The Mysterious Bell – Chapter 1362
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
"सोचिए," शालिनी ने कहा। "उनके पास काग़ज़ है। मुहर है। तारीख़ है। गवाह हैं। और हमारे पास? हमारे पास एक चोरी हुई डीड की कहानी है, एक खुली तिजोरी है, और एक आदमी है जो कहेगा — मैंने तो ये कभी देखा ही नहीं।"
"पर मेरे पिता ने —" डॉक्टर इसरानी ने कहा।
"डॉक्टर साहब," शालिनी ने धीरे से कहा, "अदालत में पिता की याद नहीं चलती। काग़ज़ चलता है।"
कमरा फिर चुप हो गया।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी। मैंने उसे उँगलियों से दबाया, हल्का सा सहलाया, और मन ही मन कहा — अब बोल। अब कुछ बोल।
वो नहीं बोली।
और ठीक उसी वक़्त, मेरे दिमाग़ में एक तस्वीर उभरी।
बहुत पुरानी नहीं — पर बहुत पुरानी भी। एक तस्वीर जो मैंने कहीं देखी थी। शायद डॉक्टर इसरानी के कमरे में। या उस दिन, जब मैं पहली बार उनके कमरे में गया था और दीवार पर पुरानी तस्वीरें टँगी थीं।
मैंने धीरे से कहा, "डॉक्टर साहब।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगे।
"एक बात पूछूँ?"
"पूछो।"
"आपके पापा ने जब ये अस्पताल बनवाया था — तो उस वक़्त काग़ज़ की एक नकल और बनी थी न?"
कमरे में हवा रुक गई।
डॉक्टर इसरानी के चेहरे पर कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था। डर नहीं। घबराहट नहीं। कुछ और। जैसे कोई बूढ़ा आदमी बरसों से एक दरवाज़े के सामने खड़ा हो और अचानक किसी ने उस दरवाज़े का नाम ले लिया हो।
"तुम्हें कैसे पता?" उन्होंने फुसफुसाया।
"मुझे पता नहीं," मैंने कहा। "पर अभी-अभी याद आया। जब हम नींव का पत्थर तोड़ रहे थे, तब मुझे लगा था कि वहाँ बहुत पुराना कुछ है। एक बक्सा मिला था। उसमें एक फटा जला काग़ज़ था।"
"और उससे पहले?" डॉक्टर इसरानी ने पूछा। "उस पत्थर के अंदर, उस बक्से से पहले?"
मैंने सिर हिलाया। "एक और नकल।"
डॉक्टर इसरानी ने आँखें बंद कर लीं।
"साठ साल," उन्होंने कहा। "साठ साल से मैंने उस नकल को नहीं छुआ।"
"आपने रखी थी?" मैंने पूछा।
"मैंने रखी थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "मेरे हाथ से। मेरे अपने हाथ से। मेरे पिता ने मुझे बुलाया था — मैं तब सोलह साल का था, शायद सत्रह। उन्होंने कहा — बेटा, ये काग़ज़ इस पत्थर में रखना। और किसी को नहीं बताना। सिर्फ़ तीन लोग जानेंगे — मैं, तू, और वो जो इस अस्पताल में सबसे आख़िर तक खड़ा रहेगा।"
"तीन लोग," दुबे अंकल ने कहा।
"तीन," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मेरे पिता, मैं, और एक तीसरा।"
"तीसरा कौन?" मैंने पूछा।
डॉक्टर इसरानी ने आँखें खोलीं। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहे थे।
"मैंने साठ साल तक सोचा कि वो तीसरा कोई और होगा," उन्होंने कहा। "कोई मज़दूर। कोई राजमिस्त्री। कोई ऐसा आदमी जिसे मेरे पिता भरोसे में लेते थे। पर अब जब तुमने पूछा, तब समझ आया — वो तीसरा मैं ही था। दो बार। एक बार वो सोलह साल का लड़का, जिसने पत्थर में काग़ज़ रखा। और दूसरी बार वो आदमी, जो साठ साल तक उसे खोलने से डरता रहा।"
मैंने एक पल सोचा।
"मतलब वो काग़ज़ आज भी वहाँ है।"
"अगर किसी ने उसे निकाला नहीं," डॉक्टर इसरानी ने कहा।
दुबे अंकल ने अपनी कुर्सी पर सीधे होकर कहा, "तो देर नहीं करनी चाहिए।"
सबने उनकी तरफ़ देखा।
"सोचो," उन्होंने कहा, "जिसने वो काग़ज़ दीवार पर टाँगा, जिसने तिजोरी खोली, जिसने डीड चुराई — क्या वो ये नहीं जानता कि नींव के पत्थर में कुछ और भी है?"
कमरे में ठंडी हवा फैल गई।
"उसे पता है," पापा ने कहा। "वो सब जानता है।"
"तो वो हमसे पहले वहाँ पहुँचेगा," दुबे अंकल ने कहा। "अगर पत्थर अभी नहीं खुला, तो कल सुबह तक वो टूटा हुआ मिलेगा। और काग़ज़ — या तो जल चुका होगा, या उसकी जेब में होगा।"
मैं खड़ा हो गया।
"तो अभी चलते हैं।"
"कहाँ?" दुबे अंकल ने पूछा।
"अस्पताल।"
"तुम कैदी हो, बेटा," उन्होंने कहा। "तुम्हें कोई बाहर नहीं ले जाएगा।"
मैंने पीछे देखा।
थाने का दरवाज़ा बंद था। बाहर गलियारे में जवान सिपाही खड़ा था — वही कादिर, जिसने कल रात मुझे बयान के लिए बुलाया था और जिसने चुपचाप सच की तरफ़ इशारा किया था।
"दरोगा से कहना पड़ेगा," मैंने कहा।
"दरोगा?" बबलू ने पहली बार बोला। उसकी आवाज़ कर्कश थी, जैसे बहुत देर से चुप था। "वो आदमी काग़ज़ से पहले पैसा सुनता है। वो इजाज़त नहीं देगा।"
"तो हम इजाज़त लेंगे," मैंने कहा। "नहीं मिलेगी, तो खैर। पर कोशिश तो करनी पड़ेगी।"
दरवाज़ा खुला।
दरोगा अंदर आया। उसके हाथ में वही पीला लिफ़ाफ़ा था, जो सुबह मेज़ पर पड़ा था। उसने लिफ़ाफ़ा मेज़ पर रखा, फिर अपनी कुर्सी खींची और बैठ गया। कुर्सी एक बार फिर चरमराई।
"मैंने सुना," उसने कहा। "तुम सब अस्पताल जाने की बात कर रहे हो।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मेरे हाथ में कैदी है," उसने कहा। "काग़ज़ी है या हवाई, मुझे पता है। पर वो काग़ज़ है। और जब तक वो काग़ज़ है, तुम बाहर नहीं जा सकते।"
"दरोगा साहब —"
"मुझे मत बताओ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में थकान थी, गुस्सा नहीं। "मैं सुबह से यही सुन रहा हूँ। कोई कहता है सच बोलो। कोई कहता है समझदारी से काम लो। कोई कहता है तुम्हारे ही काग़ज़ झूठे हैं। मुझे सब पता है। पर ये थाना है। यहाँ काग़ज़ के बिना तुम्हें खोल नहीं सकता।"
मैंने एक पल सोचा।
"अगर काग़ज़ न हो तो?"
"क्या मतलब?"
"अगर मैं कैदी ही न रहूँ?" मैंने कहा। "अगर आप कहें कि मुझे किसी काग़ज़ ने नहीं रोका, मैं खुद रूका था — तो?"
दरोगा ने गर्दन उठाई।
"तुम खुद रुके हो?"
"मैं खुद रुका हूँ," मैंने कहा। "कल रात से। किसी ने ज़ंजीर नहीं लगाई। आपने कहा था — सुबह तक रुक जाओ। और मैं रुका। क्योंकि मुझे काग़ज़ से नहीं, आपसे बात करनी थी। अब मेरी बात खत्म हुई। मैं जाना चाहता हूँ।"
दरोगा ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा।
"तुम जानते हो," उसने धीरे से कहा, "अगर मैं तुम्हें जाने दूँ और कल कोई काग़ज़ आ जाए, तो मेरी नौकरी जाएगी?"
"जानती हूँ," शालिनी ने कहा, और वो आगे आई। "और मैं ये लिखकर दे सकती हूँ कि अंकुश यादव को थाने ने नहीं रोका — उसने खुद इंतज़ार किया। पर आपको एक बात और सोचनी होगी, दरोगा साहब।"
"क्या?"
"अगर कल अस्पताल की नींव का पत्थर टूटा हुआ मिला," शालिनी ने कहा, "तो उस काग़ज़ में आपका नाम नहीं होगा। पर उस चोरी की जाँच में आपका नाम ज़रूर आएगा। और तब कोई नहीं पूछेगा कि आपने नियम माना था या नहीं। सब पूछेंगे — तुम्हारे थाने के सामने से चोर गया, और तुम देखते रहे?"
दरोगा कुछ देर चुप बैठा रहा।
फिर उसने अपनी मेज़ की दराज़ खोली, पीला लिफ़ाफ़ा अंदर रखा, और धीरे से बोला, "कादिर।"
दरवाज़ा खुला। कादिर अंदर आया।
"इन्हें बाहर छोड़ दो," दरोगा ने कहा। "पर सुनो —" उसने मेरी तरफ़ देखा — "जाओ, पत्थर देखो। अगर कुछ मिले तो मुझे खबर करो। और याद रखो, मैंने तुम्हें नहीं छोड़ा। तुम खुद गए।"
"जी," मैंने कहा।
"और एक बात," उसने कहा, जब मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ रहा था। "जो काग़ज़ कल रात आया था, वो सच में बिना वजह नहीं आया। किसी ने उसे भेजा है। वो कोई तुम्हें फँसाना चाहता है, या कोई तुम्हें डराना चाहता है। दोनों में फ़र्क़ समझ लेना।"
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