The Mysterious Bell – Chapter 1382
गोविंद भाई ने नाक पर सरका चश्मा उँगली से चढ़ाया और पास आए। काँपते हाथ से तस्वीर का कोना पकड़ा।
"क्या है?"
"ताला। मेरे संदूक का।" मैंने उँगली रखी। "यह देखिए — रणवीर की जेब से लटक रहा है। यह वही है जो मेरे घर के पुराने लोहे के संदूक पर लगा था। बाईस साल से बंद। पिछले हफ़्ते खुला मिला, पर ताला उस पर नहीं था। चाबी मेरे गले में है और ताला उसकी जेब में।"
कमरे में एक पल के लिए हवा भी रुक गई।
पापा दीवार के सहारे बैठे थे। उन्होंने तस्वीर मेरे हाथ से ली, आँखों के बहुत करीब लाई। कमरे का बल्ब मंदा था, इसलिए वो काग़ज़ को बल्ब के नीचे ले गए।
"यह आग के पहले की तस्वीर है," उन्होंने कहा। आवाज़ जैसे किसी और की थी। "देखो — नींव आधी है, दीवार एक हाथ ऊँची। यह वही रात है।"
उस्ताद ने तस्वीर अपने हाथ में ली। उनके चश्मे के पीछे आँखें छोटी हो गईं।
"लकड़ी के जूते," उन्होंने धीरे से कहा।
"क्या?"
उन्होंने उँगली बढ़ाई। तस्वीर के कोने पर, ज़मीन की धूल में, एक अधूरा सा निशान था। जूते का। चौड़ा, सपाट, पीछे की तरफ़ थोड़ा उभरा हुआ। मैंने पहले उसे काई का धब्बा समझा था।
"यह निशान मैं पचास साल से देखता आया हूँ," उस्ताद ने कहा। "दरवाज़ों पर, चौखटों पर, काग़ज़ों के नीचे। जो आदमी इन जूतों में चलता है, उसका कोई नाम मेरे पास नहीं। सिर्फ़ परछाईं है।"
शबनम आपा ने दरवाज़े की तरफ़ देखा। गुमटी बंद थी, बाहर गली में शोर धीमा हो गया था, पर मुझे पता था वो शोर मरा नहीं था — बस साँस रोककर बैठा था।
"अब तस्वीर बोलेगी," घंटी ने मेरी जेब में कहा।
आवाज़ धीमी थी, पहले जैसी नहीं। जैसे कोई थका हुआ आदमी दूर से बोल रहा हो।
मीरा ने दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखा।
"अंकुश," उसने कहा, "मुझे यह तस्वीर चाहिए। सिर्फ़ देखने के लिए नहीं। मुझे इसे आज शाम सबके सामने दिखाना है।"
"ले लो," मैंने कहा। "पर एक शर्त है।"
"क्या?"
"इसे मेरी माँ के हाथ में देकर लेना। वो इसे पहचानेंगी या नहीं, यह मुझे पहले जानना है।"
मीरा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर सिर हिलाया।
शालिनी अपनी फाइल समेट रही थी।
"यह सब ठीक है," उसने कहा, "पर हमारे पास सात घंटे भी नहीं हैं। और मुझे तुम्हारे बयान की एक कॉपी चाहिए, ठीक उसी शब्द में जिसमें तुम बोलोगे। मेरा कमरा पास ही है। चलो।"
वो उठी और बिना पीछे देखे चल दी। वो औरत जब चलती है तो लगता है कि रास्ता उसके लिए पहले से बिछा हुआ है।
शालिनी का कमरा थाने से दो गलियाँ आगे था, एक पुरानी इमारत की पहली मंज़िल पर। सीढ़ी संकरी, दीवार पर हरे रंग का पुराना प्लास्टर, और हर तीसरी सीढ़ी पर पैर रखने से पहले एक आवाज़ आती — जैसे कोई बूढ़ा कराह रहा हो।
कमरा छोटा था। एक चारपाई, एक लकड़ी की मेज़, दो कुर्सियाँ, और दीवार से सटा लोहे का रैक जिसमें फाइलें खड़ी थीं। रैक भरा हुआ था, पर उसमें जगह बनाने के लिए किसी ने बीच में से कुछ काग़ज़ निकाले थे — धूल में तीन खाली चौकोर निशान बचे थे।
"बैठो," उसने कहा और मेज़ पर एक मोटी कॉपी रखी।
मैं बैठा। कुर्सी की एक टाँग छोटी थी, इसलिए मैंने झुककर देखा। नीचे एक मोड़ा हुआ काग़ज़ दबा था। मैंने निकालने की कोशिश की तो शालिनी ने देखा।
"छोड़ो," उसने कहा। "वो कई साल से वहाँ है।"
"क्या है?"
"दो लोगों की लड़ाई," उसने कहा। "पर वो आज नहीं। आज तुम्हारी लड़ाई है।"
उसने कॉपी खोली और पहला पन्ना सीधा किया।
"अब ध्यान से सुनो," उसने कहा। "कल तुम मंच पर खड़े होकर गवाही नहीं दोगे। तुम मैदान में खड़े होकर दोगे। और मैदान में यह फ़र्क़ पड़ता है कि तुम क्या कहते हो, क्योंकि वहाँ माइक है, भीड़ है, और तीन लोग तुम्हें पहले से जानते हैं।"
"अच्छी बात है। तीन लोग तो पहले से जानते हैं, बाकी चार सौ को मेरा नाम भी नहीं पता।"
"मज़ाक अब बाद में," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो कड़कपन था जो डॉक्टर के कमरे में होता है। "मैं जो कहूँ, उसे सुनो, क्योंकि एक बार जो तुम्हारे मुँह से निकल गया, वो लिखा जाएगा। और जो लिखा गया, वो फिर कभी नहीं मिटता। सिर्फ़ कटता है।"
मैं चुप हो गया।
"तीन बातें," उसने कहा और उँगली उठाई। "पहली — जो देखा है वही बोलना। जो सुना है, उसके पहले बोलना — यह किसी ने मुझसे कहा। दूसरी — जो नहीं पता, उसके लिए अनुमान मत बनाना। अगर पूछा जाए कि यह ताला तुम्हारा कैसे है, तो यह मत कहना कि मुझे लगता है। कहना — यह मेरे संदूक का है, क्योंकि चाबी इसी में लगती है और ज़ंग का निशान इसी से मिलता है। तीसरी बात, और यह सबसे ज़रूरी है —"
वो रुकी।
"अगर वो तुमसे कोई ऐसी बात पूछे जो तुम्हारे ही घर को टुकड़े कर दे," उसने कहा, "तो भी झूठ मत बोलना। चुप रह जाना। चुप्पी कमज़ोर है, पर झूठ से सस्ती नहीं है।"
खिड़की से गली की आवाज़ आई — किसी ने पीतल का बर्तन गिराया था और कोई औरत हँस रही थी।
"अब एक बात मेरी भी सुन लो," मैंने कहा। "गवाही से पहले चाय मिलनी चाहिए। बिना चाय का गवाह आधा गवाह होता है। यह कानून में लिखा है या नहीं, मुझे नहीं पता, पर मैंने दुकान के बोर्ड पर ज़रूर लिखा है।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। पहले सख़्ती से, फिर उसके होंठों पर एक बहुत पतली लकीर बनी — जो हँसी नहीं थी, पर हँसी की बहन ज़रूर थी।
"चाय मेरे यहाँ नहीं बनती," उसने कहा। "पर जब यह सारा काम खत्म हो जाएगा, तो तुम्हारी गुमटी पर तीन कप मेरी तरफ़ से।"
"तीन?"
"एक तुम्हारा, एक मेरा, और एक उस आदमी का, जिसे अभी हम दोनों नहीं जानते।"
सीढ़ी में पैरों की आवाज़ आई।
नीचेसे कोई चढ़ रहा था। हम दोनों चुप हो गए। शालिनी ने सहज भाव से कॉपी बंद की और उसके ऊपर एक और काग़ज़ रख दिया — बिना जल्दबाज़ी के, जैसे रोज़ करती हो।
दरवाज़ा खुला।
दुबे अंकल थे। नीली शर्ट, हाथ में मोड़ी हुई छड़ी, साँस फूली हुई।
"चढ़ते वक़्त लगा," उन्होंने कहा, "कि मेरी उम्र तेरे कमरे की सीढ़ी की बराबर है। दोनों ही चटक रही हैं।"
"बैठिए," शालिनी ने कहा और कुर्सी खिसकाई।
वो नहीं बैठे। उन्होंने जेब से एक मुड़ा काग़ज़ निकाला और मेज़ पर रख दिया।
"थाने में आज दोपहर एक लड़का आया," उन्होंने कहा। "सफ़ेद कुर्ता, बिना नाम। उसने यह लिफ़ाफ़ा दरोगा की मेज़ पर रखा और चला गया। दरोगा ने खोला, पढ़ा, और फिर मुझे देखने नहीं दिया। पर मैं बाहर कुर्सी पर बैठा था, और मेरी सुनने की आदत आज भी नहीं गई।"
"क्या पढ़ा उसने?" शालिनी ने पूछा।
"तीन बातें," दुबे अंकल ने कहा। "एक — नूर अस्पताल की ज़मीन पर अभी सुनवाई चल रही है, इसलिए उस पर किसी तरह का निर्माण या हस्तांतरण नहीं हो सकता। दो — उस ज़मीन पर जो भी काग़ज़ पेश हो, वो पहले उस दफ़्तार में जमा होगा। और तीन —"
वो रुके।
"तीस —" शालिनी ने कहा।
"तीस — ज़मीन आज से सरकारी संरक्षण में मानी जाएगी।"
कमरे में एक पल कुछ नहीं हुआ।
फिर शालिनी उठी। उसने काग़ज़ उठाया, दो बार पढ़ा, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
"देखो," उसने कहा। "तारीख़।"
काग़ज़ बिना मुहर का था, पर नीचे तारीख़ थी — आज से दो दिन पहले की। और उसके नीचे एक लाइन, जो किसी टाइप मशीन पर छपी थी — निर्माण कार्य पर रोक, अगली सुनवाई तक।
"यह काग़ज़ पुराना है," मैंने कहा। "दो दिन पुराना।"
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