The Mysterious Bell – Chapter 1371
"मैं…" उनका गला रुंध गया। "मैं कल आने वाला था। पर आज आ गया।"
पापा ने उनकी तरफ़ एक क़दम बढ़ाया।
"यहाँ मत खड़े रहो," पापा ने कहा।
गोविंद भाई का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"अंदर चलो," पापा ने कहा। "सब देख रहे हैं।"
और फिर जो हुआ, वो मैंने देखा और मेरा दिल कहीं गिर गया।
पापा ने गोविंद भाई की बाँह नहीं पकड़ी। उन्होंने उनका हाथ नहीं थामा। वो बस उनके आगे से चले, इतनी धीमी चाल से जैसे कह रहे हों — मेरे पीछे आ।
और गोविंद भाई उनके पीछे चले।
अस्पताल के गेट के बगल में एक छोटी सी जगह थी। बेंच नहीं थी। दीवार के सहारे एक पुरानी पटिया पड़ी थी, और उसके ऊपर पीपल की छाया थी। पापा वहीं बैठ गए। गोविंद भाई उनके सामने खड़े रहे, फिर धीरे से बैठ गए, जैसे कोई बूढ़ा आदमी बैठता है — पहले घुटना, फिर कमर, फिर साँस।
मैं दूर खड़ा था।
मीरा मेरे पास आई और उसने कैमरा थोड़ा नीचे किया।
"सुनना है?" उसने धीरे से पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "देखना है।"
और मैंने देखा।
मैंने देखा कि पापा एक बात कहते हैं और गोविंद भाई सिर हिलाते हैं। मैंने देखा कि गोविंद भाई अपनी बही खोलते हैं, कुछ पन्ने पलटते हैं, और फिर वो एक पन्ना पापा की तरफ़ बढ़ाते हैं। मैंने देखा कि पापा उस पन्ने को देखते हैं और उनका हाथ एक बार काँपता है।
फिर मैंने देखा कि दोनों के कंधे झुक जाते हैं।
एक साथ।
जैसे किसी ने एक ही वक़्त में दोनों के सिर पर हाथ रखकर दबा दिया हो।
और फिर गोविंद भाई ने अपना चश्मा उतारा — टेप वाला चश्मा — और उन्होंने अपनी आँखें पोंछीं। पर वो आँखें भर आई थीं, और चश्मा उतारने से कुछ नहीं छिपा। उनके कंधे हिल रहे थे।
पापा ने उनके कंधे पर हाथ रखा।
कुछ नहीं कहा। बस हाथ रखा।
मैं वहीं खड़ा रहा।
काजल मेरे पास आई और उसने मेरी बाँह पकड़ ली।
"पापा रो रहे हैं," उसने धीरे से कहा।
"नहीं रो रहे," मैंने कहा। "हो सकता है। पता नहीं।"
"तू क्यों रो रहा है?"
"धूल है," मैंने कहा। "आँख में चली गई।"
काजल ने कुछ नहीं कहा। उसने बस मेरी बाँह और कस ली।
कुछ देर बाद पापा उठे।
वो गोविंद भाई को वहीं बैठा छोड़कर आए, और गोविंद भाई वहीं बैठे रहे, बही गोद में रखी हुई, जैसे कोई बच्चा स्कूल के बाहर अपने फ़ैसले का इंतज़ार करता है।
पापा मेरे पास आए।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, पर आवाज़ साफ़ थी।
"कल मैदान में," पापा ने कहा, "दो आदमी अपनी गलती बोलेंगे।"
मैंने पूछा, "दो?"
"एक मैं," पापा ने कहा।
और मैंने गोविंद भाई की तरफ़ देखा, जो दीवार के सहारे बैठे थे, हाथ जोड़े हुए, जैसे कोई अपनी ही दुआ का जवाब सुन रहा हो।
"और वो," पापा ने कहा।
फिर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा — बस एक पल के लिए — और आगे बढ़ गए।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरी जेब में घंटी अभी भी ठंडी थी। मैंने उसे निकाला और हथेली में रखा।
और मैंने धीरे से कहा, "सुन रही है?"
घंटी ने कुछ नहीं कहा। बस एक बार हल्की सी बजी — जैसे कोई सोते हुए हाँ कह दे।
तभी मेरे कंधे पर एक हाथ पड़ा।
शालिनी।
उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ काग़ज़ था, जिस पर अदालत की मुहर लगी थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"तुम्हारी जमानत," उसने कहा। "अदालत से।"
"जमानत?" मैं हँसा। "मैं तो कैदी था ही नहीं। दरोगा ने खुद कहा था कि कोई गिरफ़्तारी का काग़ज़ ही नहीं आया।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में वो चमक थी जो वकीलों की आँखों में तब आती है जब उन्हें अपनी ही चाल पर हँसी आती है।
"मुझे पता है," उसने कहा। "पर मुझे ये काग़ज़ चाहिए था। क्योंकि अब काग़ज़ पर लिखा है कि तुम इस शहर के एक मुक़दमे के गवाह हो। और गवाह को कोई रोक नहीं सकता। न दरोगा, न साहब, न कोई।"
मैंने वो काग़ज़ पढ़ा।
दुबे अंकल पीछे से आए, अपनी छड़ी की टिक-टिक के साथ। उन्होंने काग़ज़ पर नज़र डाली और फिर मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराए।
"अब कैदी नहीं," उन्होंने कहा, "गवाह बाहर निकलेगा।"
और फिर वो पलटे और थाने की तरफ़ देखा, जहाँ दरोगा खड़े थे, अपने दो सिपाहियों के साथ, हाथ पीछे बाँधे।
दुबे अंकल की आवाज़ ऊँची नहीं थी। बस इतनी थी कि उन तक पहुँच जाए।
"दरोगा जी," उन्होंने कहा, "ये लड़का अब गवाह है। आपके थाने का। आप इसे कभी भी बुला सकते हैं। और ये कभी भी आपको बुला सकता है। बराबरी का हिसाब है।"
दरोगा ने मुँह दूसरी तरफ़ फेर लिया।
बस इतना ही। कोई जवाब नहीं। कोई धमकी नहीं। बस मुँह फेर लिया — और उस एक हरकत में उनकी पूरी हार थी।
मीरा ने मेरे कान में कहा, "मैंने ये नहीं रिकॉर्ड किया।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये सबूत नहीं है," उसने कहा। "ये सिर्फ़ एक आदमी का मुँह फेरना है। और मुझे लगता है कि ये आज का सबसे बड़ा सबूत है, और इसे मैं अपनी आँखों में रखूँगी, कैमरे में नहीं।"
हम पीपल की तरफ़ चले।
गली में आज कुछ अलग था।
आम दिन होता तो शाम को लोग घर जाते, चूल्हे जलते, बच्चे पढ़ने बैठते। पर आज कोई घर नहीं जा रहा था। आज गली ऐसे जाग रही थी जैसे कोई बीमार आदमी बहुत दिनों बाद बिस्तर से उठा हो — धीरे-धीरे, झिझकते हुए, पर उठा ज़रूर हो।
पीपल के नीचे शबनम आपा ने दो बड़ी केतलियाँ रख दी थीं। गुमटी बंद थी — पर चाय बंद नहीं थी। वो एक लंबी लकड़ी की बेंच पर कुल्हड़ों की कतार लगा रही थीं।
"सुनो सब," उन्होंने कहा, गले में उतनी ही तेज़ी के साथ जितनी पहले धमकी में थी। "कल का दिन आज से शुरू हो गया है। आज रात जो चाय पीएगा, वो कल सच बोलेगा। जो नहीं पीएगा, वो भी बोलेगा — पर मुझसे बात नहीं करेगा।"
भीड़ में हँसी फैल गई।
रमेश भाई ने अपना कुल्हड़ उठाया। "आपा, आज दूध कम है।"
"दूध कम है क्योंकि सच ज़्यादा है," शबनम आपा ने कहा। "कल के बाद दूध बढ़ा दूँगी।"
उस्ताद पुरानी सीढ़ी पर बैठे थे। वो सीढ़ी उनकी दुकान की थी — लकड़ी की, तीन पायों पर खड़ी, जिस पर चढ़कर पहले उनके पिता कपड़े टाँगते थे। उन्होंने उसे पीपल के नीचे रखवाया और उस पर बैठ गए, जैसे कोई बादशाह अपने ही शहर में लौटकर आया हो।
"एक बात सब सुन लें," उस्ताद ने कहा।
भीड़ चुप हो गई। उस्ताद की आवाज़ कम थी पर उसमें वो बात थी जो सत्तर साल की सिलाई सिखाती है — धागा टूट भी जाए तो आवाज़ नहीं टूटती।
"कल मैदान में झगड़ा नहीं होगा," उन्होंने कहा। "मैं बूढ़ा हूँ, मुझे पता है कि झगड़ा कैसे शुरू होता है। एक आदमी ऊँची आवाज़ में बोलता है, दूसरा उससे ऊँची में, और तीसरा अपनी जेब टटोलने लगता है। आज हमारे पास एक ही चीज़ है — सच। और सच को आवाज़ नहीं चाहिए। सच को बस एक बार बोलना पड़ता है।"
वो रुके।
"कल जो बोलेगा," उन्होंने कहा, "वो अपनी गलती बोलेगा। किसी दूसरे की नहीं। और जो दूसरे की गलती बोलेगा, उसका नाम मैं अपनी कॉपी में लिख लूँगा। और मेरी कॉपी पचास साल से कोई नहीं पढ़ पाया है।"
भीड़ हँसी।
और उस हँसी में कुछ ऐसा था जो बहुत दिनों से गली में नहीं था।
बच्चों की टोली तभी आई। सानिया सबसे आगे, हाथ में पर्चियों का बंडल। गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू पीछे। टिंकू सबके पीछे, मुँह पर वो गंभीर भाव जो बड़े काम से पहले आता है।
"पर्ची लो! पर्ची लो!" सानिया चिल्लाई।
मैंने एक पर्ची ली।
उस पर बच्चों की लिखाई में लिखा था — "कल मैदान में सच बोलेंगे। झूठ बोलने वाला अपना ही नाम भूल जाएगा।"
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