The Mysterious Bell – Chapter 1377
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर पापा की तरफ़। फिर उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया, भले ही टेप और ढीली हो गई थी।
"उठाओ मुझे," उन्होंने कहा। "ये चीज़ काग़ज़ नहीं है। इसे किसी मेज़ पर रखना पड़ेगा, किसी कपड़े पर नहीं।"
पापा ने उनका दूसरा हाथ पकड़ा। हमने उन्हें उठाया। वो खड़े हुए, एक पल को लड़खड़ाए, फिर सीधे हो गए।
गली में धूप का कोण बदल चुका था। पीपल की छाया छोटी हो रही थी। कुछ बच्चे दौड़ते हुए हमारी तरफ़ आए, फिर हमारे चेहरे देखकर चुप होकर रुक गए। सानिया ने कुछ पूछने के लिए मुँह खोला, पर टिंकू ने उसका हाथ खींच लिया।
"अभी नहीं," टिंकू ने कहा। "देख नहीं रहा? बड़े किसी काम पर जा रहे हैं।"
हम गुमटी की तरफ़ चले।
रास्ते में गोविंद भाई ने एक बार पीछे देखा। फिर दूसरी बार। फिर उन्होंने मुझसे कहा, बहुत धीमे से —
"अंकुश, जो आदमी अभी तुम्हें बंडल देकर गया, वो जानता था कि मैं तुम्हारे साथ हूँ।"
"कैसे?"
"क्योंकि उसने मुझे देखा," गोविंद भाई ने कहा, "और मुस्कुराया। और साहब के आदमी मुस्कुराते नहीं हैं जब तक कि उन्हें कुछ पता न हो।"
शबनम आपा की गुमटी पर सुबह की भीड़ कम हो चुकी थी। हमने पीछे का कमरा खोला। वहाँ एक लकड़ी की मेज़ थी जिसकी एक टाँग के नीचे ईंट रखी थी, दो बेंच, एक अलमारी जिसका दरवाज़ा पूरा बंद नहीं होता था, और दीवार पर लोहे का एक पुराना शीशा टँगा था जिसमें मेरा चेहरा हमेशा दो हिस्सों में दिखता है।
"यहाँ कोई नहीं आता," शबनम आपा ने कहा, और मेज़ पर एक मोटा, धुल भरा कपड़ा बिछा दिया। "पीछे से आ जाओ, आगे गुमटी बंद कर देती हूँ।"
"आपा, आपका धंधा—"
"धंधा मेरा, गुमटी मेरी," उन्होंने कहा, और जाते हुए मुझे घूर गईं, "और जिस गली में मैं चाय बेचती हूँ, वहाँ का सच अगर किसी की छत के नीचे लिखा जाएगा, तो मेरी छत के नीचे।"
वो चली गईं। दरवाज़ा आधा बंद कर गईं।
शालिनी दीक्षित पहले से वहाँ थीं।
वो बेंच के कोने पर बैठी थीं, काली फाइल गोद में, बाल कान के पीछे, और हाथ में एक कलम घुमा रही थीं। उनके चेहरे पर वह शांति थी जो वकीलों के चेहरे पर आ जाती है — बाहर से शांति, भीतर से हिसाब।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मुझे मीरा ने भेजा है। कह रही थी कि गोविंद भाई के पास जो चीज़ है, वो किसी मेज़ पर रखनी है।"
"आपको पता है क्या है?"
"मीरा ने नाम नहीं बताया," शालिनी ने कहा। "बस इतना कहा — डीड।"
गोविंद भाई ने अपनी कमीज़ के अंदर से एक भूरे कपड़े में लिपटी चीज़ निकाली। कपड़ा पुराना था, किनारों से ज़र्द, और उसमें से नहीं, बल्कि उसी कपड़े में लिपटी चीज़ से सीलन और पुरानी स्याही की गंध आ रही थी।
उन्होंने उसे मेज़ पर रखा और कपड़ा खोला।
काग़ज़ इतना पीला था कि पीले से ज़्यादा भूरा लग रहा था, और मोटा — इतना मोटा कि मुझे लगा चार काग़ज़ एक-दूसरे पर दबे हुए होंगे। ऊपर कुछ लिखा था, नीली स्याही में, जो अब फीकी है। नीचे तीन जगह मुहरें लगी थीं, दो गोल और एक लंबी। और नीचे, लगभग आधे पन्ने की चौड़ाई में सात अंगूठे थे, लाल।
सात अंगूठे। सात आदमी। एक-एक अलग लाल, और कुछ ऊपर से फीके पड़ गए थे।
शालिनी ने अपनी फाइल से एक छोटा शीशा निकाला और उसे लाल अंगूठों के पास रखा।
"यह वही है," उन्होंने कहा, और आवाज़ पहले से एक सुर नीचे थी।
"आपको कैसे पता?"
"अंगूठे मिला रही हूँ," उन्होंने कहा। "मैंने अदालती काग़ज़ों पर बहुत अंगूठे देखे हैं। हर आदमी के अंगूठे की दबाने की आदत अलग होती है। कोई ऊँचा दबाता है, कोई तिरछा, कोई पूरा रगड़ता है। ये देखिए — पहला अंगूठा सीधा दबा है, दूसरा तिरछा, तीसरा इतना गहरा कि स्याही पन्ने के रेशे तक बैठ गई।"
उन्होंने आख़िरी अंगूठे पर उँगली रखी।
"और यह," उन्होंने कहा। "यह जगदीश यादव का है।"
मेरे पीछे पापा की साँस रुकी। मैंने सुना।
शालिनी ने उसके ऊपर लिखा नाम पढ़ा — धीरे, जैसे शब्द भी आहत हों।
"जगदीश यादव," उन्होंने कहा। "और नीचे — हिस्सा बराबर।"
मैंने देखा। पापा की आँखें उस नाम पर टिक गई थीं, और उनका हाथ मेरी तरफ़ आया, फिर रुक गया, जैसे उस काग़ज़ को छूने से पहले उन्हें अपनी उँगलियों पर भरोसा चाहिए था।
"पापा," मैंने कहा, "छू लीजिए।"
उन्होंने छुआ। उँगली उस नाम पर रखी और कुछ देर वहीं रही।
"मेरे पापा का हाथ," उन्होंने कहा, बहुत धीमे से, जैसे किसी को अपनी बात सुनाई न दे रही हो। "ये उनका हाथ है। मुझे याद है — मैं आठ-नौ साल का था, और वो अंगूठा लगाते वक़्त अपनी जीभ को दाँतों के बीच दबाते थे। ऐसा कोई करता था क्या?"
उनकी आवाज़ टूटी, फिर सँभली।
"बाईस साल से मैं इस काग़ज़ से डरता रहा," उन्होंने कहा। "और यह काग़ज़ मेरे पापा का था।"
शालिनी ने काग़ज़ के बाएँ नीचे के कोने की तरफ़ इशारा किया।
"पर यह देखिए," उन्होंने कहा।
कौना फटा हुआ था। बड़ा नहीं — चार उँगली जितना। पर फटा हुआ।
मैंने झुककर देखा। कटा नहीं था, फटा था, क्योंकि उसका किनारा सीधा नहीं था, तिरछा और उधड़ा हुआ था। और उसके नीचे काग़ज़ के रेशे दिख रहे थे जो नए लगते थे, गहरे।
"यह कोना कब फटा?" उस्ताद ने पूछा, जो अब तक दरवाज़े के पास खड़े थे और उन्होंने अब तक एक शब्द भी नहीं कहा था।
शालिनी ने किनारा शीशे से देखा।
"यह पुराना फटा हुआ है," उन्होंने कहा, "पर उधड़ा हुआ नया है। मतलब — जब यह फटा तब काग़ज़ पुराना हो चुका था। यह पहले पन्ने को फाड़कर निकाला गया, बाद में नहीं।"
"कितना पुराना?"
शालिनी ने कुछ देर सोचा।
"पत्थर के नीचे रहने वाला काग़ज़ ऐसा नहीं फटता," उन्होंने कहा। "यह गीला नहीं था, सूखा था। यह किसी के हाथ से फटा है।"
पापा ने अपनी जेब से कुछ निकाला। वही पन्ना जो डॉक्टर इसरानी ने आज सुबह दीवार से उतारा था — जिस पर चाक की लिखाई थी।
"ये कोना?" उन्होंने पूछा।
शालिनी ने दोनों किनारों को पास रखा, धीरे से, जैसे कोई चीनी का बर्तन जोड़ रहा हो।
"नहीं," उन्होंने कहा। "यह नहीं मिलता।"
उन्होंने उँगली उठाई।
"पर मैं इतना कह सकती हूँ," उन्होंने कहा, "यह कोना काग़ज़ के सबसे ज़रूरी हिस्से का है। इस ओर अंगूठों के नीचे जो लिखा है — मुहर के नीचे जो शर्त है — वह का हिस्सा है।"
"मतलब कोई उसे ले गया," गोविंद भाई ने कहा, और उनका हाथ मेज़ पर रखा हुआ एक पल को रुका।
"कोई उसे ले गया," शालिनी ने कहा, "या कोई उसे संभालकर रखता है।"
फिर गोविंद भाई ने अपनी बही खोली।
उन्होंने उसे मेज़ पर रखा। काली जिल्द, मोटी, और जब खुली तो भीतर से इतनी गंध आई कि पापा ने नाक धीरे से मुँह पर रख लिया — पुरानी स्याही, धूल, और कहीं से सीलन।
बही के पन्ने सिर्फ़ लिखे हुए नहीं थे। वो टूटे, फटे, कई जगह से पेपर के पैबंद लगे हुए थे, जैसे कोई बही नहीं, ज़िंदा चीज़ हो जिसे सिलने पड़ा हो।
गोविंद भाई ने पहला पन्ना पलटा, फिर दूसरा, फिर तीसरा, और फिर उँगली एक जगह रोक दी।
"ये देखो," उन्होंने कहा। "यहाँ मैंने लिखा है — किशनलाल, किराने की दुकान, बकाया।"
"बकाया कितना?"
"कुछ नहीं," गोविंद भाई ने कहा।
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"कुछ नहीं?"
"किशनलाल काका का एक पैसा भी हमारा नहीं था," गोविंद भाई ने कहा। "हमने यह लिख दिया, इसलिए वो डरते रहे कि उनका कुछ बकाया है। और जो आदमी डरता है कि उसका कुछ बकाया है, वो कभी नहीं पूछता कि बकाया किसका है।"
उन्होंने पन्ना पलटा।
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