The Mysterious Bell – Chapter 1379
"घंटी," मैंने कहा, "क्या बात है?"
वो चुप रही।
"घंटी," मैंने फिर कहा, "पुरानी तस्वीरें? ज़ुबैर? कुंदनलाल? कुछ तो कह।"
फिर मेरी हथेली पर एक ठंडी लकीर उभरी, जैसे बाहर से कोई उँगली रख रहा हो।
और घंटी ने कहा —
"अब तस्वीर बोलेगी।"
सिर्फ़ तीन शब्द। फिर चुप।
मैंने घंटी जेब में रखी और शालिनी की तरफ़ देखा।
"तुम्हें ज़ुबैर के बारे में कुछ पता है?" मैंने पूछा।
"नाम सुना है," शालिनी ने कहा। "पापा कहते थे कि पुराने बाज़ार का एक फ़ोटोग्राफ़र था जो हर त्योहार पर गली में आकर तस्वीरें खींचता था। फिर एक दिन उसकी दुकान जल गई।"
"जल गई?"
"आग लगी थी," शालिनी ने कहा। "ऐसा कहते हैं।"
"कब?"
"पता नहीं," शालिनी ने कहा। "पर पापा कहते थे कि उसके बाद ज़ुबैर ने कभी कैमरा नहीं उठाया।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। उनका चेहरा कुछ कह रहा था, पर वो बोल नहीं रहे थे।
"पापा?"
"मुझे याद है," उन्होंने कहा, बहुत धीमे से। "एक रात आग लगी थी। मैं बारह-तेरह साल का था। मैंने आग देखी थी, दूर से। और मैंने देखा था कि आग के सामने एक आदमी खड़ा था।"
"कौन?"
"चमकते जूते," पापा ने कहा। "और सफ़ेद कुर्ता।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ।
"आग के सामने?" मैंने कहा।
"आग के सामने," पापा ने कहा। "और वो रो नहीं रहा था। वो देख रहा था। जैसे कोई अपना काम देख रहा हो।"
मीरा के स्टूडियो वाले दृश्य में अभी हम नहीं थे। पर उसकी गली में धूप का रंग बदल रहा था।
पुराने बाज़ार की बिजलीघर वाली गली पतली है — इतनी पतली कि दो साइकिलें भी तिरछी होकर निकलें। बाईं तरफ़ एक पुराना नीम का पेड़ है, दाईं तरफ़ पीली दीवारें, और दीवारों पर पुराने चूने के नीचे किसी ज़माने के विज्ञापनों के अक्षर अभी भी उभरे हुए हैं — "साबुन", "अत्तर", "तस्वीरें"।
मीरा उस गली में पहुँची तो स्टूडियो का शटर आधा गिरा था। ऊपर टँगा बोर्ड — ज़ुबैर फ़ोटो स्टूडियो — पीला पड़ चुका था, और "फ़ोटो" के नीचे का "फ़ो" मिट गया था, जैसे स्टूडियो का नाम भी आधा ही बचा हो।
शटर के नीचे से अंदर झाँकने पर एक कुर्सी दिखी, एक लकड़ी का काउंटर, और दीवार पर वर्षों से टँगी तस्वीरें — शादियाँ, बच्चे, स्कूल के ग्रुप, मुस्कुराते चेहरे। कुछ तस्वीरों के कोने पलटे हुए थे, कुछ पर धूल की मोटी परत थी।
और खिड़की पर, धूल में, किसी ने उँगली से लिखा था —
"पुरानी तस्वीरें मत छेड़ो।"
मीरा ने वो लिखाई देखी। उसने हाथ बढ़ाया, फिर रोक लिया। उसकी उँगली धूल को छूने से पहले रुक गई, और उसने कैमरा उठाकर उसकी तस्वीर ली।
पीछे से टिंकू की आवाज़ आई — बहुत धीमी, बहुत ज़रूरी।
"दीदी।"
मीरा पलटी।
पाँचों बच्चे नीम के पेड़ के पीछे खड़े थे, और टिंकू ने अपना गत्ते का माइक सीने से लगा रखा था।
"क्या?"
"वो लिखाई," टिंकू ने कहा, "तीन दिन पुरानी है।"
"तुम्हें कैसे पता?"
"क्योंकि धूल के किनारे सूखे हैं," टिंकू ने कहा, "और बीच में उँगली की लकीर चिकनी है। जब कोई धूल में लिखता है, तो किनारे उठे रह जाते हैं। सूखने में दो-तीन दिन लगते हैं। यह दो-तीन दिन पुरानी है।"
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा, और मुझे नहीं पता वो क्या सोच रही थी, पर उसने सिर हिलाया।
"तुम ठीक कहते हो," उसने कहा।
"और यह भी," सानिया ने कहा, और आगे आई। "लिखने वाला बायाँ हाथी है।"
"क्यों?"
"क्योंकि लकीर ऊपर से नीचे बाईं तरफ़ झुकी है," सानिया ने कहा। "मैंने अपनी कॉपी में अपनी लिखाई देखी है। मैं दाएँ हाथ से लिखती हूँ, मेरी लकीर दाईं तरफ़ झुकती है।"
मीरा ने सानिया की तरफ़ देखा, और पहली बार उसके चेहरे पर कुछ था — सिर्फ़ पत्रकार नहीं, कुछ और।
"तुम लोग," उसने कहा, "मेरे साथ अंदर नहीं आओगे। बाहर रहोगे।"
"पर—"
"बाहर रहोगे," मीरा ने कहा। "और अगर मैं अंदर से तुम्हें न बुलाऊँ, तो तुम किसी को अंदर मत आने देना।"
टिंकू ने सलाम जैसा हाथ उठाया।
"जी," उसने कहा। "मैं कबूतर हूँ।"
"क्या?"
"जासूसी नाम," टिंकू ने कहा। "मैं कबूतर हूँ। सानिया गिलहरी है। गुड्डू तोता। रफ़ीक़ चिड़िया। और चिंटू—"
"चूहा," चिंटू ने कहा, बहुत गर्व से। "अच्छा चूहा।"
मीरा ने एक गहरी साँस ली और शटर के नीचे झुककर अंदर गई।
स्टूडियो में अंधेरा था, पर वो अंधेरा भी अजीब तरह से रोशनी से भरा था — खिड़की की दरारों से पतली पीली लकीरें आ रही थीं, और उनमें धूल के कण तैर रहे थे, जैसे किसी पुरानी तस्वीर के अंदर चल रहे हों।
पीछे से आवाज़ आई।
"कौन?"
मीरा रुकी।
"मैं मीरा हूँ," उसने कहा। "बस्ती की आवाज़।"
काउंटर के पीछे से एक आदमी उठा। सत्तर से ऊपर, दुबला, सफ़ेद दाढ़ी, चश्मा नाक पर, और हाथों में स्याही के पुराने दाग जो अब त्वचा का हिस्सा लगते थे। उसने मीरा को देखा और उसके चेहरे पर कुछ हुआ — डर नहीं, थकान।
"तुम वो लड़की हो," उसने कहा, "जो पुरानी बातें खोदती है।"
"मैं वो लड़की हूँ," मीरा ने कहा, "जो अपनी गलती मान चुकी है।"
वो कुछ देर चुप रहा।
"गलती मानना आसान है," उसने कहा। "बात खोदना मुश्किल।"
"मुझे पता है," मीरा ने कहा।
"तो फिर क्यों आई?"
मीरा ने अपना बैग खोला और काग़ज़ों का एक पन्ना निकाला — वही पीली पर्ची जो साहब के भेजे बंडल में थी, जिस पर जवान रणवीर की तस्वीर थी, कटा तीसरा आदमी, लकड़ी के जूते और दो लकीर-बिंदु निशान।
उसने उसे काउंटर पर रखा।
ज़ुबैर ने देखा।
और मीरा ने कहा, "आपको यह आदमी पहचानता है?"
ज़ुबैर का हाथ पहले काग़ज़ की तरफ़ बढ़ा, फिर रुक गया, फिर वापस आकर उसके सीने पर चला गया। वो पीछे हटा, कुर्सी से टकराया, और कुर्सी की टाँग फ़र्श पर खरोंच खा गई।
"कहाँ से मिली यह?" उसने पूछा, और उसकी आवाज़ सूखी थी।
"इसी शहर से," मीरा ने कहा।
"कहाँ से?"
"एक बही से," मीरा ने कहा, "जिसमें बाईस साल का हिसाब है।"
ज़ुबैर ने मीरा की तरफ़ देखा। फिर उसने वो काग़ज़ उँगलियों से छुआ, धीरे से, जैसे गरम तवे को छूते हैं।
"मैंने यह तस्वीर बीस साल पहले खींची थी," उसने कहा।
"किसकी?"
"जानता हूँ," ज़ुबैर ने कहा। "पर बोलूँगा नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि मैंने एक बार बोला था," ज़ुबैर ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ टूटा, "और मेरी दुकान जल गई।"
मीरा कुछ देर चुप रही।
"आपकी दुकान जली थी," उसने कहा।
"जली थी," ज़ुबैर ने कहा।
"किसने जलाई?"
"मुझे नहीं पता," ज़ुबैर ने कहा।
"पर आपको शक है।"
ज़ुबैर ने चश्मा उतारा और उसे काउंटर पर रखा। उसके बिना उसका चेहरा और छोटा लग रहा था, जैसे बिना चश्मे के वो अपने ही चेहरे से दूर हो गया हो।
"तुम्हें वो शाम याद है," उसने कहा, "जब बिजलीघर के पास आग लगी थी?"
"मैं उस वक़्त पैदा नहीं हुई थी," मीरा ने कहा।
"मैं जानता हूँ," ज़ुबैर ने कहा। "पर तुम्हारी गली में कोई बूढ़ा होगा जो याद करता हो। उस रात बिजलीघर के पास आग लगी थी, और एक हफ़्ते बाद मेरी दुकान जल गई।"
"एक हफ़्ते बाद?"
"एक हफ"एक हफ़्ते बाद," ज़ुबैर ने कहा।
मीरा ने उसे देखा। उसका हाथ अभी भी काउंटर पर रखे काग़ज़ से सटा हुआ था, जैसे उसे छोड़ने का मन न हो।
"एक हफ़्ते बाद आपकी दुकान जली," मीरा ने धीरे से दोहराया।
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