The Mysterious Bell – Chapter 1370
"तू ख़तरनाक है," उसने कहा।
"मैं पत्रकार हूँ," मीरा ने कहा।
"वही कह रही हूँ।"
मैंने घंटी जेब से निकाली।
पीतल पर धूल थी। मैंने उसे आस्तीन से पोंछा। वो ठंडी थी।
"सुन," मैंने धीरे से कहा। "मुझे बता, चार बजे क्या होगा?"
कुछ नहीं।
"बता।"
घंटी ने कहा, बहुत छोटा — "दरवाज़ा।"
"कौन सा दरवाज़ा?"
"जो बंद नहीं था।"
मैंने शालिनी की तरफ़ देखा।
"दुकान का पिछला दरवाज़ा," मैंने कहा।
"क्या?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "बस थोड़ी देर के लिए मुझे एक काम याद आया।"
मैंने काजल को इशारा किया। वो पास आई।
"क्या है?"
"जब मैं न हों, तू कॉपी और पन्ना दोनों अपने पास रख," मैंने कहा। "और किसी को मत देना। माँ को भी नहीं। पापा को भी नहीं।"
"पापा को भी नहीं?" काजल ने हैरानी से कहा।
"पापा को भी नहीं," मैंने कहा। "क्योंकि अगर उनके पास पन्ना है और वो कहीं गए, तो वो पन्ना कभी भी फिर से बदला जा सकता है। अब पन्ना दो हिस्सों में रहेगा — एक उनके पास, एक तेरे पास।"
"और तू कहाँ जा रहा है?"
मैंने अपने हाथ देखे। उन पर ग्रीस थी, धूल थी, और उस पन्ने की लाल स्याही का हल्का सा निशान।
"दुकान," मैंने कहा। "पीछे का कमरा।"
"अंकुश—"
"काजल," मैंने कहा, "जो उस कमरे तक पहुँच सकता है, वो यहीं हमारे बीच है। और मुझे पता करना है कि कौन। क्योंकि आज रात सात बजे मैदान में हम सब खड़े होंगे, और मैं नहीं चाहता कि हमारे बीच कोई ऐसा हो जो हमारे पीछे काग़ज़ बदलता रहे।"
काजल ने मेरी बाँह छोड़ दी।
"जा," वो बोली। "पर टिंकू को साथ ले जा।"
"टिंकू?"
"वो छोटा है," काजल ने कहा। "लोग उसके सामने बात कर लेते हैं। उसे कोई ख़तरा नहीं समझता।"
मैं हँसा।
"तू मेरी बहन है," मैंने कहा। "पता नहीं कब बड़ी हो गई।"
"तू दुकानदार है," उसने कहा। "पता नहीं कब समझदार होगा।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो माँ के पास खड़े थे, दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए।
फिर पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उन्होंने पॉकेट से पन्ना निकाला। एक बार खोला। एक बार देखा। फिर मुझे इशारा किया — "आ जा।"
मैं गया।
उन्होंने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पढ़," उन्होंने कहा। "नहीं, इसे ध्यान से देख।"
मैंने देखा।
उन्होंने नीचे की रसीद पर उँगली रखी।
"ये रसीद," उन्होंने कहा, "मेरी पुरानी दुकान की गिरवी की रसीद नहीं है। ये किसी और काग़ज़ का किनारा है।"
मैंने ध्यान से देखा।
तब मुझे दिखा। रसीद के ऊपरी कोने पर एक छोटी सी लकीर थी — दो सीधी लकीरें और बीच में एक बिंदु।
वो निशान।
वही निशान।
चूल्हे के पीछे के दरवाज़े पर, घंटी के छल्ले पर, पीपल के नीचे, दीवार पर, रणवीर के ताबीज़ पर।
मेरी साँस रुक गई।
"ये निशान," मैंने कहा, "ये तो—"
"हाँ," पापा ने कहा। "इसे जो बनाता है, वो हमारे बीच ही है। और वो काग़ज़ जो तेरे पास था, वो उसी ने लिया।"
"पर कौन?"
पापा ने पन्ना समेटा। उन्होंने उसे पॉकेट में रखा। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बोले —
"पूर्णिमा से पहले मुझे उस आदमी से मिलना है जिसने बाईस साल पहले मेरा अंगूठा लिया था।"
मैंने कहा, "वो—"
"वो अभी बाहर खड़ा है," पापा ने कहा।
और उन्होंने अस्पताल के गेट की तरफ़ सिर हिलाया।
मैं पलटा।
भीड़ थी। धूल थी। साइकिलें थीं। कुत्ते थे।
और उस भीड़ के किनारे, अस्पताल के पुराने पीले बोर्ड के नीचे, एक आदमी खड़ा था।
सफ़ेद कुर्ता।
चमकते जूते।
हाथ जोड़े हुए।
और चेहरे पर वो मुस्कान — जो कोई बड़ा भाई देता है जब वो जानता है कि छोटे भाई को कुछ पता नहीं।
मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
और उसने एक बार बजकर कहा —
"अब दो बातें बाक़ी हैं।"
मैंने हाथ जेब पर रखा और घंटी को दबा दिया।
"तीन," मैंने धीरे से कहा। "क्योंकि तीसरी बात मेरी है।"
पापा ने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"चल," उन्होंने कहा।
और हम चले।
गेट की तरफ़। भीड़ के बीच से। माँ के पीछे। काजल के पीछे। उस्ताद के पीछे। दुबे अंकल की छड़ी की टिक-टिक साथ चल रही थी, जैसे पूरी गली की नब्ज़ गिन रही हो।
और सात बजे वाला मैदान दूर नहीं था।
बस अब बीच में एक छोटी सी शाम थी — और उस शाम में एक आदमी खड़ा था, जिसे लगता था कि काग़ज़ सिर्फ़ उसकी जेब से बोलते हैं।
मैं उसकी तरफ़ जा रहा था।
और इस बार मैं अकेला नहीं था।
॥
सफ़ेद कुर्ते वाले आदमी ने हाथ जोड़े हुए थे और मुस्कुरा रहा था। मैं उसकी तरफ़ बढ़ रहा था और मेरे पीछे पूरी गली थी — माँ, काजल, उस्ताद, दुबे अंकल, शालिनी, मीरा, बबलू। भीड़ मेरे पीछे ऐसे चल रही थी जैसे कोई नदी बह रही हो, और मैं उस नदी के आगे एक छोटी सी लकड़ी था।
मैं उसके पास पहुँचा तो उसने हाथ नीचे किए।
"अंकुश यादव," उसने कहा। आवाज़ मीठी थी, जैसे चाय में गुड़ घोला गया हो। "तुमने सोचा होगा कि मैं भाग जाऊँगा।"
"नहीं सोचा," मैंने कहा। "जो आदमी इतने चमकते जूते पहनकर आता है, वो भागता नहीं। वो चलता है — धीरे-धीरे, ताकि सब देखें।"
वो हँसा।
और उस हँसी में कुछ ऐसा था जो मुझे जाना-पहचाना लगा। जैसे मैंने ये हँसी कहीं सुनी है। बहुत पहले। किसी पुरानी परत में।
"मैं तुमसे नहीं आया," उसने कहा। "मैं तुम्हारे पापा से आया हूँ।"
मेरे पीछे पापा के क़दम रुक गए।
मैं पलटा। पापा वहीं खड़े थे, और उनका चेहरा वैसा था जैसा मैंने कभी नहीं देखा। डर नहीं था उस चेहरे पर। गुस्सा भी नहीं। कुछ और था — जैसे कोई आदमी बाईस साल बाद अपने ही घर के दरवाज़े पर खड़ा हो और ताला देख रहा हो, और उसे पता हो कि चाबी उसकी ही जेब में है।
"शंकर भाई," सफ़ेद कुर्ते वाले ने कहा।
पापा ने कुछ नहीं कहा।
"कल मैदान में," उस आदमी ने कहा, "मैं भी आऊँगा। और मैं भी बोलूँगा।"
"तुम क्या बोलोगे?" मैंने पूछा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी कमीज़ की जेब पर हाथ रखा — जैसे कोई चीज़ टटोल रहा हो — और फिर हाथ नीचे कर दिया।
"जो मेरे हिसाब में लिखा है," उसने कहा।
और वो मुड़ा।
नीम के पेड़ के पीछे से होकर वो चला गया, और भीड़ ने उसे ऐसे निगल लिया जैसे पानी में पत्थर गिरता है — एक आवाज़, फिर कुछ नहीं।
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा अभी भी उसी जगह देख रहे थे जहाँ वो आदमी खड़ा था। फिर उन्होंने अपनी आँखें मींचीं और धीरे से कुछ कहा जो मैं सुन नहीं पाया।
और तभी —
"शंकर भाई।"
आवाज़ पीछे से आई। काँपती हुई। धीमी। ऐसी आवाज़ जो बोलने से पहले तीन बार सोचती है।
मैं पलटा।
अस्पताल की पुरानी पीली दीवार के सहारे एक आदमी खड़ा था।
पतला शरीर। सफ़ेद कुर्ता, पर वो सफ़ेद नहीं रहा था — किनारों से पीला पड़ गया था, और जेब के पास स्याही का एक पुराना धब्बा था। चश्मा नाक पर फिसला हुआ, कान पर टेप लिपटा हुआ। हाथों में एक मोटी काली बही, सीने से चिपकाई हुई। और आँखों में — आँखों में वो डर था जो सिर्फ़ उस आदमी की आँखों में होता है जिसने बाईस साल तक रोज़ एक ही गुनाह ढोया हो और रोज़ शाम को सोचा हो कि आज कोई आकर पूछेगा।
गोविंद भाई।
पापा रुक गए।
वो पल — मैं उसे कभी नहीं भूलूँगा। पापा और गोविंद भाई, दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे, और बीच में बाईस साल की चुप्पी खड़ी थी, जो किसी इंसान से छोटी नहीं होती।
गोविंद भाई ने बही को और कसकर पकड़ लिया।
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