The Mysterious Bell – Chapter 1374
"गोविंद भाई," मैंने कहा।
वो हिले। फिर मेरी तरफ़ देखा। फिर पापा की तरफ़ देखा।
और फिर वो रो पड़े।
नहीं — रोना नहीं। वो टूट पड़े। जैसे कोई पुरानी दीवार जिसे बहुत देर से किसी ने छुआ नहीं था, और अचानक एक ईंट हिल गई।
"मैं… मैं लौट नहीं पाया," उन्होंने कहा। "कल रात मैं लौटने वाला था। सच में। मैं गेट तक आया था। देखा था तुम दोनों को। फिर… फिर मुझे लगा कि अगर मैं बोलूँगा, तो सब खत्म हो जाएगा।"
"क्या खत्म हो जाएगा?" पापा ने पूछा, और उनकी आवाज़ बहुत नरम थी।
गोविंद भाई ने सीने से चिपकी चीज़ को और कस लिया।
"मेरी बेटी," उन्होंने कहा। "उसकी शादी अगले साल है। मैंने सोचा… मैंने सोचा अगर सब पता चल गया तो लोग कहेंगे कि गोविंद वो आदमी है जिसने शंकर यादव का अंगूठा लिया। और फिर… फिर मेरी बेटी के ससुराल में…"
वो रुक गए। साँस नहीं आ रही थी।
मैं उनके पास घुटनों के बल बैठ गया।
"गोविंद भाई," मैंने कहा, "आपके हाथ में क्या है?"
उन्होंने धीरे से हाथ खोला।
पीली, मुड़ी, मैली, किनारों से घिसी हुई। ऊपर पुरानी मुहर। और नीचे, बहुत नीचे, सात अंगूठों जैसे धुँधले निशान।
अस्पताल की मूल डीड।
"तुमने इसे चुराया?" पापा ने पूछा।
"मैंने बचाया," गोविंद भाई ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार साफ़ हुई। "शंकर भाई, मैंने इसे बचाया।"
वो फिर रुके। होंठ काँपे।
"कल रात," उन्होंने कहा, "जब तुम सब पीपल पर थे, साहब का आदमी दफ़्तर आया। उसने कहा — जो काग़ज़ अस्पताल की तिजोरी से निकला है, वो आज रात जल जाएगा। और मैंने… मैंने कहा कि साहब का हुक्म है तो…"
पापा ने आँखें बंद कर लीं।
"पर फिर मैंने उसे उसी तिजोरी में देखा," गोविंद भाई ने कहा। "उस पर सात अंगूठे थे। सात। मैंने बाईस साल उस दफ़्तर में हिसाब लिखा है। मैं जानता हूँ कि सात अंगूठे का मतलब क्या होता है — इसका मतलब है कोई एक आदमी मालिक नहीं। सब मालिक हैं।"
वो फिर रुके।
"और मैंने सोचा," उन्होंने धीरे से कहा, "कि मैंने एक बार पहले भी ऐसा किया था। डर के मारे अंगूठा लगाया था। तो क्या मैं दूसरी बार भी वही करूँगा?"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
"अंकुश," उन्होंने कहा, "मैंने तुम्हारे पापा का अंगूठा लिया था। मैंने उन्हें बुलाया था, मैंने उनके सामने काग़ज़ रखा था, और मैंने उनका हाथ पकड़कर नीचे दबाया था। उन्होंने मना नहीं किया, पर मना करने की हिम्मत मैंने ही नहीं दी थी।"
कमरा एकदम चुप हो गया।
मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो दीवार से टिके खड़े थे, और उनका चेहरा… उनका चेहरा वैसा था जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा। डर नहीं, शर्म नहीं, गुस्सा नहीं। सिर्फ़ एक बहुत पुरानी थकान।
"गोविंद," पापा ने कहा, "मैंने उस रात तुम्हारा हाथ नहीं रोका।"
"क्यों नहीं रोका?"
"क्योंकि मुझे डर था," पापा ने कहा, और वो शब्द बहुत धीरे निकले — जैसे कोई आदमी बाईस साल से उन्हें अंदर दबाए बैठा हो। "क्योंकि उस वक़्त सुशीला अस्पताल में थीं, और मेरे पास एक भी पैसा नहीं था, और मुझे लगा कि अगर मैं हाँ नहीं कहूँगा तो सब खत्म हो जाएगा।"
वो फिर रुके।
"और सबसे बड़ी बात — मैंने तुम्हें उस दिन भी नहीं रोका," उन्होंने कहा, "जिस दिन तुम वो बही लेकर आए थे और मैंने सिर्फ़ इतना कहा था — रख दो, कहीं रख दो।"
गोविंद भाई ने अपना चश्मा — जो उन्होंने जेब में रख लिया था — निकाला, पर पहना नहीं।
"मैंने भी तुम्हें चुप रहना सिखाया," उन्होंने कहा। "हर बार जब मैं तुम्हारे सामने काग़ज़ रखता था, मैं तुम्हारी आँखों में डर देखता था। और मुझे… मुझे लगता था कि अगर तुम डर रहे हो, तो मैं इतना बुरा नहीं हूँ।"
वो मुश्किल से बोल रहे थे।
"आज मुझे पता चला कि यह सोचना ही सबसे बड़ी गलती थी। मैं इतना बुरा हूँ। और मैंने एक और आदमी को भी अपने जैसा बना दिया।"
कमरे में धूल धीरे-धीरे बैठ रही थी।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने एक लंबी साँस ली।
"गोविंद," उन्होंने कहा, "मैं कल मैदान में अपना सच बोलूँगा। तुम्हारे साथ।"
"मेरे साथ?"
"तुम मेरे मुंशी थे," पापा ने कहा। "तुम कभी किसी और के नहीं थे। जब मैंने अंगूठा लगाया, तुमने कलम पकड़ी थी। जब मैं घर आया, तुमने काग़ज़ मेरी जेब में रखा था। और जब बाईस साल तक मैं चुप रहा, तुम भी चुप रहे।"
वो गोविंद भाई के पास आए।
"मैं तुम्हें साथ लेकर बोलूँगा। अकेले नहीं।"
गोविंद भाई ने अपनी हथेली उनकी तरफ़ बढ़ाई। हथेली पर धूल थी, पसीना था, और पीली डीड का कोना रगड़ खा रहा था।
पापा ने उनका हाथ पकड़ा।
और उसी पल — मेरी जेब में घंटी बजी।
धीरे, छोटी, पर साफ़।
मैं चौंका। मैंने घंटी नहीं छुई थी।
मैंने जेब से निकाला, हथेली पर रखा।
घंटी ने कहा —
"भरोसा।"
फिर थोड़ी देर बाद, धीमे से —
"सोलह अंक।"
मेरी साँस रुक गई।
सोलह।
मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा। उनके हाथ अब काँप नहीं रहे थे। पापा का हाथ उनके हाथ पर था, और उनकी हथेली स्थिर थी। ठीक वैसी स्थिर, जैसी बाईस साल पहले नहीं थी।
“गोविंद भाई,” मैंने कहा, “अब आप कहिए — मैंने क्या किया था?”
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
“तुमने कुछ नहीं किया था,” उन्होंने कहा। “तुम उस रात बस खड़े थे। तुम्हारी उम्र बारह साल होगी। तुम पीछे खड़े होकर दरवाज़े से झाँक रहे थे, और तुम्हारी माँ अस्पताल में थीं, और तुम्हारे पापा आँसू पोंछ रहे थे, और मैं… मैंने तुम्हारी आँखों में देखकर सोचा कि इस बच्चे को कुछ नहीं बताना चाहिए।”
उन्होंने फिर रुककर मेरी तरफ़ देखा।
“यही सबसे बड़ी गलती थी।”
मैंने धीरे से कहा, “अब आप बताइए।”
“क्यों?”
“क्योंकि मैं आज से पहले सिर्फ़ इतना जानता था कि मेरे पापा ने अंगूठा लगाया था। अब मैं जानता हूँ कि आपने भी।”
वो चुप रहे। फिर उन्होंने होंठ भींचे और कहा —
“मैंने चार आदमियों का अंगूठा लिया। शंकर भाई का, नसीमा बाई का, रमेश भाई का और भोला भाई का। चारों को मैंने बुलाया। चारों को मैंने कहा — सिर्फ़ एक अंगूठा है।”
“क्यों?”
“क्योंकि मेरा साहब कहता था — जो अंगूठा देता है, वो हमेशा हमारा रहता है।”
“और आपको?”
“मुझे?” उन्होंने कहा, और पहली बार उनकी आवाज़ में कुछ और था। “मुझे लगता था कि मैं साहब का हूँ। अब पता चला कि मैं सिर्फ़ एक कलम था। और कलम के पास अपना हाथ नहीं होता।”
वो एक पल रुके।
“आज आपके पापा ने मेरा हाथ पकड़ा,” उन्होंने कहा, “तो पहली बार लगा कि मेरा अपना हाथ है।”
पापा ने उनका हाथ छोड़ दिया। फिर हल्का हिलाया।
“है,” उन्होंने कहा। “और ये अब अपना ही काम करेगा।”
मैंने घंटी को फिर से हथेली पर रखा।
घंटी ने धीमे से कहा —
“बीस।”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
बीस अंक।
इस एक कमरे में, इस धूल भरी कोठरी में, जिसमें रोशनी नहीं थी और हवा नहीं थी — यहाँ मेरी कॉपी में बीस अंक जुड़ गए।
और मुझे पता था कि बीस अंक किस चीज़ से बने थे। वो बने थे बाईस साल की चुप्पी के टूटने से। वो बने थे दो आदमियों के एक-दूसरे के सामने झुकने से।
गोविंद भाई ने धीरे से अपना चश्मा पहना।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “दफ़्तर में एक मोटी काली बही है। मैं उसे लाया हूँ।”
“कहाँ है?”
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