The Mysterious Bell – Chapter 1372
मैं हँसा।
"किसने लिखा?"
"मैंने," सानिया ने कहा। "और नीचे वाली लाइन चिंटू ने लिखी है।"
"नीचे क्या लिखा है?"
चिंटू ने अपनी पर्ची ऊँची उठाई और पढ़ा: "और जो झूठ बोलेगा, उसके समोसे हम खा जाएँगे।"
भीड़ में हँसी फट पड़ी।
और उस हँसी के बीच, मैंने एक चीज़ देखी जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
बबलू।
वो पीपल के किनारे खड़ा था — और मैंने सोचा कि वो बच्चों को डाँटेगा। मैंने अपना मुँह खोला, ताकि कहूँ — बबलू भाई, ये बच्चे हैं। पर मुझे कहने की ज़रूरत नहीं पड़ी।
बबलू ने अपना हाथ बढ़ाया और चुपचाप एक पर्ची उठा ली।
फिर उसने उसे पढ़ा।
फिर उसने उसे अपनी कमीज़ की जेब में रखा।
और फिर उसने चिंटू की तरफ़ देखकर कहा, "समोसे तेरे हिस्से में नहीं होंगे।"
चिंटू ने पूछा, "क्यों?"
"क्योंकि तू झूठ बोलेगा," बबलू ने कहा। "तू तो पहले ही बोल चुका है कि तेरे समोसे मैंने खाए थे।"
भीड़ हँसी। चिंटू का मुँह खुला रह गया।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। पर उसके होंठों पर एक हल्की सी हँसी थी, जो उस आदमी की होती है जिसने बहुत सालों बाद कुछ ऐसा किया जिसका उसे खुद अभ्यास नहीं है।
मैंने उसके पास जाकर कहा, "तुमने पर्ची क्यों ली?"
"क्योंकि मेरी भी एक बात है," उसने कहा। "और वो मैं कल बोलूँगा।"
"किसकी गलती?"
उसने मेरी तरफ़ देखा।
"अपनी," उसने कहा।
मैं कुछ नहीं बोला।
"अजीब लग रहा है ना?" उसने कहा। "मुझे भी। बारह साल से मैं लोगों से उनकी गलती कहवाता रहा हूँ। आज पहली बार सोच रहा हूँ कि अपनी कैसे बोलूँगा।"
"मुझे भी नहीं पता," मैंने कहा।
"तो साथ बोलेंगे," उसने कहा।
और वो चला गया।
मैं वहीं खड़ा रहा, और मुझे लगा कि आज का दिन मुझे लगातार वो चीज़ दे रहा है जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी — और मैं उसका आदी नहीं हूँ।
घर पहुँचा तो शाम हो रही थी।
माँ चूल्हे पर थीं। काजल दवाई के डिब्बे गिन रही थी। और दुकान के पीछे वाले कमरे से आवाज़ आ रही थी — पानी गिरने की, फिर किसी के कपड़े झाड़ने की।
मैं पीछे गया।
दुकान का शटर आधा उठा हुआ था। और उसके नीचे, अंधेरे में, पापा खड़े थे।
उन्होंने अपनी पुरानी साइकिल निकाल ली थी।
वो साइकिल — जिसे मैंने बचपन में देखा था और फिर कभी नहीं देखा। काले रंग की, जंग लगी, पीछे का मडगार्ड टेढ़ा, आगे की टोकरी में पुराना कपड़ा। और हैंडल पर — वो खाली ब्रैकेट।
जिसमें घंटी नहीं थी।
क्योंकि घंटी मेरी जेब में थी।
मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हथेली में रखा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"इस पर लगा दे," उन्होंने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि ये उसकी जगह है," उन्होंने कहा। "मैंने इसे बाईस साल उस पर लगा देखा है।"
मैंने घंटी को उस ब्रैकेट पर लगाया। पेंच कसा। घंटी बैठ गई, जैसे कोई घर लौटकर अपनी कुर्सी पर बैठता है।
और फिर —
घंटी अपने आप बजी।
हल्की सी। एक बार।
और तंत्र की आवाज़ आई, धीमी, जैसे किसी ने बहुत दूर से कहा हो —
"अब तेरा सच पापा के सच से जुड़ेगा।"
मैं रुक गया।
"क्या मतलब?"
"एक सच अधूरा रहता है," घंटी ने कहा। "दो सच पूरे होते हैं।"
"और उसके बाद?"
घंटी चुप हो गई।
मैंने उसे छुआ। गरम थी। मैंने उसे हिलाया। कुछ नहीं बोली।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो साइकिल के हैंडल पर हाथ रखे खड़े थे और घंटी को देख रहे थे।
"पापा," मैंने कहा, "ये घंटी बोलती है।"
वो कुछ देर चुप रहे।
फिर उन्होंने कहा, "मुझे पता है।"
"आपको पता है?"
"तेरे दादा को भी पता था," उन्होंने कहा। "और मुझे लगता है कि मुझे ये बात बहुत पहले बोल देनी चाहिए थी।"
"तो अब बोलिए।"
उन्होंने एक लंबी साँस ली।
"बाईस साल पहले," उन्होंने कहा, "मैं उस काग़ज़ पर अंगूठा लगाने गया था, और उस वक़्त घर में ये घंटी थी। और उस रात ये बजी थी। बिना वजह। मैंने उसे सिर्फ़ पुरानी घंटी समझा। मैंने सोचा कि हवा से बजी होगी।"
वो रुके।
"अगर उस रात मैंने उसे सुना होता," उन्होंने कहा, "तो शायद मैं वो अंगूठा नहीं लगाता।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनका जवाब बनता नहीं। उन्हें बस सुना जाता है।
पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"कल," उन्होंने कहा, "मैं मंच पर अकेले नहीं बोलूँगा।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मैं तुम्हारे पीछे खड़ा रहूँगा," मैंने कहा। "नहीं — पीछे नहीं। साथ।"
"साथ," उन्होंने कहा।
और उन्होंने मेरा कंधा दबाया।
अंधेरा गली पर उतर रहा था। पीपल के नीचे लालटेनें जल रही थीं। बच्चे पर्चियाँ चिपका रहे थे। उस्ताद अपनी दुकान का शटर उठा रहे थे — रात में भी — ताकि कल जो भी पहनना हो, सिला हुआ हो।
और तभी वो आवाज़ आई।
लाउडस्पीकर।
गली में एक लाउडस्पीकर था — स्कूल की छत पर लगा पुराना भोंपू, जिसे सिर्फ़ आपातकाल में बजाया जाता था। सालों से वो चुप था।
आज वो बजा।
पहले एक लंबी सी सीटी। फिर खड़खड़। फिर किसी ने माइक को टैप किया।
और फिर रणवीर भारद्वाज की आवाज़ आई। वही आवाज़ जो टीवी पर कंबल बाँटते वक़्त निकलती है — नरम, भरोसेमंद, थोड़ी धीमी, जैसे कोई बड़ा भाई रात में सबको सुलाने आया हो।
"मेरे प्यारे बस्ती वालो," उसने कहा।
मेरा हाथ घंटी पर कस गया।
"कल शाम सात बजे," उसने कहा, "नूर अस्पताल के मैदान में एक छोटी सी बैठक है। मैं आप सबको बुला रहा हूँ। आप सबके सवाल हैं, मेरे जवाब हैं। और आप सब जानते हैं कि मैंने आज तक किसी से मुँह नहीं छिपाया।"
गली में कोई नहीं बोला।
"पर एक छोटी सी बात साफ़ कर देना चाहता हूँ," उसने कहा। "क्योंकि कल मैदान में मैं नहीं चाहता कि कोई कहे कि मैंने कुछ छिपाया।"
उसने एक पल रुककर साँस ली। माइक में वो साँस सुनाई दी।
"कल मैदान में सिर्फ़ दो कुर्सियाँ होंगी," उसने कहा। "एक मेरी। और एक — शंकर यादव की।"
गली में सन्नाटा।
मेरे पीछे किसी ने साँस रोक ली।
"क्योंकि काग़ज़ शंकर यादव के नाम पर हैं," रणवीर ने कहा, "और काग़ज़ का जवाब काग़ज़ वाला ही देगा।"
फिर उसने एक पल रुका।
"और अंकुश यादव के लिए," उसने कहा, "मंच पर कोई जगह नहीं होगी।"
लाउडस्पीकर में एक क्लिक हुई और आवाज़ बंद हो गई।
गली में सिर्फ़ पीपल की पत्तियों की आवाज़ बची।
मैं खड़ा रहा।
मेरी जेब में घंटी थी — और वो ठंडी थी।
काजल मेरी तरफ़ देख रही थी। माँ चूल्हे के पास खड़ी थीं, हाथ में चिमटा। उस्ताद अपनी दुकान के दरवाज़े पर। शबनम आपा केतली लिए। बच्चे पर्चियाँ हाथ में लिए।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा मुस्कुराए।
"अच्छा किया," उन्होंने कहा। "अब साफ़ हो गया कि वो किससे डरता है।"
"किससे?"
"उससे," पापा ने कहा, और मेरी तरफ़ देखा, "जिसे वो मंच पर बैठने ही नहीं दे रहा।"
मैंने घंटी को जेब से निकाला और एक बार बजाया।
घंटी ने कहा —
"जो मंच पर जगह नहीं देता, वो अपनी जगह खुद खोद रहा है।"
मैं हँसा।
और मैंने धीरे से कहा, "ठीक है। तो कल हम मंच पर नहीं बैठेंगे।"
काजल ने पूछा, "तो कहाँ?"
"मैदान में," मैंने कहा। "कुर्सी नहीं चाहिए। जब पूरी गली खड़ी होगी, तो एक कुर्सी कम होने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा।"
माँ ने चिमटा चूल्हे पर रखा।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "तो कल सबसे पहले पूरी गली को खाना खिलाऊँगी। भूखे आदमी का सच भी अधूरा निकलता है।"
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