़्यादा डराता है।
"जिसने तस्वीरें जलाईं," उसने कहा, "वो आज भी उन्हीं तस्वीरों के सामने बैठकर मुस्कुराता है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना सीधा प्रसारण बंद कर दिया था। उसका चेहरा जैसे पत्थर का हो गया था।
"उतना ही समय बचा है," उसने कहा। "तीन घंटे से ज़्यादा नहीं।"
"समय नहीं," मैंने कहा। "काग़ज़ बचा है।"
"काग़ज़?"
"हरिप्रसाद का पता," मैंने कहा। "काग़ज़ आधा जला है। पर पता पूरा है। और अगर ये जलाने वाले इतनी जल्दी में थे, तो पड़ा हुआ कोई चीज़ अभी भी वहाँ हो सकता है।"
"तो चलो," पापा ने कहा। "बिजलीघर के पीछे।"
"आप नहीं," मैंने कहा।
"अंकुश—"
"आप नहीं," मैंने दोहराया। "इस बार आप मेरे साथ चलिए, पीछे। आगे मैं जाऊँगा।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। लंबा वक़्त देखते रहे। फिर उन्होंने सिर हिलाया और मुझे कुछ ऐसा महसूस हुआ जो मैंने बहुत कम महसूस किया था बाईस साल की इस गली में — कि कोई मेरी बात मान रहा है।
बाहर आते वक़्त शालिनी ने मुझे रोका।
"अंकुश," उसने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछिए।"
"ये घंटी," उसने कहा। "ये बताती है कि कौन झूठ बोल रहा है?"
"नहीं," मैंने कहा। "ये सिर्फ़ बताती है कि कौन डर रहा है। और यही सबसे काम की चीज़ है।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार मुझे लगा कि उसने भी मुझे गली के उस लड़के की तरह देखा जिसे गोली मारने का हुक्म नहीं दिया गया था, बल्कि उसके सामने ही सब सच बता दिया गया था।
"तो चलो," उसने कहा। "और शाम को याद रखना — जो काग़ज़ सबके सामने खुलेगा, उस पर तुम्हारा नाम होगा या तुम्हारी गलती। दोनों में फ़र्क़ तुम्हें खुद करना होगा।"
हम गली में निकले। सानिया आगे-आगे, टिंकू उसके पीछे, मीरा अपना कैमरा सीने से चिपकाए, उस्ताद और उनकी लाठी, पापा और पीछे ज़ुबैर — जो अब मेरे पास आए थे और उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा। "एक आख़िरी बात।"
"कहिए।"
"उस रात मैंने उस छोटी कॉपी में एक बात लिख दी थी," उन्होंने कहा। "उस तस्वीर के पीछे। पर मैंने उसे पढ़ने से पहले ही मिटा दिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस रात जिस सफ़ेद कुर्ते वाले ने मुझसे कहा कि पुरानी तस्वीरें नींद खराब करती हैं," ज़ुबैर ने कहा, "वो मेरे पास से ऐसे गया कि मैंने उससे वादा कर लिया — कि मैं कुछ नहीं जानता था, कुछ नहीं देखा था, कुछ नहीं सुना था।"
"और आज?"
"आज मेरे पास वादा नहीं है," उन्होंने कहा। "सिर्फ़ डर है। और डर से ज़्यादा कुछ नहीं बोलना चाहिए। इसीलिए आज मैं बोलूँगा।"
वो आगे बढ़े। मैं थोड़ी देर खड़ा रहा, हाथ में घंटी, और उसे गरमाहट महसूस हो रही थी, जैसे किसी ने उसे बहुत देर तक हथेली में दबा रखा हो।
मैंने उसे उँगलियों में लिया और आहिस्ते से पूछा, "क्या वो आज मैदान में सबके सामने आएगा?"
घंटी ने बहुत देर सोचा। फिर वो छोटी, सपाट आवाज़ में बोली, जैसी कोई थका हुआ आदमी बोलता है —
"वो तो आएगा। सवाल ये है, तू उसे पहचानेगा या नहीं।"
मैंने घंटी जेब में रखी। पीपल की छाया रास्ते पर लंबी पड़ रही थी।
और मैंने, पहली बार उस दिन, रास्ता बदला — वो रास्ता जो सीधा स्टूडियो से बिजलीघर की तरफ़ जाता था, और जिसके बीच में, कहीं पीछे की गली में, एक पुरानी काली कोठरी वाला मकान हमारा इंतज़ार कर रहा था, जिसका पता सिर्फ़ आधा जला काग़ज़ बता रहा था, और जिसका आधा हिस्सा — उस राख में जो अभी भी गरम थी — किसी और ने अपनी जेब में चुपचाप रख लिया था।
रास्ते में सानिया ने अचानक कहा, "उस्ताद, अगर वो काग़ज़ उन्होंने जलाया, तो फिर वो पता उस काग़ज़ पर क्यों छोड़ गए?"
मैं रुका।
बच्चों के सवाल कभी-कभी तलवार से तेज़ होते हैं।
"क्योंकि वो चाहते हैं कि हम वहाँ जाएँ," मैंने कहा। "पता छोड़ना मतलब इशारा छोड़ना।"
"तो हम नहीं जाएँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। मज़ाक और डर, दोनों एक ही साँस में।
"नहीं, हम जाएँगे," मैंने कहा। "बस इस बार वो इंतज़ार नहीं करेंगे। हम जल्दी पहुँचेंगे, और उन्हें वहीं बैठे मिलेंगे — अपने ही जाले में।"
सानिया ने सिर हिलाया और अपनी लाल कॉपी में कुछ लिख लिया।
और मेरे पीछे, ज़ुबैर फ़ोटो स्टूडियो की तरफ़ पीछे देख रहे थे, जहाँ के ताले अब भी खुले थे, और जहाँ उनका बाईस साल पुराना एक नेगेटिव अलमारी में दबा हुआ था — एक आधी जली कॉपी, एक सफ़ेद कुर्ते वाले की हँसी, और एक चौड़े कंधों वाले जवान की चुप्पी का गवाह।
॥
पुराने बाज़ार के मोड़ से आगे का रास्ता और भी पतला हो गया था। दोनों तरफ़ दुकानें थीं, पर आधी बंद, आधी उनके शटरों पर पीली धूल की मोटी परत जमी थी। एक जगह पुराने नींबू-मिर्ची के हार टँगे थे, जिनका रंग उतर गया था और जो ऐसे हिल रहे थे जैसे हवा में कोई बहुत पुरानी साँस ले रहा हो।
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