The Mysterious Bell – Chapter 1368
पर मैं मज़ाक नहीं कर सका।
क्योंकि वो पन्ना वहाँ नहीं था।
उसकी जगह, ठीक उसी जगह, एक सूखी पीली पर्ची चिपकी हुई थी। छोटी। मुड़ी हुई। और उस पर नीली मोहर।
भारद्वाज की मोहर।
मैंने उँगली से उसे छुआ। सूखी थी। गोंद पूरी तरह जम चुका था। जमने में वक़्त लगता है। दो मिनट में गोंद ऐसे नहीं जमता।
मतलब ये पर्ची वहाँ आज नहीं चिपकी थी।
मतलब ये पन्ना बदला नहीं गया था।
मतलब ये पन्ना — पहले से ही ये था।
और मैंने जो लाल स्याही वाला पन्ना अपनी आँखों से देखा था, वो सच में देखा था। शालिनी ने देखा था। काजल ने देखा था।
फिर मेरे पीछे से शालिनी की आवाज़ आई। ठंडी। बहुत ठंडी। ऐसी आवाज़ जो वकील की होती है, जब वो अपने ही दिमाग़ से डर जाता है।
"अंकुश," उसने कहा, "पन्ना गायब नहीं हुआ।"
मैं पलटा।
"क्या?"
"पन्ना गायब नहीं हुआ," उसने दोहराया। "कोई उसे निकालकर साथ ले गया है। ये कॉपी उसी वक़्त बदली गई है जब ये किसी की पहुँच में थी। और उस वक़्त ये कॉपी कहाँ थी?"
काजल ने होंठ काँपते हुए कहा, "मेरे हाथ में थी।"
"पूरे वक़्त?"
काजल ने आँखें बंद कर लीं, जैसे खुद को कोसे जा रही हो।
"नहीं," वो बोली। "एक बार मैंने इसे दुकान के पीछे रखा था। ट्रंक पर। मैंने सोचा हाथ धो लूँ, धूल बहुत थी। आधा मिनट। बस आधा मिनट।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा।
"आधा मिनट काफ़ी होता है," उसने कहा। "और ये काम वही कर सकता है जो दुकान के पीछे वाले कमरे तक पहुँच सकता है। जो उस कमरे में आ जा सकता है बिना किसी को अजीब लगे। जो वहाँ का रास्ता जानता है।"
मेरे मुँह से निकला, "पर उस वक़्त वहाँ कौन था?"
शालिनी ने कुछ नहीं कहा।
उस्ताद ने कहा, "जो वहाँ था, वो अब यहाँ नहीं है। इसीलिए समय बदला है।"
मैंने घंटी को जेब में महसूस किया। वो ठंडी थी। पूरी तरह ठंडी। जैसे वो भी सोच रही हो।
तभी दूर, गली के मुँह से, एक आवाज़ आई।
साइकिल की घंटी।
पुरानी घंटी। मेरी घंटी नहीं। मेरे बाप की साइकिल की।
और सब पलट गए।
वो आ रहे थे।
पापा।
पुरानी साइकिल पर। कमर झुकी हुई। कंधों पर धूल की पतली परत। वही घिसी नीली शर्ट। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ। और साइकिल चला रहे थे ऐसे जैसे बहुत दिनों बाद चला रहे हों — धीरे, सँभलकर, हर पैडल पर यक़ीन करते हुए।
भीड़ हटती गई। कोई बोला नहीं। किसी ने सवाल नहीं पूछा। ऐसा लगा जैसे पूरी गली को पता था कि इस वक़्त इस आदमी के आगे चुप रहना है।
उन्होंने साइकिल रोकी। पैर ज़मीन पर रखा। साइकिल से उतरे भी नहीं, पहले मेरी तरफ़ देखा।
और मुझे लगा — आज उनकी आँखों में कुछ है जो पहले नहीं था। डर नहीं था। थकान नहीं थी।
सिर्फ़ साफ़-साफ़ एक बात थी, जैसे कोई काग़ज़ मेज़ पर रख दिया गया हो।
उन्होंने साइकिल का हैंडल पकड़ा और उतरे। पॉकेट से हाथ निकाला। हथेली में एक पन्ना था — लाल स्याही वाला, मुड़ा हुआ — और उसी हाथ की उँगली में एक पुरानी चाबी लटकी हुई थी, पीली पड़ चुकी रस्सी में बँधी।
वो मेरे पास आए।
उन्होंने पन्ना मेरी तरफ़ बढ़ाया।
और उन्होंने एक ही वाक्य कहा, छोटा, धीमा, पर पूरी गली के लिए काफ़ी।
"ये तेरा है।"
मैंने पन्ना लिया।
मेरे हाथ फिर काँपे, पर इस बार डर से नहीं। इस बार कुछ और था। जैसे मेरे हाथ को पता था कि ये काग़ज़ मेरे बाप ने अपने हाथ से मेरे हाथ में दिया है, और ये हाथ आज पहली बार किसी चीज़ से डरे नहीं हैं।
मैंने पन्ना खोला।
शालिनी मेरे कंधे के ऊपर से देख रही थी। उस्ताद मेरे पास आए, काँपते हाथों से मोटा चश्मा ठीक किया। दुबे अंकल ने अपनी छड़ी ज़मीन पर टिका दी और वहीं झुककर खड़े हो गए, जैसे बैठे होते.
काजल ने मेरी बाँह पकड़ी।
माँ दूर थीं। पर मैं उन्हें जानता हूँ — वो इस वक़्त भी सब सुन रही होंगी, गिन रही होंगी।
पन्ने पर पापा की लिखाई थी। वही टेढ़ी-मेढ़ी, हर अक्षर अलग लड़ाई लड़ता हुआ।
और वो लिखा हुआ था —
"मैं शंकर यादव, बाईस साल पहले डर के मारे अंगूठा लगाया था। उस दिन की सच्ची बात मैं पूर्णिमा के मैदान में सबके सामने बोलूँगा। कोई काग़ज़ मुझसे पहले नहीं बोलेगा।"
मैंने आवाज़ से पढ़ा। पूरी गली सुन रही थी।
उसके नीचे, छोटी, पुरानी, पीली किनारी वाली एक रसीद चिपकी हुई थी। स्याही उतरी हुई। मोहर घिसी हुई। पर पढ़ी जा सकती थी।
रसीद पर लिखा था — ये काग़ज़ सिर्फ़ रणवीर के कहने पर बोलेगा।
मैंने पढ़ा और मेरे मुँह का स्वाद कड़वा हो गया।
शालिनी ने पन्ना आगे खींच लिया। उसने नीचे की रसीद को नाखून से कुरेदा, फिर कान के पास उठाकर सूँघा और कहा, "ये गोंद आज का नहीं है।"
उस्ताद ने आगे बढ़कर पन्ना अपने हाथ में लिया, रसीद वाली जगह पर मुँह ले जाकर सूँघा, और एक पल आँखें बंद करके बोले, "स्याही दो दिन पुरानी लगती है। रसीद पचास साल पुरानी नहीं है। इसका किनारा कटा है और किनारे से जितना काग़ज़ चिपका है, वो ज़्यादा टूटा है, जबकि ऊपर पन्ना पुराना है।"
"मतलब?" काजल ने कहा।
"मतलब," उस्ताद ने कहा, "ये लाइन — 'सिर्फ़ रणवीर के कहने पर बोलेगा' — इसे बाद में उस रसीद पर लिखा गया। और रसीद उस वक़्त चिपकाई गई जब पापा जी इस पन्ने को अपने पास रखे हुए थे।"
काजल बोली, "पर ये रसीद… ये असली है?"
"असली है," उस्ताद ने कहा। "पर इसे बोलने वाला नया है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
वो वहीं खड़े थे। चुप। हाथ जेब में।
मैंने कहा, "पापा।"
उन्होंने देखा।
"ये पन्ना आपने कहाँ से लिया?"
"उसकी मेज़ से," उन्होंने कहा।
"अभी?"
"अभी नहीं। दोपहर।"
"दोपहर?"
"मैं उसके पास गया था," उन्होंने कहा। बस इतना कहा और रुक गए। तीन शब्द, और उन तीन शब्दों ने मेरी छाती में कुछ ऐसा हिलाया जो बहुत दिनों से स्थिर खड़ा था।
"बताने," उन्होंने आगे कहा। "कि अब मैं चुप नहीं रहूँगा।"
काजल की साँस फूली।
पापा ने उसकी तरफ़ देखकर आगे कहा, "तू उस दिन देखकर आई थी। छुपाया। मुझे पता था।"
काजल के हाथ से कॉपी लगभग छूट गई।
"पापा—"
"रहने दे," उन्होंने कहा। "अब बातें बाक़ी हैं।"
वो मेरी तरफ़ पलटे।
"बैठो, उसने कुर्सी दी।" उनकी आवाज़ सपाट थी। "चाय दी। मैंने नहीं पी।" एक पल रुके। "डर दिया। मैंने वो भी नहीं लिया।"
पूरी गली में सिर्फ़ एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ आई, बहुत दूर से।
"मैंने उससे कहा," पापा ने कहा, "मेरा अंगूठा काग़ज़ पर है। मैं मिटा नहीं सकता। पर अब मैं उसे छुपाऊँगा भी नहीं। मैं खुद बोलूँगा।"
"और उसने क्या कहा?" मैंने पूछा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा चमका जो मैंने कभी नहीं देखा था। ऐसा नहीं जैसे मज़ाक। ऐसा नहीं जैसे गुस्सा। ऐसा जैसे कोई आदमी बाईस साल बाद अपनी ही आवाज़ सुन रहा हो।
"उसने कहा," पापा ने धीरे से कहा, "शंकर भाई, आपका बेटा आपसे ज़्यादा समझदार है। आप अकेले कुछ नहीं कर सकते।"
मैं हँस पड़ा। बिना सोचे। ज़ोर से। एक ऐसी हँसी जिसमें मज़ाक कम और कुछ और ज़्यादा था।
"और आपने क्या कहा?" मैंने पूछा।
"मैंने कहा," उन्होंने कहा, "मेरा बेटा अकेले कुछ नहीं करता। वो गली को साथ लाता है। मैं भी अब साथ लाऊँगा।"
दुबे अंकल ने छड़ी उठाकर ज़मीन पर दो बार टिक-टिक की।
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