The Mysterious Bell – Chapter 1380
"हाँ," ज़ुबैर ने कहा। "बिजलीघर की आग के एक हफ़्ते बाद। और उस दिन मेरे पास कोई नहीं आया। न कोई सिपाही, न आग बुझाने वाला, न कोई मालिक। बस सुबह उठा तो शटर का आधा हिस्सा काला पड़ा था और अंदर सब कुछ — दो हज़ार से ज़्यादा नेगेटिव — राख।"
"कोई गया था?"
"गया था," ज़ुबैर ने कहा। "एक आदमी आया था। सफ़ेद कुर्ता। चमकते जूते। उसने मेरी पीठ पर हाथ रखा और कहा — ज़ुबैर भाई, आग तो बहुत कुछ जला देती है। कुछ चीज़ें बचानी होती हैं तो उनकी तस्वीर खींचकर मत रखो। और वो चला गया।"
मीरा ने अपना काग़ज़ वापस उठाया।
"आपने किसी से कहा था?"
"मैंने थाने में लिखवाया," ज़ुबैर ने कहा। "पर उस काग़ज़ पर मेरी शिकायत कभी आगे नहीं गई। और उसके बाद मैंने किसी को कुछ नहीं बोला। बीस साल से दुकान आधी बंद रखी है। यहाँ आने वाले लोग पुरानी तस्वीरें ठीक कराने आते हैं, मैं लेता हूँ, ठीक करता हूँ, पैसा लेता हूँ, बात नहीं करता। यही मेरा काम है।"
मीरा कुछ देर चुप बैठी रही।
फिर उसने कहा, "ज़ुबैर भाई, मैं आपको धमकाने नहीं आई हूँ।"
"तुम सब यही कहते हो।"
"मैं आपके सामने वही करूँगी जो आप कहेंगे," मीरा ने कहा। "अगर आप कहेंगे नाम नहीं लूँगी, मैं नाम नहीं लूँगी। पर ये एक काग़ज़ है जो आज शाम सात बजे मैदान में खुलेगा। इसमें आपकी तस्वीर हो सकती है। और अगर आप चुप रहे, तो उस काग़ज़ पर सिर्फ़ रणवीर की बात लिखी जाएगी।"
ज़ुबैर ने उसकी तरफ़ देखा।
"तुम्हें कब से पता है कि तस्वीर मेरी है?"
"आज सुबह से," मीरा ने कहा। "जब एक बूढ़े आदमी ने हमें बही दी और उसमें से यह पर्ची निकली।"
"कौन बूढ़ा?"
"गोविंद भाई।"
ज़ुबैर की आँखें कुछ देर तक मीरा के चेहरे पर टिकी रहीं। फिर उसने अपना चश्मा उठाया, पोंछा, और पहन लिया।
"गोविंद," उसने धीरे से कहा। "वो अभी ज़िंदा है?"
"हाँ।"
"वो भी बोलेगा?"
"वो सबसे पहले बोलेगा," मीरा ने कहा।
ज़ुबैर ने एक लंबी साँस ली।
उसके बाद वो उठा और पीछे के कमरे में गया। मीरा को उस कमरे से किसी लोहे की चीज़ के खुलने की आवाज़ आई — किसी दराज़ की, किसी तिजोरी की — और फिर फ़र्श पर कुछ भारी रखे जाने की आवाज़ आई।
तभी खिड़की के बाहर कुछ हिला।
मीरा ने सिर घुमाया।
कुछ नहीं दिखा। बस धूल थी और खिड़की के काँच पर कुछ लिखा हुआ।
उसने आँखें सिकोड़कर देखा।
धूल में उँगली से लिखा हुआ था — "पुरानी तस्वीरें मत छेड़ो।"
मीरा का दिल धक् से रह गया।
वो उठकर खिड़की तक गई, और बाहर झाँका।
गली खाली थी। फिर —
"दीदी!"
मीरा चौंकी।
नीचे टिंकू खड़ा था, हाथ में गत्ते का माइक और सिर पर काला एक काँच वाला चश्मा। उसके पीछे सानिया, चिंटू, गुड्डू और रफ़ीक़ — चारों जासूसी किट लिए, चारों की आँखों में यही भाव कि कुछ बड़ा मिलने वाला है।
"तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो?" मीरा ने पूछा।
"जासूसी," टिंकू ने कहा, जैसे यह सबसे आम बात हो।
"मैंने कहा था घर जाओ।"
"हमने सुना नहीं," सानिया ने कहा।
"कान में रुई थी," चिंटू ने कहा।
मीरा मुस्कुराने से खुद को रोक न सकी।
"खिड़की पर किसने लिखा?" टिंकू ने पूछा।
"तुमने पढ़ा?"
"पढ़ा। मैं जब आया, तब भी वहाँ लिखा था।"
"कब आया?"
"पाँच मिनट पहले। मैं खिड़की के नीचे से गुज़रा और देखा। सोचा, किसी ने दीदी को डराने की कोशिश की है।"
मीरा ने एक पल सोचा।
"तुम लोग यहीं रुको," उसने कहा। "किसी से कुछ मत बोलो। मैं अंदर जा रही हूँ।"
वो अंदर लौटी।
तब तक ज़ुबैर पीछे के कमरे से बाहर आ चुका था। उसके हाथ में एक पुरानी लोहे-लकड़ी की पेटी थी, और उस पेटी से कुछ ज़्यादा ही पुरानी गंध आ रही थी — नैफ़्थलीन, धूल और उस पुराने केमिकल की जो पुरानी तस्वीरों में हुआ करता था।
उसने पेटी काउंटर पर रखी और धीरे से ढक्कन खोला।
अंदर काग़ज़ों की परतें थीं — कुछ नेगेटिव की पट्टियाँ, कुछ पुरानी फोटो, कुछ मुड़े हुए कार्ड।
"बीस साल पहले मैंने बहुत कुछ जलाया," ज़ुबैर ने कहा। "पर कुछ चीज़ें जलाने से पहले मैंने छिपा दी थीं। अपने ही घर में। अपनी ही माँ की संदूकची के नीचे।"
उसने एक पट्टी बाहर निकाली, और उसे काँच की मेज़ पर रखकर उस पर झुक गया।
"यह रही," उसने कहा।
मीरा ने झुककर देखा।
पट्टी में एक ही फ़्रेम था। सफ़ेद-काली, किनारों से थोड़ी घिसी हुई तस्वीर।
उसमें दो आदमी थे। दोनों जवान। दोनों के हाथों में फावड़े थे और दोनों एक आधी बनी नींव पर खड़े हुए थे — जो अब बनकर तैयार हो चुकी थी, पर उस वक़्त सिर्फ़ पत्थर और मिट्टी थी।
बाईं तरफ़ वाला आदमी लंबा, चौड़े कंधे और साफ़ कटे बालों वाला। उसकी मुस्कान पहचानी हुई थी। चमकती हुई, चिकनी, वही जो आज टीवी पर हर त्योहार पर दिखती थी।
दाईं तरफ़ वाला आदमी दुबला, हँसमुख, कमर पर हाथ रखे, मुँह खोलकर हँसता हुआ।
"रणवीर," मीरा ने धीरे से कहा।
"हाँ," ज़ुबैर ने कहा। "और ये दूसरा —"
"कौन है?"
"हरी," ज़ुबैर ने कहा। "हरिप्रसाद। रणवीर का पहला साथी। जिसके साथ रणवीर ने पहला ठेका उठाया था।"
मीरा ने उस तस्वीर को देखा, और उसके हाथ काँपने लगे।
"यह कहाँ की तस्वीर है?"
"पुरानी बस्ती के बाहर," ज़ुबैर ने कहा। "उस पहले ठेके की नींव। जब वो दोनों मज़दूरी करते थे। मैं तब उन्हीं के पास रहता था। मैंने यह तस्वीर उस दिन खींची थी जिस दिन उन्होंने पहला पत्थर रखा था।"
मीरा ने उसे उठाया।
"इसके पीछे कुछ लिखा है?"
"लिखा था," ज़ुबैर ने कहा। "पर पढ़ने से पहले —"
उसने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने तस्वीर पलटी।
पीठ पर पुरानी पेंसिल से, बहुत हल्के हाथ से, कुछ लिखा हुआ था। अक्षर इतने हल्के थे कि लगता था लिखने वाले ने खुद लिखकर मिटाने की कोशिश की हो। पर मीरा ने उसे पढ़ लिया।
"इसके तीन हिस्से थे।"
नीचे और कुछ नहीं था।
"तीन हिस्से?" मीरा ने पूछा।
"उस वक़्त उस नींव पर तीन आदमी थे," ज़ुबैर ने कहा। "पर मेरी नज़र में दो ही आए। तीसरा उस वक़्त किसी काम से नीचे गया था। या वो नहीं चाहता था कि उसकी तस्वीर खींची जाए।"
"तीसरा कौन था?"
"मुझे नहीं पता," ज़ुबैर ने कहा। "पर वो वहाँ था। हर जगह था। और हर जगह के बाद कुछ टूटता था।"
मीरा ने तस्वीर ध्यान से देखी।
फिर उसने कुछ और देखा।
दाईं तरफ़, तस्वीर के उस कोने में, जहाँ रणवीर का बायाँ हाथ फावड़े के हैंडल पर रखा था, वहाँ कुछ और भी था।
रणवीर की कमीज़ की बाईं जेब से एक चीज़ का कोना बाहर झाँक रहा था। छोटा, गोल, थोड़ा लटका हुआ।
पहले तो मीरा ने उसे कुछ और समझा। फिर उसने आँखें सिकोड़कर देखा।
उसने काँपते हाथ से तस्वीर को खिड़की की रोशनी के करीब लाया।
और तब उसे समझ आया।
वो चीज़ कोई चीज़ नहीं थी।
वो एक ताला था।
पुराना, मोटा, लोहे का ताला।
वो ताला जो उसने बहुत बार देखा था — उन चार तस्वीरों में, उन काग़ज़ों में जो पिछले कुछ दिनों में उसने देखे थे। वो ताला, जिसे अंकुश ने संदूक से गायब बताया था।
मीरा ने ज़ुबैर की तरफ़ देखा।
"ज़ुबैर भाई," उसने कहा। "इस तस्वीर में रणवीर की जेब से जो लटक रहा है — आपने कभी उसे करीब से देखा?"
ज़ुबैर ने झुककर देखा।
"बीस साल पहले," उसने कहा। "रोज़ देखता था।"
"क्या था वो?"
"वो हमेशा उसे अपने साथ रखता था," ज़ुबैर ने कहा। "न दिन में, न रात में वो उससे दूर होता था। मैंने उसे कभी परखा नहीं। सिर्फ़ एक बार —"
"क्या?"
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