The Mysterious Bell – Chapter 1364
"पी ले।" उनकी आवाज़ में वो कड़क थी जो सिर्फ़ उनके पास थी। "जो आदमी खाली पेट लड़ता है, वो अपनी ही आवाज़ हार जाता है।"
मैंने कटोरी पकड़ी और एक साँस में पी गई। चाय गरम थी, और उसमें अदरक इतनी थी कि आँखों में पानी आ गया। पर जब तक मैंने कटोरी नीचे रखी, मेरे हाथ काँपना बंद हो गए थे।
चारों जासूस चबूतरी के पास इकट्ठे थे — सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी, जिसमें वो ट्रकों की तारीख़, वक़्त और शक्ल लिखती थी। उसने कॉपी खोली और सीधे मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"देखो," उसने कहा। "तीन ट्रक। एक बजकर चालीस मिनट पर पहला, दो बजे दूसरा, दो बजकर बीस मिनट पर तीसरा। तीनों पीछे वाले रास्ते से गए। और तीनों पर वही नीली मोहर थी — भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।"
"और बोरियाँ?" मैंने पूछा।
"बोरियाँ उतारकर वो लौट गए," उसने कहा। "पर एक आदमी वहीं रुका हुआ है। मैंने उसे दूर से देखा — सफ़ेद कमीज़, हाथ में फीता। वो नाप रहा था।"
गुड्डू ने कहा, "और एक आदमी रोटी खा रहा था। मैंने देखा।"
रफ़ीक़ ने उसकी तरफ़ देखा। "ये क्या बात हुई?"
"मतलब — वो वहीं रुकने वाला है," गुड्डू ने कहा। "जो रोटी खाता है, वो जल्दी नहीं जाता।"
मुझे हँसी आई। बिना वजह। पर उस वक़्त हँसी भी ज़रूरी थी, वरना डर सबको निगल जाता।
तभी मीरा की आवाज़ आई — तेज़, साफ़, और उस लय में जो सिर्फ़ सीधे प्रसारण में आती है।
"भाइयों और बहनों, मैं मीरा तिवारी बोल रही हूँ, बस्ती की आवाज़ से। जो मैं अभी बता रही हूँ, वो अफवाह नहीं है। नूर अस्पताल की ज़मीन का मूल काग़ज़ — जिस पर सात अंगूठे हैं और जिस पर लिखा है कि यह ज़मीन बिक नहीं सकती — वो आज शाम सात बजे सबके सामने खुलेगा। और उसकी नकल चार जगह है। एक जगह जल गई तो तीन बची रहेंगी।"
भीड़ में हलचल हुई।
"पर एक बात," मीरा ने कहा, "कुछ लोग चाहते हैं कि ये काग़ज़ कभी न खुले। उन्होंने आज दोपहर से ही तैयारी शुरू कर दी है। अस्पताल के पीछे सीमेंट की बोरियाँ रखी गई हैं — ताज़ा बोरियाँ, ऊपर धूल भी नहीं जमी। और उनके नीचे क्या है, ये मैं नहीं जानती। पर मैं इतना जानती हूँ कि जो चीज़ ज़मीन में गाड़ी जाती है, वो सच नहीं होती — वो सिर्फ़ छिपाई जाती है।"
भीड़ में से कोई चिल्लाया, "तो फिर वहाँ चलो!"
दूसरे ने कहा, "हाँ, अभी चलो!"
तीसरे ने कहा, "पहले ये बताओ कि अंकुश भैया को थाने में क्यों रोका था?"
और फिर वो हुआ जो मैंने सोचा भी नहीं था।
भीड़ थाने की तरफ़ चल पड़ी। कोई संगठित नहीं था। कोई नारा नहीं था। बस लोग चल रहे थे — चप्पलों की आवाज़, बच्चों के कदम, बूढ़ों की लाठियाँ, और शबनम आपा के हाथ में केतली। सबसे आगे दुबे अंकल थे — नीली शर्ट, सफ़ेद बाल, और हाथ में छड़ी। वो रिटायर हो चुके थे, पर उनकी चाल में अभी भी वर्दी थी।
थाने के सामने पहुँचकर दुबे अंकल रुके और उन्होंने वो किया जो कोई रिटायर सिपाही कर सकता है — उन्होंने अपनी छड़ी थाने की सीढ़ी पर टिकाई और ऊँची आवाज़ में कहा, "दरोगा जी!"
अंदर से कोई नहीं आया।
"दरोगा जी!" इस बार आवाज़ और ऊँची थी। "मैं पच्चीस साल इसी थाने में रहा हूँ, और मुझे पता है कि काग़ज़ कब पीछे रखा जाता है। अब सुन लो — अगर इस लड़के को मौके पर नहीं ले जाया गया, तो हम सब यहीं बैठ जाएँगे। यहीं, इस सीढ़ी पर। और तब तक नहीं उठेंगे जब तक सच सामने न आ जाए।"
थाने के अंदर से कुर्सी खिसकने की आवाज़ आई।
दरोगा बाहर आए। उनका चेहरा पसीने से चमक रहा था और उन्होंने अपनी कमीज़ की कॉलर ठीक की। उन्होंने भीड़ को देखा — इतनी भीड़ कि गली का पूरा रास्ता भर गया था। फिर उन्होंने मुझे देखा। फिर शालिनी को।
शालिनी बिल्कुल शांत खड़ी थी। उसके हाथ में काली फाइल थी और उसके चश्मे पर धूप पड़ रही थी, जिससे उसकी आँखें दिख नहीं रही थीं। वो अपने कंधे पर टँगा बैग भी नहीं उतार रही थी — जैसे उसे पता हो कि आज का दिन लंबा होगा।
"वकील साहिबा," दरोगा ने कहा, आवाज़ में वो मिठास जिससे मुझे हमेशा उल्टी आती है, "आपने जो काग़ज़ दिखाया था, वो —"
"वो क्या?" शालिनी ने कहा।
"वो — वो कानूनी तौर पर —"
"दरोगा जी," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ उस आदमी में आती है जिसने बहुत दिनों तक इंतज़ार किया हो, "मैं सुबह से यही सोच रही थी कि कोई कानून के बारे में पूछेगा। किसी ने नहीं पूछा। आपने नहीं पूछा। मंच वालों ने नहीं पूछा। अब देखिए —"
उसने फाइल खोली और उसमें से एक काग़ज़ निकाला।
"ये डॉक्टर निहाल इसरानी की लिखित शिकायत है। इसमें लिखा है कि नूर अस्पताल की नींव का पत्थर — जिसमें सार्वजनिक हित का काग़ज़ रखा है — उसे बिना किसी आदेश के तोड़ने की तैयारी हो रही है। और इसी शिकायत पर, ज़िला अदालत ने आज सुबह मौका-मुआयना का आदेश दिया है।"
दरोगा ने काग़ज़ पकड़ा और पढ़ा।
उनका चेहरा बदला।
"ये — ये आदेश —"
"ये आदेश है," शालिनी ने कहा। "और आदेश के साथ एक बात भी है। अगर मौके पर यह पाया गया कि पत्थर तोड़ा गया है या काग़ज़ गायब है, तो प्राथमिकी उन लोगों पर दर्ज होगी जिनके नाम उस ज़मीन के काग़ज़ पर हैं। और मुझे लगता है, दरोगा जी, उनमें एक नाम आप भी जानते हैं।"
भीड़ में से किसी ने कहा, "वाह!"
ये शब्द किसने कहा, पता नहीं। पर उस वक़्त वो शब्द गली की सबसे सच्ची आवाज़ था।
दरोगा ने एक बार अपने सिपाही की तरफ़ देखा, एक बार भीड़ की, और फिर अपनी कुर्सी की तरफ़ देखा — जैसे आख़िरी बार सोच रहे हों कि बैठ जाएँ या नहीं। फिर उन्होंने आवाज़ नीची करके कहा, "ठीक है। लेकिन एक बात — मैं अपने आदमी साथ भेजूँगा।"
"भेजिए," शालिनी ने कहा। "मैं भी साथ जाऊँगी। और एक गवाह भी चाहिए — दुबे अंकल, आप?"
दुबे अंकल ने छड़ी उठाई और कहा, "मैं तो इसी इंतज़ार में खड़ा था।"
तभी कादिर आगे आया — वही जवान सिपाही जिसने रात में मुझे झूठे काग़ज़ की चेतावनी दी थी, और जिसने सुबह दरोगा के सामने चुपचाप गर्दन हिलाकर सच की तरफ़ इशारा किया था। उसने मेरी तरफ़ देखा और बोला, "अंकुश भाई, मैं साथ चलूँगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मुझे पता है," उसने कहा, "मैं सिपाही हूँ। पर आज सिपाही होने का मतलब ये नहीं कि मैं आँख बंद करके चलूँ। मेरी बहन भी इसी गली में रहती है।"
मैंने सिर हिलाया। फिर मैंने चबूतरी की तरफ़ देखा — उस्ताद अली बक्श अब भी वहीं बैठे थे, और उन्होंने मुझे आँखों से कहा, जा। मैं जा रहा हूँ।
हम चल पड़े।
पीपल से अस्पताल के पिछले हिस्से तक का रास्ता छोटा था, पर उस दिन वो रास्ता लंबा लग रहा था। लोग पीछे-पीछे चले। शबनम आपा ने गुमटी बंद कर दी थी — चूल्हा बुझा दिया था और केतली को कपड़े में लपेटकर साथ ले आई थीं। उनका मतलब साफ़ था: आज आख़िरी चाय भी यहीं बनेगी, और वो किसी के बिना नहीं।
टिंकू मेरे बगल में चल रहा था, हाथ में वो छत की तीसरी चाबी, जिसे वो किसी को नहीं दे रहा था। उसने मुझसे कहा, "उस्ताद, अगर वहाँ कोई रोके, तो मैं क्या करूँ?"
"तू किसी से नहीं भिड़ेगा," मैंने कहा। "तू चाबी संभालेगा। और अगर कुछ गड़बड़ दिखे, तो भागेगा — पीपल तक। समझा?"
"पर —"
"सुन, टिंकू।" मैं रुका। उसकी आँखों में डर था, और उस डर के नीचे वो चीज़ थी जो उसे बार-बार आगे धकेल रही थी — कुछ साबित करने की ज़िद। "तू आज बहादुर बनने की कोशिश मत कर। तू आज सिर्फ़ ज़िंदा रहने की कोशिश कर। बहादुरी अपने आप हो जाती है, जब कोई और रास्ता न बचे।"
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