The Mysterious Bell – Chapter 1363
मैंने सिर हिलाया और बाहर निकल गया।
थाने के बाहर की हवा अलग थी। शाम हो रही थी, और धूप की रंगत सुनहरी हो चुकी थी। पीपल के पत्तों पर वो रोशनी पड़ रही थी जो दिन में नहीं होती — जैसे पेड़ खुद जल रहा हो, धीरे-धीरे।
माँ मेरे पीछे आईं।
"बेटा," उन्होंने कहा।
मैंने पलटकर देखा।
"तू जा," उन्होंने कहा। "मैं यहीं रहूँगी। कौशल्या दीदी के साथ। जब तक तू न आए, मैं इस थाने के बाहर से नहीं हटूँगी।"
"माँ —"
"मत कर बहस," उन्होंने कहा, और मुस्कुराईं। "मुझे लगता है आज मेरी बात माननी पड़ेगी।"
मैंने उनके हाथ पकड़े। उनके हाथ ठंडे थे, पर काँप नहीं रहे थे।
तभी मीरा ने अपना मोबाइल निकाला।
"अंकुश," उसने कहा। "तू जा। मैं यहाँ से शुरू करती हूँ।"
"क्या करेगी?"
"आज मैं पहली बार सीधा बोलूँगी," उसने कहा। "छिपकर नहीं। छिपे कैमरे से नहीं। सामने से।"
उसने मोबाइल को सामने उठाया। उसकी उँगली काँप रही थी, पर आवाज़ नहीं।
"ये 'बस्ती की आवाज़' है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ थाने के सामने की सड़क पर गूँजी। "आज शाम मैं ये थाने के बाहर से बोल रही हूँ। और मैं एक बात साफ़ कहना चाहती हूँ — आज शाम इस थाने से लेकर उस पुराने मैदान तक सिर्फ़ एक चीज़ चलेगी। सच।"
पीपल के नीचे खड़े लोग रुक गए।
कुछ लोगों ने अपने मोबाइल निकाले। किसी ने कुछ कहा। एक औरत ने अपने बच्चे का कंधा पकड़कर उसे आगे किया, जैसे कह रही हो — सुन ले, तेरे लिए है।
"मैं पाँच साल पहले एक ग़लती कर चुकी हूँ," मीरा ने कहा। "मैंने एक आधा सच छापा था और एक घर टूट गया था। आज मैं वो ग़लती दोहराने नहीं आई। आज मैं सिर्फ़ वही बोलूँगी जो मेरे सामने होगा। और अगर मुझसे कोई ग़लती निकले, तो मुझे रोक देना। मुझे पहचान देना। मैं भागूँगी नहीं।"
उसने मोबाइल थोड़ा ऊपर किया।
"आज शाम सात बजे, उस पुराने मैदान में, वो काग़ज़ खुलेगा जिसमें सबका हिसाब है। और जो उसे छिपाना चाहते हैं, वो चाहे जितनी मुहरें लगा लें, मैं ये बता देना चाहती हूँ — उस काग़ज़ की नकल चार जगह है। एक जगह जल गई तो तीन बची रहेंगी।"
भीड़ में फुसफुसाहट उठी।
तभी भीड़ में से कोई चिल्लाया।
"अंकुश भैया!"
मैंने पलटकर देखा।
एक लड़का दौड़ता हुआ आ रहा था। सानिया का भाई चिंटू था — सिर पर पसीना, घुटने पर नई धूल, हाथ में पुरानी रिम।
"चौक पर सब जमा हो रहे हैं!" उसने हाँफते हुए कहा। "पीपल के नीचे! लोग कह रहे हैं कि शाम को कुछ बड़ा होगा। और —"
"और क्या?"
"और भारद्वाज के आदमी!" चिंटू ने कहा। "तीन ट्रक अस्पताल के पीछे वाले रास्ते से गए हैं। सानिया ने देखा। उनके साथ हथौड़े और फावड़े हैं। वो नींव की तरफ़ जा रहे हैं!"
मेरे हाथ में घंटी अचानक गरम हो गई।
मैंने उसे जेब से निकाला, हथेली पर रखा, और उसने छोटी सी आवाज़ में कहा — "देर मत कर।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बाईस साल से बंद थी — न डर, न हिम्मत, बस एक साफ़ सवाल।
"चलें?" मैंने पूछा।
"चलें," उन्होंने कहा।
माँ ने मेरा माथा चूमा, फिर पापा की तरफ़ देखा, और कुछ नहीं कहा। उनकी चुप्पी में जो था, वो किसी शब्द से बड़ा था।
हम चले।
पीपल के नीचे से गुज़रते वक़्त मैंने देखा कि चबूतरी खाली थी — पर खाली नहीं भी थी। उस पर एक पुरानी चादर बिछी थी, और चादर पर कुछ लोग बैठे थे। उस्ताद अली बक्श उनमें से एक थे। उन्होंने मुझे देखा और सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, ताक़त बचा के रखो, आज सब खर्च होगी।
मैंने सिर हिलाया।
फिर मैंने मीरा को आवाज़ दी — "मीरा, आज सीधा प्रसारण तू कर। पर एक बात याद रखना — अगर कुछ गड़बड़ हो, तो अपनी सुरक्षा पहले। मेरा काम नहीं है कि तू मेरे लिए कुछ खो दे।"
मीरा ने मुस्कुराकर कहा, "तू भी कुछ ज़्यादा ही ड्रामा कर रहा है।"
"मैं?" मैंने कहा। "मैं तो आदमी हूँ जो साइकिल ठीक करता है। ड्रामा तो ये गली कर रही है।"
हमारे पीछे शालिनी ने अपनी कार की चाबी निकाली। "अंकुश," उसने कहा। "मैं कानून की तरफ़ से जाऊँगी। पर एक बात — अगर वो नींव का पत्थर तोड़ते हैं, तो मैं उन्हें रोक नहीं सकती। मेरे पास सिर्फ़ काग़ज़ है।"
"तो काग़ज़ से रोकिए," मैंने कहा। "आपके पास जो है, वही काफ़ी है।"
वो एक पल रुकी, फिर बोली, "तू चल। मैं पीछे से आ रही हूँ।"
मैंने घंटी को जेब में रखा और साइकिल उठाई।
"अंकुश," काजल ने पीछे से कहा।
मैंने पलटकर देखा।
"टिंकू?" मैंने पूछा।
"वो स्कूल की तरफ़ गया है," उसने कहा। "कह रहा था कि छत वाली चाबी उसके पास है और वो उसे किसी और को नहीं देगा।"
मैं हँस पड़ा — बिना वजह, बस इसलिए कि उस वक़्त हँसना ज़रूरी था।
"वो लड़का," मैंने कहा, "एक दिन मेरी दुकान से बड़ा आदमी बनेगा।"
और फिर मैं साइकिल पर बैठा और पैडल मार दिया।
पीछे से आवाज़ आई — घंटी की आवाज़, बहुत धीमी, बहुत छोटी, पर साफ़ — "अब सब मैदान में।"
॥
साइकिल की चेन चरचरा रही थी, जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ते वक़्त हाँफता है। मैंने पैडल ज़ोर से मारा। पापा पीछे बैठे थे, एक हाथ मेरे कंधे पर और दूसरे में हथौड़ा। हथौड़े का हत्था लकड़ी का था, चिकना, और उनकी मुट्ठी से चिपका हुआ — जैसे बाईस साल बाद भी वो उनका ही हो।
गली के मोड़ पर भोला भाई खड़े थे, हाथ में पेचकस। उन्होंने मुझे देखा और कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। उनकी आँखों में सवाल था — क्या तू जानता है कि तू कहाँ जा रहा है?
मैंने सिर हिलाया। नहीं, मैं नहीं जानता था। पर जाना था।
पीपल की छाया दूर से दिख रही थी। और उस छाया के नीचे भीड़। इतनी भीड़ कि गली की सारी साइकिलें, सारे रिक्शे, सारी ठेलियाँ एक तरफ़ सिमट गई थीं। लोग पत्थर की चबूतरी पर बैठे थे, कुछ खड़े थे, कुछ नीचे ज़मीन पर चटाई बिछाकर। शबनम आपा की गुमटी से धुआँ उठ रहा था — चूल्हा जल रहा था, और इतनी गर्मी में भी लोग चाय माँग रहे थे।
मैंने साइकिल रोकी।
उस्ताद अली बक्श चबूतरी के एक कोने पर बैठे थे, उनका मोटा चश्मा नाक पर फिसला हुआ, कान पर पेंसिल, और गोद में कपड़े में लिपटी कोई चीज़। उन्होंने मुझे देखा और बिना कुछ कहे अपनी बगल की जगह पर हाथ रख दिया — जैसे कह रहे हों, यहाँ बैठ, साँस ले, फिर बोल।
मैंने साइकिल खड़ी की।
"अंकुश भैया!" टिंकू दौड़कर आया। उसके हाथ में चाक का एक टुकड़ा था और गले में माँ का वही गुलाबी दुपट्टा, जो उसने गुप्तचर बनने के लिए बाँधा था। "सानिया ने कहा — अस्पताल के पीछे सीमेंट की नई बोरियाँ रखी हैं। ताज़ा। ऊपर की बोरी पर अभी धूल भी नहीं जमी।"
"कितनी?"
"सानिया कह रही है कम से कम बीस। और उनके नीचे —" टिंकू ने आवाज़ धीमी की — "उनके नीचे कुछ सख़्त है। जब ट्रक वाले बोरियाँ उतार रहे थे, तो आवाज़ आई थी — जैसे लोहे पर लोहा गिरे।"
मेरे पेट में कुछ ठंडा सा उतरा।
पापा साइकिल से उतरे और उन्होंने हथौड़ा कमर से सटा लिया। "मतलब वो पहुँच गए," उन्होंने कहा। इतना ही कहा। पर उनके कहने का ढंग ऐसा था जैसे कोई पुराना हिसाब अपनी आख़िरी लाइन पढ़ रहा हो।
शबनम आपा ने एक केतली उठाई और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पी।" बस इतना कहा।
"आपा, अभी —"
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