The Mysterious Bell – Chapter 1369
"अब सुनो सब," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जो तीस साल की वर्दी के बाद बचती है — आदेश नहीं, भरोसा। "ये काग़ज़ अदालत में नहीं जाएगा।"
शालिनी ने मुँह खोला।
"दुबे अंकल—"
"सुन लो, बेटी," उन्होंने कहा। "तुमने कोर्ट का काग़ज़ लाकर आज मेरी नाक बचाई। तुम्हारा हक़ है बोलने का। पर ये पन्ना मैदान में जाएगा। सबके सामने। क्योंकि सच को गवाहों की ज़रूरत नहीं होती। सच को लोगों की ज़रूरत होती है।"
शालिनी ने कुछ सोचा। फिर उसने कहा, "ठीक है। पर एक शर्त।"
"बोलो।"
"इसकी एक नकल मेरे पास रहेगी," उसने कहा। "और एक थाने में जमा होगी। अगर कल सुबह ये पन्ना किसी की जेब में से गायब हो जाए, तो मैदान में मेरी नकल बोलेगी।"
दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा।
"अंकुश?"
मैंने पन्ना उठाया।
"दो नकलें," मैंने कहा। "एक शालिनी दीदी के पास। एक दुबे अंकल की नीली कॉपी में। और असली — असली पापा के पास रहेगा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"क्योंकि," मैंने कहा, "ये उनका लिखा है। इसे उन्हीं की जेब से निकलना चाहिए।"
पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन्होंने सिर्फ़ हाथ बढ़ाया। मैंने पन्ना उनके हाथ में रख दिया। उन्होंने उसे तीन बार मोड़ा, पॉकेट में रखा, और ऊपर से हाथ दबाकर देखा कि वो वहाँ है।
तभी मेरी जेब में घंटी गरम हुई।
मैंने हाथ जेब में डाला। पीतल छूते ही वो गुनगुनाई, जैसे कोई नींद से जागकर अपनी आवाज़ ढूँढ रहा हो।
फिर उसने कहा —
"हाथ यहीं है।"
मैंने आँखें खोलीं।
मैंने इधर-उधर देखा। भीड़। बच्चे। गली के लोग। मीरा का कैमरा चालू। बबलू एक तरफ़ खड़ा, घायल हाथ पर वो सफ़ेद रूमाल।
"कहाँ?" मैंने फुसफुसाकर पूछा।
घंटी ने कुछ नहीं कहा।
फिर कहा — "पापा के पीछे।"
मैंने देखा। पापा के पीछे सिर्फ़ उनकी पुरानी साइकिल थी, कमर झुकाए खड़ी, और साइकिल के हैंडल पर वो पुरानी घंटी जिसकी जीभ घूम नहीं रही थी।
कुछ नहीं।
"तू गलत बोल रही है," मैंने धीरे से कहा।
घंटी ने कहा, "एक और हाथ। वो हाथ अब तेरे पास है।" और चुप हो गई।
मैं वहीं खड़ा रह गया, सोचते हुए कि इसका मतलब क्या है। एक और हाथ का मतलब वो हाथ जिसने काग़ज़ निकाला था। और अब वो हाथ मेरे पास है? मेरे पास?
शालिनी ने मेरे कंधे को छुआ।
"अंकुश, तुझे ठीक लग रहा है?"
"हाँ," मैंने कहा। "बस एक बात समझ नहीं आई।"
"क्या?"
"ये पन्ना उस वक़्त कहाँ था, जब काजल ने इसे दुकान में रखा था?"
"ट्रंक पर," काजल ने कहा।
"और ये पापा के पास कब आया?"
पापा पलटे।
"उसने भेजा," उन्होंने कहा।
"किसने?"
"सफ़ेद कुर्ते वाला।"
मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ।
"आपके पास कौन आया? कब?"
"थोड़ी देर पहले," उन्होंने कहा। "अस्पताल के गेट पर। एक लड़का आया। उसने लिफ़ाफ़ा दिया। बिना नाम का। कहा — शंकर जी, आपका काग़ज़ आपके लायक़ नहीं, ये ले जाइए।"
"और आपने ले लिया?"
"मैंने देखा," पापा ने कहा। "लिखाई मेरी थी। तीन दिन पुरानी याद आई। मैंने सोचा — अगर ये मेरा है, तो मेरे पास रहेगा।"
"और उसने कुछ और कहा?"
पापा ने सोचा। फिर उन्होंने कहा, "उसने कहा — आपका बेटा चार बजे ग़लत जगह पर खड़ा होगा।"
मैंने आँखों से पलकें झपकाईं। चार बजे। यानी अभी नहीं। अभी तो शाम होने को है।
"कहाँ?"
"नहीं बताया," पापा ने कहा। "बस इतना कहकर चला गया।"
शालिनी ने तुरंत कहा, "ये डराने का तरीक़ा है। वो चाहता है कि अंकुश चार बजे कहीं और भागे, और मैदान में वो तैयारी कर ले।"
"तो मैं नहीं भागूँगा," मैंने कहा।
"नहीं भागेगा," शालिनी ने कहा, "पर चुप भी नहीं बैठेगा।"
तभी माँ वहाँ आईं।
वो लंगड़ाकर आ रही थीं, बैसाखी के सहारे, कौशल्या का हाथ पकड़े हुए। उनके माथे पर पसीना था और आँखों में वो नज़र जो सिर्फ़ माँ की होती है — कि तुम सबने मिलकर मुझे बताया क्यों नहीं।
"शंकर," उन्होंने कहा।
पापा पलटे।
और मुझे पहली बार दिखा कि दो लोग, जो चालीस साल से एक छत के नीचे रह रहे हैं, वो एक-दूसरे को कैसे देखते हैं जब कोई काग़ज़ बीच में नहीं होता।
माँ उनके पास पहुँचीं।
"तू अकेला गया था," उन्होंने कहा।
"हाँ।"
"क्यों?"
पापा चुप रहे।
"बोल," माँ ने कहा। "या मैं अभी सबको बताऊँ कि मैंने भी अंगूठा—"
"सुशीला।"
"मत कर मुझे रोक," माँ ने कहा। "बाईस साल मैंने चुप रहकर तेरी चुप्पी को खाया। अब मेरा हिसाब साफ़ होगा, तेरे साथ।"
पापा ने उनका हाथ पकड़ा। कुछ नहीं कहे। बस पकड़ा।
और माँ रो पड़ीं। गली के बीच। सबके सामने। बिना मुँह छुपाए।
काजल उनकी तरफ़ दौड़ी। कौशल्या ने मेरी तरफ़ देखा और बोलीं, "देख लिया? अब सबकी नींद उड़ी है। यही सही है। सोए हुए लोग सच नहीं सुनते।"
और फिर जो हुआ, वो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
पापा मेरी तरफ़ आए।
वो मेरे सामने खड़े हुए। उनकी आँखें मेरी आँखों के सीध में थीं। मुझे याद नहीं आता कि हम इस तरह कभी खड़े हुए थे।
और मैंने कहा — वो बात जो दस दिन से मेरी छाती में पत्थर की तरह रखी थी।
"पापा," मैंने कहा। "आपने सब कुछ अकेले क्यों सहा?"
पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।
मैंने आवाज़ थोड़ी ऊँची की।
"मैं आपका बेटा हूँ। मेरी उम्र चौबीस साल है। मैं गली में साइकिल ठीक करता हूँ। मुझे लोग पागल कहते हैं। पर एक बात पूछो तो मैं गली के किसी भी दरवाज़े पर भरोसा कर सकता हूँ। आप अपने बेटे पर क्यों नहीं कर सके?"
पापा ने हाथ बढ़ाया।
धीरे।
और उन्होंने दोनों हाथों से मेरा सिर पकड़ा।
वो झुके। उनका माथा मेरे माथे से लगा। उनका चश्मा मेरी नाक के पुल से टकराया और मुझे गुदगुदी हुई, पर मैं हँसा नहीं।
"डर," उन्होंने धीरे से कहा, "आदमी को अकेला कर देता है।"
मेरी आँखें जलीं।
"मैंने सोचा," उन्होंने कहा, "अगर मैं बोला, तो तुझे भी डर लगेगा। तेरी माँ को भी। तेरी बहन को भी। इसलिए मैं चुप रहा। पर चुप रहने से डर नहीं मरा। डर मेरा साथी बन बैठा। मेरे साथ सोता, मेरे साथ उठता।"
उन्होंने एक लंबी साँस ली।
"अब नहीं," उन्होंने कहा। "अब मैं अकेला नहीं रहूँगा।"
और तब उन्होंने वो कहा जो मेरे भीतर की आड़ को तोड़ गया —
"मेरा बेटा मुझसे बहादुर नहीं है। मेरा बेटा मुझसे चालाक है। वो जानता है कि अकेले कुछ नहीं होता। यही मैंने उससे सीखा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा।
दो पल हम वहीं खड़े रहे।
और फिर, कमबख़्त बबलू, वो अपनी कोहनी दबाकर कहा — "भाई साहब, अगर ये भावुकता का समय न होता तो मैं कहता कि इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल ये है कि मेरी चेन कब लौटेगी।"
किसी ने हँसी नहीं रोक पाई। मैं भी नहीं।
दुबे अंकल ने अपनी छड़ी घुमाई।
"अब सुनो," उन्होंने कहा। "चार बजने वाले हैं। कोई कहीं नहीं जाएगा।"
"पर अंकुश को—"
"अंकुश किसी के बुलाए नहीं जाएगा," दुबे अंकल ने कहा। "अंकुश यहीं रहेगा, इस भीड़ के बीच। जो उसे बुलाना चाहता है, वो यहाँ आए।"
मीरा ने अपना कैमरा थोड़ा नीचा किया और कहा, "दुबे अंकल, ये सब सीधा प्रसारण हो रहा है। मैंने अभी नहीं बताया कि पन्ना बदला गया और असली पन्ना पापा जी के पास है।"
"क्यों नहीं बताया?"
"क्योंकि," मीरा ने कहा, "अगर मैं अभी बता दूँगी, तो चार बजे वो किसी और चीज़ के लिए आएगा। और मुझे पता करना है कि चार बजे किसका नाम आता है।"
शालिनी ने उसकी तरफ़ देखा।
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