The Mysterious Bell – Chapter 1383
"और उन्होंने इसे आज दिया," शालिनी ने कहा। "मतलब वो दो दिन इंतज़ार कर रहे थे — यह देखने के लिए कि हम क्या करते हैं। अगर हम चुप रहते, तो यह काग़ज़ कल मैदान में बोलता। और अगर हम बोलते, तो यह काग़ज़ कल हमारे मुँह पर मारा जाता।"
"तो यह जाल है," मैंने कहा।
"यह जाल नहीं," शालिनी ने कहा। "यह दरवाज़ा है। जो दरवाज़ा वो हमारे लिए खोल रहे हैं, ताकि हम उसमें से घुसें और वो हमें अंदर बंद कर दें।"
उसने फिर से डीड निकाली।
वो काग़ज़ मेज़ पर खुला, पीला, किनारों से थका हुआ, और बीच में सात अंगूठों की कतार — जैसे सात लोग एक ही साँस में रुके हों।
शालिनी ने उसे पलटा।
"देखो," उसने कहा।
पीठ पर कुछ लिखा था — बहुत छोटा, बहुत हल्का। पर जब उसने काग़ज़ को बल्ब के नीचे सीधा किया, तो मुझे दिखा — वहाँ एक कोना था जो बाकी काग़ज़ से अलग था। किनारा सीधा नहीं था, वो चाकू जैसा सीधा और साफ़ था। जैसे किसी ने रूलर रखकर काटा हो।
"यह कटा हुआ है," मैंने कहा।
"हाँ," शालिनी ने कहा।
गोविंद भाई उस वक़्त तक चुप बैठे थे। वो उठे — और उनका चश्मा नाक से फिसलकर गोद में गिर गया। उन्होंने उसे उठाया भी नहीं।
"मैंने नहीं काटा," उन्होंने कहा। आवाज़ फट गई। "मैंने यह काग़ज़ छुआ भी नहीं था। जिस रात यह काग़ज़ मेरे हाथ में आया, उसी रात से यह कटा हुआ था। मैंने सोचा — ज़रूर पहले किसी ने काटा होगा। पर मैंने किसी से कहा नहीं। मैंने डर के मारे किसी को नहीं बताया।"
वो बैठ गए, और मुझे लगा कि वो और छोटे हो गए हैं।
"गोविंद भाई," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी। "आपने किसी को बताया क्यों नहीं, यह बात हम बाद में करेंगे। अभी एक बात बताइए — जिस रात यह काग़ज़ आपके हाथ में आया, उस रात कितने लोग उस कमरे में थे?"
"तीन," गोविंद ने कहा। "साहब, मैं, और एक आदमी जो अंधेरे कोने में बैठा था। उसके जूते चमकते थे। मैंने उसका चेहरा नहीं देखा।"
"और काग़ज़ कहाँ रखा था?"
"मेज़ पर। पाँच मिनट के लिए। मैं पानी लेने उठा था।"
शालिनी ने आँखें बंद कीं।
"तो काटने वाला वही है," उसने कहा। "जो उस कमरे में था। और उसने सिर्फ़ काटा नहीं — उसने वो हिस्सा साथ ले जाकर कहीं रखा। और वो हिस्सा अब उसके पास नहीं, किसी और के पास है।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर वो हिस्सा रणवीर के पास होता," शालिनी ने कहा, "तो वो कल मैदान में उसे खुद दिखाता और हमें हरा देता। पर उसने नहीं दिखाया। मतलब उसके पास नहीं है। उसका काम सिर्फ़ इतना था — काग़ज़ को अधूरा कर देना। जो अधूरा है, वो किसी के काम का नहीं रहता।"
मैंने कुर्सी पर पीछे झुककर साँस ली।
"तो अब क्या?" मैंने पूछा। "अगर यह पन्ना नहीं मिला, तो कल मैदान में क्या होगा?"
"कल मैदान में," शालिनी ने कहा, "रणवीर यह कहेगा कि यह डीड अधूरी है। और जो काग़ज़ अधूरा हो, वो अदालत में सुना नहीं जाता। फिर वो उसी मिनट नई तारीख़ वाला काग़ज़ निकालेगा — जो दुबे अंकल ने अभी लाया है — और कहेगा कि ज़मीन संरक्षण में है, इसलिए जो भी बोलेगा, वो बेकार बोलेगा।"
"और मेरी गवाही?"
"तेरी गवाही सच होगी," उसने कहा, "पर अधूरी काग़ज़ के सामने सच भी अधूरा लगता है। यही उनका खेल है। वो सच नहीं मिटाते। वो सच को अधूरा कर देते हैं।"
अब मैंने जेब से घंटी निकाली।
वो हल्की गरम थी — जैसे किसी ने उसे मुट्ठी में दबाकर रखा हो। मैंने उसे हथेली पर रखा और उँगली से छुआ।
"सुन," मैंने कहा। "यह कटा पन्ना ज़रूरी है। अगर तू जानती है कि यह कहाँ है, तो बोल।"
एक पल कुछ नहीं हुआ।
फिर घंटी ने कहा — बहुत धीमे, जैसे थकान में।
"अलमारी में नहीं।"
मैंने सिर उठाया।
"कहाँ?"
"तस्वीर में।"
शालिनी ने घंटी की तरफ़ देखा। दुबे अंकल ने भी।
"तस्वीर में?" शालिनी ने कहा।
"काग़ज़ काग़ज़ में नहीं रखा जाता," घंटी ने कहा। "जो छिपाना हो, उसे उस चीज़ के पीछे रखते हैं जिसे सब देखते हैं और कोई नहीं छूता।"
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
"मेरे पास एक तस्वीर है," मैंने धीरे से कहा। "ज़ुबैर की दी हुई। जिसके पीछे लिखा है — इसके तीन हिस्से थे।"
शालिनी एक पल मेरी तरफ़ देखती रही।
"तो इंतज़ार किस बात का है," उसने कहा।
उस्ताद ने कुर्सी छोड़ी और खिड़की तक गए। बाहर गली में दोपहर की धूप तिरछी पड़ रही थी।
"एक बात पहले," उन्होंने कहा। "जो आदमी तस्वीर के पीछे काग़ज़ छिपाता है, उसे उम्मीद होती है कि कोई उसे नहीं देखेगा। पर वो एक गलती करता है — वो तस्वीर ऐसी जगह रखता है जहाँ वो पहुँच सके। मतलब वो उस तस्वीर के पास लौटकर आएगा।"
"ज़ुबैर के स्टूडियो पर पहरा है?" मैंने पूछा।
"मीरा वहीं है," शालिनी ने कहा।
और ठीक उसी वक़्त मेरा फोन बजा।
स्क्रीन पर मीरा का नाम था। मैंने उठाया और स्पीकर पर डाल दिया, ताकि सब सुनें।
"अंकुश," मीरा की आवाज़ आई। वो दौड़ रही थी, साँस फूल रही थी। "तू कहाँ है?"
"शालिनी के कमरे पर। क्या हुआ?"
"ज़ुबैर के स्टूडियो की दीवार," उसने कहा। "सामने वाली दीवार। जहाँ तस्वीरें टँगी थीं। वहाँ एक काग़ज़ चिपका मिला है।"
"कैसा काग़ज़?"
"पीला। पुराना। और उस पर कुछ लिखा नहीं है।"
"तो क्या है?"
मीरा ने एक गहरी साँस ली।
"पाँच हाथों के निशान," उसने कहा। "पाँच उँगलियों के नहीं, पूरे हाथों के। लाल स्याही में। पाँचों अलग-अलग आकार के। और नीचे एक लकीर खींची है — जैसे छठी जगह खाली छोड़ी गई हो।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
"मीरा," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ पहली बार ज़रा ऊँची हुई। "उस काग़ज़ को मत छूना। उसके नीचे कुछ है।"
"क्या है?"
"मुझे नहीं पता," शालिनी ने कहा। "पर जो काग़ज़ किसी दीवार पर अकेला नहीं, किसी के इंतज़ार में चिपका हो — उसके नीचे हमेशा एक और काग़ज़ होता है।"
फोन पर एक पल की चुप्पी रही।
फिर मीरा ने कहा, बहुत धीमे — "अंकुश, यहाँ धूप नहीं है। यह दीवार दोपहर में भी ठंडी है। और काग़ज़ के कोने पर एक छोटा सा निशान है। दो लकीरें और बीच में एक बिंदु।"
मैंने आँखें बंद कीं।
पाँच हाथ।
और घंटी ने कल कहा था — चार नहीं, पाँच हाथ।
और आज सुबह — एक और हाथ।
मैंने घंटी उठाई। वो हथेली में बर्फ़ जैसी ठंडी हो गई थी।
"अब बोल," मैंने कहा।
घंटी ने एक लंबी, धीमी आवाज़ की — जैसे पुराने पीतल के भीतर से कोई आदमी कराह रहा हो।
"पाँच हाथ," उसने कहा। "पाँच नाम। पाँचों ने उस रात शर्तनामे पर अंगूठा नहीं लगाया था। हाथ लगाया था।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
"मतलब?"
घंटी चुप हो गई।
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिकाई — एक छोटी, साफ़ आवाज़ हुई, जैसे किसी ने अदालत में हथौड़ा मारा हो।
"मतलब यह," उन्होंने कहा, "कि जिस काग़ज़ पर अंगूठे नहीं, हाथ लगे हैं, वो काग़ज़ किसी शर्तनामे का नहीं। वो किसी वादे का है। और वादे वाले काग़ज़ सबसे खतरनाक होते हैं, क्योंकि उन पर किसी की मुहर नहीं होती — सिर्फ़ याद होती है।"
शालिनी ने अपनी कॉपी उठाई और उसमें कुछ लिखा। फिर उसने पन्ना पलटकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"अब सुनो," उसने कहा। "आज शाम सात बजे के बाद, अगर हम वो कटा हुआ पन्ना नहीं लगा पाए, तो रणवीर कहेगा कि यह डीड अधूरी है। और अगर हम वो पाँच हाथों वाला काग़ज़ नहीं पढ़ पाए, तो हमें पता भी नहीं चलेगा कि हम किसके सामने खड़े हैं।"
"तो हम दोनों चीज़ें लाएँगे," मैंने कहा। "एक तस्वीर से, एक दीवार से।"
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