The Mysterious Bell – Chapter 1376
"आपा," मैंने कहा, "गोविंद भाई को भी एक दे दीजिए।"
"मैं तो उसे गरम ही लाती हूँ," शबनम आपा ने कहा, और अंदर झाँका। "गोविंद, बाहर आ। मैं तुझे तेरी गुमटी पर ले चलूँगी और तेरे हाथ से चाय पिलाऊँगी।"
गोविंद भाई धीरे से बाहर आए।
धूप में पहली बार उनका चेहरा साफ़ दिखा — झुर्रियाँ, सफ़ेद बाल, आँखों के नीचे काले घेरे। और वो चश्मा जिसका एक काँच चटका था।
काजल उनके पास आई। "गोविंद काका," उसने कहा, "मैंने आपके लिए चश्मा बनवा दिया है। अस्पताल के पास वाली दुकान पर।"
"मेरे पास पैसे नहीं हैं, बेटा।"
"मैंने कहा बनवा दिया है," काजल ने कहा। "पैसे की बात नहीं पूछी।"
गोविंद भाई की आँखें भर आईं।
काजल ने उन्हें अपनी बगल में लिया। इस गली में इस अठारह साल की लड़की को सबसे कम उम्र माना जाता है, पर आज उसने वो काम किया जो कोई बड़ा नहीं कर सका।
उस्ताद अपनी दुकान की दहलीज़ पर खड़े थे।
"अंदर आओ," उन्होंने कहा। "दो मिनट का काम है।"
हम अंदर गए। उस्ताद ने बही को मेज़ पर रखा, अपनी मशीन के पास। फिर उन्होंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा।
"गोविंद," उन्होंने कहा। "तू पच्चीस साल से उस दफ़्तर में बैठा था। अब बताता है या मैं पूछूँ?"
गोविंद भाई ने सिर झुकाया।
"पूछिए, उस्ताद।"
"अब नहीं," उन्होंने कहा। "अब तू सीधा जवाब दे — कल तू क्या बोलेगा?"
"मैं बोलूँगा," गोविंद भाई ने कहा, "कि मैंने चार अंगूठे लिए। और मैं बताऊँगा कि मैंने किस-किस को लिया। और मैं यह भी बताऊँगा कि मैंने क्यों लिया।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे भी डर था," गोविंद भाई ने कहा। "मुझे डर था कि अगर मैं नहीं करूँगा, तो कोई और करेगा। और मैं बाहर हो जाऊँगा।"
उस्ताद ने सिर हिलाया। धीरे से। एक पल के लिए।
"मैं भी यही बोलूँगा," उस्ताद ने कहा। "पचास साल मैंने भी यही किया। डर के मारे चुप रहा। और मेरा भाई मर गया यह सोचकर कि मैंने उसे नहीं बचाया।"
कमरे में एक पल सन्नाटा रहा।
फिर उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "अब तक क्या जोड़ा?"
मैंने जेब से कॉपी निकाली। मेरी हिसाब की कॉपी, जो अब पीली और मुड़ी हुई थी।
"गोविंद भाई और पापा का जोड़," मैंने कहा। "सोलह अंक।"
"और?"
"गोविंद भाई का अपने-आप से जोड़," मैंने कहा, "चार अंक।"
"कुल?"
"बीस।"
उस्ताद ने एक गहरी साँस ली।
"बीस अंक," उन्होंने कहा। "अब तुम्हारे पास चालीस से ऊपर होने चाहिए।"
"अड़तालीस," मैंने कहा, क्योंकि मैंने रात में गिना था।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "तो आज शाम तक तुम्हें कम से कम…"
वो रुके।
"क्या?"
"मुझे नहीं पता," उन्होंने कहा, और पहली बार उनकी आवाज़ में झिझक थी। "पचास साल पहले जब हमने तीन बड़े जोड़ किए थे, घंटी ने कहा था कि हमें एक ऐसी शाम के लिए तैयार रहना चाहिए, जब सारे अंक खर्च करने पड़ें। उस शाम हम सिर्फ़ दो आदमी थे। आज पूरी गली है। पर पता नहीं…"
वो फिर रुके।
"क्या पता नहीं, उस्ताद?"
"पता नहीं," उन्होंने कहा, "कि जब सारे अंक खर्च हो जाएँगे, तो क्या बचेगा।"
मैंने घंटी हथेली पर रखी।
"घंटी," मैंने कहा, "आज शाम के बाद तू रहेगी या नहीं?"
घंटी कुछ देर चुप रही।
फिर उसने कहा —
"मैं तुम्हारी नहीं हूँ।"
मैं चौंका।
"मैं इस गली की हूँ।"
फिर रुकी।
"और गली जब तक बोलेगी, मैं बजूँगी।"
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा।
"अब तू जान गया," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"कि आज शाम हमें गली को बोलना सिखाना है। घंटी को नहीं।"
मैंने सिर हिलाया।
बाहर निकले तो सूरज पीपल की डालियों के बीच से आ रहा था। गली में धूप-छाँव का खेल शुरू हो गया था — वही जो हर सुबह होता है और हर सुबह मुझे अच्छा लगता है।
बच्चे पर्चियाँ बाँट रहे थे। टिंकू के हाथ में गत्ते का माइक था, जिस पर उसने पेंसिल से लिखा था — जोड़ स्कूल।
मère नज़र स्कूल गेट की तरफ़ गई।
वहाँ कोई खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता।
और उसके हाथ में एक बही थी।
नहीं — बही नहीं। काग़ज़ों का एक मोटा बंडल।
मैंने सबको रोका। "रुको।"
वो आदमी हमारी तरफ़ आ रहा था। धीरे-धीरे, जैसे गली की धूल भी उसके कदमों से डर रही हो।
वो सामने आया और रुक गया।
"अंकुश यादव?" उसने पूछा।
"हाँ।"
वो मुस्कुराया। वही मुस्कान।
"यह भेजा है," उसने कहा, और काग़ज़ों का बंडल मेरी तरफ़ बढ़ाया। "साहब ने कहा — जो चीज़ आज शाम बोलनी है, वो अभी से तुम्हारे हाथ में रहे।"
मैंने बंडल लिया। भारी था।
"क्यों?" मैंने पूछा।
"साहब ने कहा," वो आदमी बोला, "कि जिस आदमी के पास सब कुछ हो, वो ज़्यादा बोलता है। और साहब चाहते हैं कि आज तुम ज़्यादा बोलो।"
वो पलटा और चला गया।
मैंने बंडल खोला।
ऊपर वही पीली पर्ची थी — जो बही में से गिरी थी। पर इस बार उस पर कुछ और लिखा था।
"अगर तुम यह पर्ची पढ़ रहे हो, तो तुमने पहला हाथ पहचान लिया है।"
उसके नीचे — वही तस्वीर। वही जवान रणवीर। वही कटा हुआ तीसरा आदमी।
और उसके नीचे, आख़िरी लाइन —
"आज शाम सात बजे, मैदान में, तुम्हारा नाम लिया जाएगा। पर पहले मेरा।"
मैंने आँखें बंद कर लीं।
और मैंने महसूस किया — मेरी जेब में घंटी गरम है।
बहुत गरम।
जैसे वो कह रही हो — खेल अब शुरू हुआ।
॥
वो आदमी गया, और मेरी जेब में घंटी जल रही थी।
इतनी गरम कि कमीज़ की जेब से धुआँ निकलता लगा। मैंने हाथ डालकर उसे निकाला तो हथेली पर रखते ही त्वचा चटकी जैसी लगी। पीतल का रंग गहरा ताँबई हो गया था, जैसे किसी ने उसे आग पर तपाया हो।
"क्या हुआ?" पापा ने पूछा।
"गरम है," मैंने कहा।
"कितनी?"
"बहुत।"
पापा ने अपनी हथेली आगे की। मैंने घंटी उनके हाथ पर रखी। वो एक पल को सिकुड़े, फिर भी नहीं छोड़ा। उन्होंने उसे धीरे से सहलाया, ठीक वैसे जैसे बाईस साल पहले कभी सहलाया होगा।
"यह गरम नहीं है," उन्होंने कहा।
"क्या?"
"यह जल्दी में है," उन्होंने कहा। "गरमी नहीं, जल्दी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। दोपहर की धूप में उनका चेहरा पसीने से चमक रहा था, चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ, और आँखों में वही शांति थी जो मुझे हमेशा डराती है। जिस आदमी के पास कुछ न बचा हो, उसकी आँखों में ऐसी शांति आ जाती है।
"पापा," मैंने कहा, "ये बंडल भारी है।"
"भारी चीज़ें हल्की नहीं होतीं," उन्होंने कहा। "उन्हें उठाना पड़ता है।"
मैंने बंडल कसकर पकड़ा और पीछे मुड़ा।
गोविंद भाई बेंच पर बैठे थे, दोनों हाथ घुटनों पर, और उनका चश्मा नाक पर तिरछा लटक रहा था। टेप की एक परत खुल चुकी थी और चश्मा उनके कान से अलग हिल रहा था। वो कुछ बोल नहीं रहे थे। बस साँस ले रहे थे, बहुत धीमी, बहुत मुश्किल से।
"गोविंद भाई," मैंने कहा, और उनके पास बैठ गया। "आप ठीक हैं?"
"मैंने सोचा था," उन्होंने कहा, आवाज़ काँप रही थी, "कि जिस दिन सब बोलूँगा, उस दिन हल्का हो जाऊँगा।"
"और?"
"और हल्का नहीं हुआ," उन्होंने कहा। "और डर लग रहा है।"
"डर किसका?"
"इस बात का," उन्होंने कहा, "कि अब जो बोलूँगा, उसके बाद मेरे पास बोलने को कुछ नहीं बचेगा। बाईस साल से मेरे पास एक ही चीज़ थी — चुप्पी। अब वो भी जा रही है।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। हड्डी जैसा हाथ, जैसे भीतर से खोखला हो गया हो।
"गोविंद भाई," मैंने कहा, "चुप्पी आपकी थी ही नहीं। वो साहब की थी। आप सिर्फ़ उसके भंडारी थे।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno