The Mysterious Bell1373 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 1373

7 min read November 5, 2026

सुबह छह बजे मेरी आँख खुली, और पहली आवाज़ जो सुनाई दी, वो चिमटे की थी।

माँ चूल्हे पर रोटी बना रही थीं। चिमटा तवे पर बज रहा था, और साथ में माँ की फुसफुसाहट — जैसे कोई हिसाब कर रहा हो, बिना काग़ज़ के, बस ज़ुबान से।

मैं चारपाई से उठा, तो कमर में दर्द था। रात भर पीपल के नीचे लालटेनों के बीच बैठा था, पर्चियाँ लिखता रहा, और उस्ताद के साथ शटर उठाता रहा। हाथ में ग्रीस का पुराना निशान अब भी था, और उँगली के जोड़ पर वो मटर जितना फफोला — घंटी के ठंडे जलने का निशान।

मैंने जेब टटोली।

घंटी वहीं थी। साइकिल के खाली ब्रैकेट से उतारकर मैंने उसे रात को अपनी जेब में रख लिया था, क्योंकि पापा ने कहा था — जो चीज़ रात में खुली साइकिल पर रहे, वो सुबह तक किसी और की हो जाती है।

बाहर निकला, तो आँगन में ओस थी। चप्पल भीग गई। गली के मुँह से धुआँ उठ रहा था — शबनम आपा की गुमटी की चिमनी जल चुकी थी।

मैंने आकाश की तरफ़ देखा। आसमान साफ़ था। कोई बादल नहीं। पर मन कह रहा था कि आज की शाम कुछ भारी है। आज शाम सात बजे, नूर अस्पताल के मैदान में।

आज वो दिन है जिसके लिए पूरी गली बाईस साल से चुप बैठी थी।

पीपल के नीचे पहुँचा, तो बच्चे पहले से जमे थे।

टिंकू हाथ में झाड़ू लिए खड़ा था, सानिया के हाथ में चॉक का टुकड़ा था और वो चबूतरी पर सीधी लकीरें खींच रही थी, गुड्डू पुरानी चारपाई का टुकड़ा खींच रहा था और चिंटू — चिंटू अपनी कमीज़ की जेब टटोल रहा था, जैसे उसमें कोई खज़ाना हो।

रफ़ीक़ पीपल की जड़ के पास बैठा था, हाथ में पुरानी रिम, और अपने टूटे चश्मे से मुझे देख रहा था।

"उस्ताद," टिंकू ने कहा, "मैंने सोचा, आज हम सबसे पहले चबूतरी साफ़ करें। सफ़ाई से शुरुआत।"

"अच्छा सोचा।"

"और उस्ताद — क्या आज लालटेनें ज़्यादा लगेंगी?"

"क्यों?"

"क्योंकि आज आधी गली आएगी," उसने कहा, और फिर धीरे से जोड़ा, "और शायद आधी से ज़्यादा भी।"

मैं उसके सिर पर हाथ रखने ही वाला था कि शबनम आपा की आवाज़ आई।

"अरे, चाय पी लो पहले। भूखे पेट सफ़ाई नहीं होती।"

वो गुमटी से बाहर आईं, हाथ में पीतल की थाली, उसमें पाँच गरम कुल्हड़। धुआँ उठ रहा था।

कुल्हड़ मैंने लिया तो उँगलियाँ जल गईं, पर अच्छा लगा। दर्द कभी-कभी अच्छा लगता है, जब वो ज़िंदगी का हो, काग़ज़ का नहीं।

"तीन बड़ी देगची चढ़ा दी हैं," शबनम आपा ने कहा। "एक में चाय, दो में खिचड़ी। माँ ने कहा था पूरी गली को खाना खिलाऊँगी। तो मैंने सोचा, मैं भी हाथ बँटा लूँ।"

"आपा, आपका चूल्हा तो बीस दिन बाद बंद होने वाला था।"

उनका चेहरा एक पल के लिए बदला।

"बंद होने वाला था," उन्होंने कहा। "हो गया नहीं अभी।"

फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कहा — "आज मेरे चूल्हे पर जो चीज़ पकेगी, वो किसी काग़ज़ में नहीं लिखी जाएगी। सिर्फ़ खाई जाएगी।"

मैं मुस्कुराया। और मैंने सोचा — कभी-कभी सबसे बड़ी बात वही होती है जो काग़ज़ पर नहीं आती। और इसीलिए वो सबसे ज़्यादा डराती भी है।

उस्ताद की दुकान का शटर खुला था। वो अंदर बैठे थे, मशीन के पास, हाथ में सफ़ेद कपड़ा और सुई। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया।

"क्या सिल रहे हैं?"

"जो कल पहनूँगा," उन्होंने कहा। "पचास साल पहले का सफ़ेद कुर्ता। आज उतारा है।"

"आज?"

"आज," उन्होंने कहा। "जब सच बोलना हो, तो पुराना कपड़ा पहनना चाहिए। नया कपड़ा सच को कभी-कभी दिखावा बना देता है।"

मैं उनके पास बैठ गया।

"उस्ताद, आज शाम…"

"मुझे पता है," उन्होंने कहा, बिना मुझे देखे। "मैं चुप नहीं रहूँगा। पचास साल का सन्नाटा बहुत हो गया।"

मशीन ने टक की आवाज़ की। सुई ऊपर-नीचे हुई।

"आज सुबह गोविंद भाई दुकान पर आए थे?" मैंने पूछा, क्योंकि उनके चश्मे का कोई ज़िक्र याद आया था — कल रात वो गेट पर खड़े थे, काँपते हुए।

उस्ताद ने सुई रोक दी।

"गोविंद?" उन्होंने पूछा, और फिर सिर उठाकर मेरी तरफ़ देखा। "गोविंद तो कल रात से नहीं दिखा।"

मेरे हाथ से कुल्हड़ का आख़िरी घूँट हल्का काँप गया।

"कल रात? वो तो गेट पर थे। बोले थे — मैं कल मैदान में आऊँगा।"

"बोलकर गए थे," उस्ताद ने कहा। "पर वो आदमी बोलकर जाता है, वापस नहीं आता। मैं उसे पच्चीस साल से जानता हूँ। जब वो डरता है, तो घर नहीं जाता। जहाँ काम करता था, वहीं छिप जाता है।"

मैं उठ खड़ा हुआ।

"उनका पुराना दफ़्तर?"

"पीछे की गली में," उस्ताद ने कहा। "भारद्वाज भवन के पीछे वाला, वो जगह जहाँ 'हिसाब' लिखा बोर्ड लगा है।"

और मैं चल पड़ा।

रास्ते में पापा मिले।

वो गली के मुँह से आ रहे थे, हाथ में पुरानी काली साइकिल, और साइकिल के हैंडल पर घंटी का खाली ब्रैकेट खाली था, क्योंकि घंटी मेरी जेब में थी।

"पापा — गोविंद भाई नहीं मिल रहे।"

पापा ने साइकिल खड़ी की। एक पल चुप रहे, फिर बोले — "डर के मारे छिपे हैं।"

"डर?"

"जो आदमी दो आदमियों के बीच फँसा हो," पापा ने कहा, "उसे हर आवाज़ पीछे से आती सुनाई देती है। गोविंद की पूरी ज़िंदगी उसी में बीती है।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।

"मेरे साथ चलो," उन्होंने कहा। "मैं जानता हूँ वो कहाँ होगा।"

हम पीछे की गली में मुड़े।

ये वो गली थी जहाँ दिन में भी छाया रहती है। भारद्वाज भवन की पीछे वाली दीवार बाईं तरफ़ थी — ऊँची, सफ़ेद, ऊपर से नीचे तक साफ़। और उसके नीचे गली थी — यहाँ कुछ दुकानें थीं, छोटे-छोटे दरवाज़े, और सबसे आख़िर में एक लोहे का दरवाज़ा, जिस पर हाथ से लिखा बोर्ड टँगा था।

बोर्ड पर लिखा था — हिसाब।

दरवाज़ा खुला था।

मैं रुक गया।

"पापा…"

"अंदर चलो," उन्होंने कहा, और पहले वो अंदर गए।

कमरा छोटा था। एक मेज़, दो कुर्सियाँ, एक रैक जिसमें पुरानी फाइलें बँधी थीं, एक छत का पंखा जो नहीं चल रहा था, और हवा में वो अजीब सी गंध — धूल, पुरानी स्याही और ठंडी चाय।

मेज़ पर चश्मा पड़ा था।

वो चश्मा जिसका एक काँच चटका था, जिसकी डंडी पर टेप लिपटा था, जिसे गोविंद भाई आँख से उतारकर ही पोंछते थे।

चश्मा मेज़ पर रखा था।

और काली बही नहीं थी।

मैंने मेज़ को देखा। मेज़ पर धूल में एक चौकोर साफ़ जगह थी — जहाँ बही रखी थी। जगह साफ़ थी, मतलब पास ही रखी थी, बहुत देर नहीं हुई। और उसके नीचे कोई उन्होंने जल्दी में उठाया था।

"पापा, बही गायब है।"

पापा ने मेज़ के चारों तरफ़ देखा। फिर कुर्सी के नीचे। फिर रैक की तरफ़।

"नहीं," उन्होंने कहा, बहुत शांत आवाज़ में। "बही गायब नहीं है। वो अपने साथ ले गया है।"

"कैसे पता?"

पापा ने कुर्सी की पीठ पर रखा हाथ हटाया।

"क्योंकि जब आदमी भागता है, तो अपना चश्मा भूल जाता है," उन्होंने कहा, "पर अपना हिसाब नहीं भूलता।"

और तभी पीछे से आवाज़ आई।

धीमी। काँपती। जैसे किसी ने आधी साँस में कहा हो।

"शंकर भाई…"

हम दोनों पलटे।

कमरे के पीछे एक छोटा दरवाज़ा था — लकड़ी का, टेढ़ा, जिस पर कभी हरे रंग का पेंट था और अब सिर्फ़ उतरा हुआ निशान बचा था।

दरवाज़ा थोड़ा खुला था।

मैंने धक्का दिया।

अंदर अंधेरा था। कोई खिड़की नहीं, बस ऊपर एक झिरी जैसी जगह से पतली रोशनी आ रही थी, जिसमें धूल के कण तैर रहे थे।

और फ़र्श पर, दीवार से सटकर, गोविंद भाई बैठे थे।

घुटने सीने से सटे थे। हाथ में कुछ चिपकाया हुआ था, सीने से लगाया हुआ था। आँखें लाल थीं। होंठ सूखे थे। पूरी शर्ट पसीने में भीगी थी, और पैरों में एक ही चप्पल थी।

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