The Mysterious Bell1378 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1378

6 min read November 5, 2026

"नसीमा बाई, राशन दुकान, बकाया।"

पलटा।

"रमेश भाई, नल का हिसाब, बकाया।"

पलटा।

"भोला भाई, शटर, बकाया।"

पलटा।

"उस्ताद अली बक्श, सिलाई की दुकान, बकाया।"

उस्ताद ने कुछ नहीं कहा। उनके चेहरे पर कुछ हुआ, बहुत छोटा सा, जैसे पुराना दर्द जगह बदल रहा हो।

"बकाया कितना?" उस्ताद ने पूछा।

"उस्ताद—"

"बकाया कितना लिखा है?"

गोविंद भाई ने पन्ने पर उँगली रखी।

"लिखा है," वो बोले, "कि जो बकाया माँगने आए, उसका हिसाब बाद में।"

उस्ताद की आँखें बंद हुईं।

"यह लाइन मेरी नहीं है," गोविंद भाई ने कहा।

सबने उनकी तरफ़ देखा।

"यह लाइन बाद में जोड़ी गई है," उन्होंने कहा। "मैं लिखता था तो सीधे लिखता था — नाम, चीज़, बकाया। बस। इन लाइनों में हवा है। हवा साहब की लिखाई से आती है।"

शालिनी ने बही को अपनी तरफ़ खींचा और पन्नों को शीशे से देखा।

"दो स्याहियाँ हैं," उन्होंने कहा। "यह गहरी काली, और यह नीली।"

"नीली मेरी है," गोविंद भाई ने कहा। "काली नहीं।"

"काली किसकी है?"

गोविंद भाई ने कुछ देर मेज़ पर देखा।

"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "मैंने बही कभी बाहर नहीं जाने दी। पर साहब के दफ़्तार में मेरी बही से कई पन्ने कभी ऐसे लौटे जिन्हें मैंने लिखा नहीं था। मैंने पूछने की हिम्मत नहीं की।"

"कितने पन्ने?" शालिनी ने पूछा।

"पूरे नहीं," गोविंद भाई ने कहा। "लाइनें।"

उन्होंने बही उठाई और उसे सामने सीधी रखकर खोला।

"देखिए," उन्होंने कहा। "यह पन्ना साफ़ है — करीब करीब आधा। नाम हैं, रकम हैं, तारीख़ें हैं। और यह पन्ना —" उन्होंने पलटा, "— इस पन्ने के नीचे आधे में सिर्फ़ एक शब्द दोहराया गया है। बाकी। बाकी। बाकी।"

मैंने देखा। सच में। किसी पन्ने के नीचे की लाइन में बार-बार वही शब्द लिखा था, कहीं पेंसिल से, कहीं कलम से, जैसे किसी ने हिसाब नहीं लिखा, बस डर बोया हो।

"बाकी लिखने की ज़रूरत किसे थी?" मैंने पूछा।

"उसे," गोविंद भाई ने कहा, "जिसे लगता था कि नाम लिखना काफ़ी नहीं, उसके आगे कुछ और भी लिखना चाहिए। नाम से आदमी पहचाना जाता है। बाकी से वो डरता है।"

"कितने पन्नों पर?"

गोविंद भाई ने धीरे से कहा, "मैंने गिना था। इकतीस।"

मेरा हाथ मेज़ पर रखा रह गया।

"इकतीस आदमी?" मैंने पूछा।

"इकतीस लाइनें," गोविंद भाई ने कहा। "कुछ आदमी दो बार आते हैं। पर इकतीस बार किसी का नाम डर के साथ लिखा गया।"

उस्ताद ने बेंच खींचकर बैठते हुए कहा, "और इन इकतीस में से कितने अंगूठे तुमने लिए?"

गोविंद भाई ने उनकी तरफ़ देखा। फिर बही बंद कर दी।

"चार," उन्होंने कहा। "जो मैंने कल रात कहा था — शंकर यादव, नसीमा बाई, रमेश भाई, भोला भाई।"

"और कितनों को काग़ज़ दिए गए?"

"मैं काग़ज़ नहीं ले जाता था," गोविंद भाई ने कहा। "काग़ज़ दो आदमी ले जाते थे। मैं सिर्फ़ हिसाब लिखता था।"

"कौन दो आदमी?"

"सफ़ेद कुर्ते वाले।"

"वही जो आज सुबह मिला?"

"वही," गोविंद भाई ने कहा। "वो हर बार नहीं आता था, पर हर बार काग़ज़ उसी की तरह के कपड़े वाले लाते थे। वो काग़ज़ जमा करता था। और जो काग़ज़ जमा होते थे, वो साहब के पास नहीं जाते थे।"

"तो कहाँ जाते थे?"

गोविंद भाई ने मेरी तरफ़ देखा।

"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मैंने एक बार उसे कहते सुना था — 'पुरानी तस्वीरें मत छेड़ो। अभी वक़्त नहीं आया।'"

मैंने सुना और मेरी रीढ़ से ठंडी लकीर ऊपर गई।

"पुरानी तस्वीरें?" मैंने कहा।

"हाँ," गोविंद भाई ने कहा। "और बही में एक नाम और है, जो इस शब्द से जुड़ा है। ज़ुबैर। पुराने बाज़ार का फ़ोटोग्राफ़र। उसके आगे भी बाकी लिखा है।"

उस्ताद ने अपना चश्मा उतार दिया।

"ज़ुबैर?" उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कुछ था — पुरानी पहचान का झटका। "वो अभी ज़िंदा है?"

"दुकान बंद है," गोविंद भाई ने कहा। "पर आदमी ज़िंदा है।"

मैंने मेज़ से उठकर मीरा को फ़ोन करना चाहा, पर फ़ोन से पहले उस्ताद ने कहा —

"अगर तस्वीरें बोलनी हैं, तो उन्हें ज़ुबैर के पास जाना पड़ेगा।"

मैंने मीरा को फ़ोन किया। उसने दूसरी रिंग में उठाया।

"कहाँ हो?" मैंने पूछा।

"पुराने बाज़ार में," उसने कहा, और उसके पीछे किसी लोहे के शटर की आवाज़ आई। "बिजलीघर वाली गली में एक बंद स्टूडियो दिखा। ज़ुबैर फ़ोटो स्टूडियो।"

मैं रुक गया।

"तुम वहाँ क्यों हो?"

"क्योंकि कल रात मैंने तुम्हारी कॉपी में एक नाम देखा था," मीरा ने कहा। "ज़ुबैर। और उसके आगे बाकी।"

मैं हँसा — थोड़ा, बिना मज़े के।

"तुम तेज़ हो," मैंने कहा।

"मैं जल्दी हूँ," उसने कहा। "तेज़ होना अलग चीज़ है।"

"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद सुनकर मुझे अजीब लगी, "वो डरता है।"

"मुझे पता है।"

"तो उसे मत डराना।"

वो कुछ देर चुप रही।

"अंकुश," उसने कहा, "पाँच साल पहले मैंने एक आधी खबर छापी थी और एक घर टूट गया। आज मैं डरकर काम नहीं करूँगी। मैं सिर्फ़ वही लूँगी जो वो खुद देगा।"

"ठीक है," मैंने कहा। "पर सुनना — मैं भी आ रहा हूँ।"

"तुम नहीं आ सकते," मीरा ने कहा। "अगर तुम आए और उसने देखा, तो सब कुछ बंद हो जाएगा। वो तुमसे डरता है।"

मैंने पापा की तरफ़ देखा। उन्होंने सिर हिलाया।

"पर एक काम करो," मीरा ने कहा। "बच्चों को मेरे पीछे भेज दो। वो देखेंगे, सुनेंगे, और तुम्हें बताएँगे। और वो जानते हैं कि डरने वाले के सामने कैसे बैठना है।"

मैंने फ़ोन रखा और खिड़की से बाहर देखा। बच्चे गुमटी के बाहर इंतज़ार कर रहे थे, टिंकू के हाथ में गत्ते का माइक, सानिया के हाथ में लाल कवर कॉपी।

"टिंकू," मैंने बाहर जाकर कहा।

वो भागकर आया। "हाँ उस्ताद?"

"तुम लोग पुराने बाज़ार जाओगे। ज़ुबैर के स्टूडियो के बाहर। मीरा वहाँ है। और तुम लोग कुछ नहीं करोगे — सिर्फ़ देखोगे, सुनोगे, और मुझे बताओगे।"

टिंकू की आँखें चमकीं।

"यह तो जासूसी है," उसने कहा।

"यह तुम्हारी दोस्ती है," मैंने कहा। "जासूसी से ज़्यादा मुश्किल।"

"क्यों?"

"क्योंकि जासूस को कुछ पता नहीं होता," मैंने कहा। "दोस्त को पता होता है कि कब चुप रहना है।"

टिंकू ने सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू को इशारा किया। पाँचों गली के मोड़ पर मुड़े और गायब हो गए।

मैं गुमटी के पीछे लौटा।

गोविंद भाई अब बही के आख़िरी पन्नों पर आ गए थे।

"यह देखिए," उन्होंने कहा।

पन्ने पर सिर्फ़ एक लाइन थी, और उसके नीचे बड़ी जगह खाली।

"यह क्या है?"

"जगह," गोविंद भाई ने कहा। "यहाँ मैंने कुछ नहीं लिखा।"

"क्यों?"

"क्योंकि यह पन्ना मैंने खुद नहीं लिखा था," गोविंद भाई ने कहा। "यह मुझे लिखा हुआ मिला। और जब मैंने साहब से पूछा कि यह किसका हिसाब है, उन्होंने कहा — 'यह अभी किसी का नहीं है। यह उसका होगा जो सबसे आख़िर में बोलेगा।'"

"आख़िरी नाम?" मैंने पूछा।

गोविंद भाई ने पन्ने को पलटा।

पीठ पर, ऊपर के कोने में, छोटे अक्षरों में एक नाम लिखा था, जो किसी और स्याही में था — बहुत हल्का, जैसे बाद में जोड़ा गया हो।

मैंने पढ़ा।

"कुंदनलाल," मैंने कहा।

"कौन?"

"मुझे नहीं पता," गोविंद भाई ने कहा। "पर यह नाम पिछले हफ़्ते उभरा है। पहले नहीं था।"

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।

"घंटी," उस्ताद ने कहा, "कुछ बोल।"

मैंने घंटी जेब से निकाली। अब वो गरम नहीं थी — ठंडी थी, बर्फ़ जैसी ठंडी। और जब मैंने उसे हिलाया, तो आवाज़ नहीं आई। बस एक धीमी, बहुत धीमी साँस जैसी आवाज़ आई, जैसे पीतल के भीतर कोई सो रहा हो और करवट बदल रहा हो।

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