The Mysterious Bell1385 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1385

7 min read November 5, 2026

ज़ुबैर ने लंबी साँस ली।

"बाईस साल पहले," उन्होंने कहा, "एक आदमी मेरे पास आया। जवान, चौड़े कंधे, सीधी आँखें। उसने कहा कि मुझे दो तस्वीरें चाहिए। एक वो जिसमें वो अपने साथी के साथ खड़ा हो और पीछे नींव की आधी दीवार दिखे। मैंने कहा, ठीक है, दो रुपये लगेंगे। उसने कहा, दो कॉपी बनाओ। एक मेरे लिए, एक मेरे साथी के लिए।"

"रणवीर," मैंने कहा।

"रणवीर," ज़ुबैर ने कहा। "और उसका साथी — हरिप्रसाद। हँसमुख आदमी, जिसकी उँगली पर कपड़ा बँधा था। उसने मुझे मिठाई खिलाई थी, मेरी माँ को याद करके कहा था कि तेरी माँ भी ऐसी ही रोटी बनाती होगी।"

"और फिर?"

"मैंने दो कॉपी बनाईं," उन्होंने कहा। "एक मैंने रणवीर को दी, एक हरिप्रसाद को। पर मेरे पास नेगेटिव था, और मैंने तीसरी कॉपी अपने लिए रख ली। उस ज़माने में हम सब ऐसा ही करते थे — नेगेटिव से एक कॉपी अपने पास रखना, बुरा नहीं माना जाता था।"

"वो कॉपी जो रातों-रात गायब हो गई?"

ज़ुबैर ने सिर हिलाया।

"रातों-रात," उन्होंने दोहराया। "दो दिन बाद कोई आया। सफ़ेद कुर्ता, चमकते जूते — ऐसे चमकते कि मेरी दुकान की धूल उनसे लजा जाए। उसने कहा कि पुरानी तस्वीरें नींद खराब करती हैं। बोला, जो तस्वीरें पुरानी हो जाएँ, उन्हें जलाना ठीक होता है। मैंने कहा कि मैं तो सिर्फ़ फोटोग्राफ़र हूँ, मेरा काम बनाना है, मिटाना नहीं। वो हँसा। उस हँसी में मज़ाक नहीं था, बस इतना था कि वो मुझसे बड़ा है और मैं जानता हूँ।"

"और कॉपी?"

"वो मेरी दुकान के पीछे वाले कमरे में थी," ज़ुबैर ने कहा। "सुबह उठा तो जगह खाली थी। दरवाज़े का कुंडा वैसे ही बंद था। कोई तोड़-फोड़ नहीं हुई। बस कॉपी नहीं थी। और उसके बाद जो हुआ, वो तुम जानते हो — बिजलीघर जल गया, मेरी दुकान जल गई, और मैं चुप हो गया।"

"और आपने किसी को नहीं बताया?"

"मैंने अपनी माँ को बताया था," उन्होंने कहा। "उन्होंने कहा कि बेटा, तस्वीरें नींद खराब करती हैं, यह उस आदमी ने झूठ नहीं कहा था। और फिर उन्होंने मेरी पेटी के नीचे वो नेगेटिव छिपा दिया, जो अभी तुमने देखा।"

मीरा ने अपना कैमरा नीचे रख दिया।

"चाचा," उसने कहा, "मैं आपसे एक बात कहूँ?"

"कहो।"

"मैंने पाँच साल पहले एक खबर छापी थी जिसमें आधा सच था," मीरा ने कहा। "उस आधे सच से एक मैडम का घर टूट गया। और मैंने उस दिन के बाद खुद से कहा था कि अब मैं कभी बिना पूरी बात जाने कुछ नहीं छापूँगी। पर सच यह है, चाचा — मैंने उस दिन के बाद कभी डरना नहीं छोड़ा। मैंने सिर्फ़ भागना तेज़ कर दिया। आज अंकुश ने मुझे वो कह दिया जो मैं खुद से नहीं कह पाती थी। तो अब सुनिए — मैं आपकी तस्वीरें आज शाम सबके सामने रखूँगी। नाम के साथ, तारीख़ के साथ। और अगर उससे आपको नुक़सान हो, तो वो नुक़सान भी मैं सामने रखूँगी।"

ज़ुबैर ने उसकी तरफ़ देखा। बूढ़े आदमी की आँखों में कुछ पिघला।

"तुम्हारी माँ क्या कहती है?"

"मेरी माँ कहती है कि डरा हुआ आदमी सबसे ज़्यादा झूठ बोलता है," मीरा ने कहा। "और मैं अब झूठ नहीं बोलना चाहती।"

"तो फिर सुनो," ज़ुबैर ने कहा। "पर पहले मुझे पानी पिला दो। गला सूख रहा है।"

शालिनी ने आगे बढ़कर उनके लिए पानी लिया उसी पुरानी स्टील की थाली में, जिसमें नेगेटिव धोने की चिमटी रखी थी। ज़ुबैर ने दो घूँट पिए और थाली किनारे रख दी।

और ठीक उसी वक़्त बाहर से टिंकू दौड़ता हुआ आया।

वो साँस नहीं ले पा रहा था। घुटने पर पट्टी थी और उसका चेहरा लाल था।

"उस्ताद!" वो चिल्लाया। "उस्ताद, पीछे से!"

"क्या हुआ? साँस ले।"

"जले काग़ज़ की गंध!" उसने कहा। "स्टूडियो के पीछे वाली गली में। मैं उधर से आया हूँ, उस्ताद, वहाँ कुछ जलाया गया है। अभी भी गरम है।"

मैंने ज़ुबैर की तरफ़ देखा। उनका चेहरा और पीला पड़ गया।

"पीछे?" उन्होंने कहा। "मेरे पीछे तो कोई…"

वो उठे और उनकी पेटी कुर्सी से फिसलकर फ़र्श पर गिर गई। मैंने उसे उठाया। पेटी का ढक्कन खुल गया था, और उसमें नेगेटिव की पुरानी पट्टियाँ थीं, रबर बैंड से बँधी हुईं।

हम सब पीछे गए। स्टूडियो की पिछली गली में सिर्फ़ दो फुट की जगह है, जहाँ कूड़ा रखा जाता है। वहाँ एक पुराना टिन का डिब्बा रखा था, जैसे कोई उसमें काग़ज़ जलाता हो। डिब्बे के किनारे कालिख लगी थी और अंदर राख अभी गरम थी। मैंने हाथ पास ले जाकर महसूस किया — हल्की गरमाहट, ऊपर की परत ठंडी, नीचे का हिस्सा गरम।

और राख में एक काग़ज़ का टुकड़ा बचा था। आधा जला, किनारे से काला, बीच से भूरा। मैंने उसे उठाया, वो हल्का था, जैसे पंख।

उस पर नीली स्याही में सिर्फ़ दो चीज़ें बची थीं — एक नाम, और एक पता।

नाम था हरिप्रसाद।

और पता — पुराने बाज़ार, बिजलीघर के पीछे, काली कोठरी वाला मकान, हिस्सा नंबर… और उसके बाद स्याही जल गई थी।

मैंने वो टुकड़ा सबको दिखाया। कोई कुछ नहीं बोला।

फिर ज़ुबैर ने धीरे से कहा, "यह लिखाई मेरी नहीं है।"

"किसकी है?"

"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मैं यह पता जानता हूँ।"

उन्होंने काग़ज़ को अपनी उँगली पर रखा, जैसे तराज़ू पर तोल रहे हों, और फिर उन्होंने कहा जो उन्होंने आज तक किसी को नहीं कहा था। अब भी मुझे लगता है कि उस वक़्त उनकी आवाज़ कमरे की नहीं थी, किसी और ज़माने की थी।

"यह जगह पुराने बिजलीघर के पीछे वाली काली कोठरी का पता है," उन्होंने कहा। "जिसे लोग बंद मकान कहते हैं।"

मैंने घंटी की तरफ़ हाथ बढ़ाया। जेब में वो ठंडी थी, सपाट, जैसे कोई पीतल का टुकड़ा ही हो। पर जब मैंने उसे उँगलियों के बीच पकड़ा, तो वो बहुत हल्की हो गई। और फिर, बिना बजे, बहुत धीमे से बोली —

"जला, पर बुझा नहीं।"

मेरी रीढ़ से एक ठंडी लकीर ऊपर गई।

"क्या कहा?" शालिनी ने पूछा।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "घंटी। बाद में बताऊँगा।"

"तुम हमेशा बाद में बताते हो," उसने कहा। "और बाद कभी नहीं आता।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो बाहर की तरफ़ मुँह किए खड़ी थी और ज़ुबैर के पास नहीं जा रही थी, जैसे वो अंदर आने से पहले ही सब जान गई हो। मुझे पता था वो शालिनी क्या सोच रही है — किसी भी चीज़ का एक आधा हिस्सा बोलना, दूसरा न बोलना, दोनों में फ़र्क़ बहुत बड़ा होता है।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो डिब्बे के पास बैठ गई थी और राख को देख रही थी, जैसे उसे पढ़ रही हो।

"यहाँ कोई था," उसने कहा। "अभी। दो मिनट पहले। इतनी राख नहीं होती अगर काग़ज़ पुराना जल रहा होता। यह नया जला है, और जल्दी में जला है। कोई जल्दी में था, इसीलिए काग़ज़ का आधा हिस्सा भी पूरा नहीं जला।"

"और वो आधा जो जल गया?" मैंने पूछा।

"वो हमारे पास नहीं है," उसने कहा।

"तो वो आधा कौन पढ़ेगा?"

"जिसके पास है," मीरा ने कहा। "और वो हमारे पास नहीं है।"

उस्ताद ने अपनी लाठी टिकाई और धीरे से झुककर राख के पास बैठ गए। वो राख को दो उँगलियों में उठाकर सूँघने लगे, जैसे कोई मसाला परख रहा हो।

"अंकुश," उन्होंने कहा। "ये काग़ज़ नहीं, काग़ज़ के साथ कुछ और भी जला है।"

"क्या?"

"कपड़ा," उन्होंने कहा। "और मोम। यहाँ देखो, ये काला टुकड़ा कपड़े का है, और टिन के किनारे पर मोम की बूँद जमी है। मोहर लगाते वक़्त मोम पिघलती है और बह जाती है।"

मैंने पास जाकर देखा। हाँ, किनारे पर पीली जमी हुई बूँद थी, और उस पर किसी चीज़ का उभरा हुआ निशान, जो राख से ढका था।

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