The Mysterious Bell – Chapter 1361
"क्यों?"
"क्योंकि वो डर रहे हैं," माँ ने कहा। "डर रहे हैं कि कहीं कोई उसे फाड़ न दे। क्योंकि अब उन्हें पता है कि वो पन्ना उनका है। जो सबसे पहले लिखा गया था, वो अब उनके हाथ में है।"
"और काजल?"
"काजल डर गई थी," माँ ने कहा। "पापा को उस हाल में देखकर। उसने मुझे फोन किया। मैंने कहा — रो मत, बस नज़र रख। जो पापा कहे, वही कर। उसने किया।"
मैंने उन पन्नों को बंद किया और कॉपी माँ को लौटा दी।
"नहीं," माँ ने कहा। "अब ये तेरी है।"
"माँ—"
"ले। जो मैंने बाईस साल संभाली, वो तेरे काम की है।" और फिर उन्होंने अपने पल्लू से एक छोटा तह किया हुआ पन्ना निकाला और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये भी ले।"
"ये क्या है?"
"पता नहीं," माँ ने कहा। "कल रात काजल ने दिया। कहा कि कॉपी में मिला। रमा मैडम से आया है। मैंने नहीं पढ़ा। तेरे लिए रखा था।"
मैंने उसे मोड़कर जेब में रख लिया, क्योंकि उसी वक़्त दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई।
दरवाज़े पर डॉक्टर निहाल इसरानी खड़े थे।
पर ये वो डॉक्टर इसरानी नहीं थे जिन्हें मैंने अस्पताल में देखा था। ये कोई और आदमी लग रहे थे। उनका चेहरा पीला पड़ गया था, बाल बिखरे हुए थे, और उनके होंठ काँप रहे थे। उनके हाथ में एक मोटा काग़ज़ था — पुराना, पीला, जिसके कोने मुड़े हुए थे — और वो उसे इस तरह पकड़े थे जैसे कोई बहुत ज़रूरी चीज़ हो, जो कहीं हवा में उड़ न जाए।
उनके पीछे एक सिपाही था जो उन्हें सहारा दे रहा था।
मैं दौड़कर उनके पास पहुँचा।
"डॉक्टर साहब!"
"अंकुश," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ रुँधी हुई थी। "मैं— मैं अस्पताल में तिजोरी के पास बैठा था। तुम लोगों के जाने के बाद। मैं सोच रहा था क्या करूँ।"
"साहब, आपको आराम करना चाहिए—"
"आराम?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो डर नहीं था। "बेटा, पचास साल की नींद से उठा हूँ। अब आराम कैसा?"
मैं उन्हें अंदर ले आया। माँ ने तुरंत उनके लिए जगह बनाई। उन्होंने कुर्सी पकड़ी और उस पर बैठने से पहले एक पल रुके — जैसे उन्हें अपने ही शरीर पर भरोसा न हो।
"डॉक्टर साहब," पापा ने कहा, "पानी ले लीजिए।"
"पानी बाद में," उन्होंने कहा, और अपना हाथ उठाया। "पहले ये देखो।"
उन्होंने काग़ज़ मेज़ पर रखा।
वो एक मोटा, पीला, मुड़ा हुआ काग़ज़ था — अस्पताल की किसी पुरानी फ़ाइल का आवरण, जिसके कोने कटे हुए थे और जिस पर धूल की पतली परत थी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"ये मुझे तिजोरी के ऊपर मिला," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "दीवार पर। एक कील से टँगा हुआ।"
"मतलब?"
"मतलब — जो चाक से लिखा था, वो एक बात है। पर इसके ऊपर एक और चीज़ थी जो मुझे सुबह नहीं दिखी। तुम लोगों के जाने के बाद मैंने दीवार को ठीक से देखा। और ये मिला।"
उन्होंने काग़ज़ खोला।
उसकी सतह पर बड़ी साफ़ लिखाई में कुछ लिखा हुआ था। स्याही नीली थी, पर फीकी नहीं — ताज़ी थी, और अभी पूरी सूखी भी नहीं थी।
डॉक्टर इसरानी ने अपना चश्मा पोंछा और उसे पहना। फिर उन्होंने काग़ज़ अपनी आँखों के सामने उठाया।
"पढ़ूँ?" उन्होंने पूछा, किसी से भी।
"पढ़िए," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मेरे कानों में ही अजीब लगी।
और धीरे-धीरे, जैसे हर शब्द उनके मुँह से निकलने में दर्द हो रहा हो, डॉक्टर इसरानी ने पढ़ा —
"पूर्णिमा के दिन मैदान में सिर्फ़ रणवीर के काग़ज़ बोलेंगे।"
वो रुके।
कमरे में एक भी आवाज़ नहीं थी। दुबे अंकल की कुर्सी भी नहीं चरमराई।
फिर उन्होंने आख़िरी पंक्ति पढ़ी —
"बाकी सब चुप रहेगा।"
मेरे कानों में गूँज होने लगी।
मैंने धीरे से पीछे देखा।
माँ ने अपनी कॉपी अपनी छाती से लगा ली थी। पापा का हाथ कमीज़ की जेब पर कस गया। शालिनी का हाथ काजल की कमर पर था, जैसे वो गिरने से बचा रही हो। काजल के होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। बबलू ने रोटी का टुकड़ा हाथ में पकड़े-पकड़े ही उसे नीचे रख दिया, जैसे अचानक भूख खत्म हो गई हो। मीरा की उँगलियाँ अपने छिपे कैमरे की तरफ़ बढ़ीं और वहीं रुक गईं।
और दुबे अंकल ने धीरे से अपनी छड़ी उठाई और उसकी नोक से ज़मीन पर एक लकीर खींची। पच्चीस साल बाद पहली बार उन्होंने चुप्पी तोड़ी।
"अब समझ आया," उन्होंने कहा। "যो काग़ज़ आज दीवार पर टँगा था, वो कोई पुराना नहीं था। वो आज का था। आज सुबह किसी ने टाँगा।"
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला।
घंटी ठंडी थी।
मैंने उसे हल्का हिलाया। कुछ नहीं हुआ।
फिर मैंने उसे अपनी हथेली में दबाया और धीरे से फुसफुसाया — "कुछ बोल।"
घंटी एक पल चुप रही। फिर गरम हुई — बहुत ज़्यादा नहीं, बस इतनी कि मुझे महसूस हो गया।
और उसने कहा — "ये काग़ज़ धमकी नहीं है।"
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
"तो क्या है?" मैंने घंटी से पूछा।
घंटी ने कहा — "ये न्योता है।"
और फिर उसने एक आख़िरी बात कही, बहुत धीमे से, जैसे कोई चेतावनी दे रही हो —
"जिसने लिखा, वो मैदान में तेरा इंतज़ार कर रहा है।"
मेरी जेब में काग़ज़ का वो छोटा टुकड़ा था जो माँ ने दिया था। और मेरे सीने में वो कॉपी थी जिस पर बाईस साल पुरानी एक लाल लकीर थी।
मैंने धीरे से कहा, "पापा।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
"आज मैदान में सिर्फ़ रणवीर के काग़ज़ नहीं बोलेंगे।"
पापा ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया।
"नहीं," उन्होंने कहा। "आज कुछ और भी बोलेगा।"
॥
डॉक्टर इसरानी ने काग़ज़ को मोड़ा, अपनी जेब में रखा, और फिर धीरे से दुबे अंकल की खाली कुर्सी की तरफ़ देखा। कुर्सी खाली नहीं थी — दुबे अंकल उस पर बैठे थे, पर उनका शरीर इतना स्थिर था कि लगे कुर्सी ही बैठी हो।
डॉक्टर इसरानी ने अपनी छड़ी उठाई, फिर रख दी। जैसे छड़ी भी अब सहारा नहीं, बोझ लग रही हो।
"बैठिए," दुबे अंकल ने कहा। "खड़े-खड़े हिसाब नहीं होता।"
डॉक्टर इसरानी बैठे। कुर्सी चरमराई — वही पुरानी चरमराहट, जो थाने के इस छोटे कमरे की सबसे पुरानी आवाज़ थी। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, रूमाल से पोंछा, और फिर बिना चश्मे के ही बोलने लगे, जैसे चश्मा पहनकर सच बोलना मुश्किल हो।
"तुम सब सोच रहे होगे कि चोर ने एक काग़ज़ चुराया," उन्होंने कहा। "एक काग़ज़। किसी तिजोरी से। कोई बड़ी बात नहीं।"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"पर वो काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ नहीं था।"
कमरे में सन्नाटा था। माँ ने अपनी कॉपी और कसकर पकड़ ली, जैसे अब किसी और चीज़ को जाने नहीं देंगी।
"वो काग़ज़ इस ज़मीन को गरीबों के नाम पर बाँधता था," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "मेरे पिता ने यह अस्पताल इसलिए बनाया था कि यहाँ इलाज के लिए कोई काग़ज़ न माँगे। कोई अंगूठा न माँगे। कोई ज़मीन न माँगे। उस काग़ज़ में साफ़ लिखा था — यह ज़मीन बिक नहीं सकती, गिरवी नहीं रखी जा सकती, और जो इसे बेचने की सोचेगा, उस पर गली का कोई आदमी मुँह नहीं दिखाएगा।"
"सात अंगूठे," पापा ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी।
"सात अंगूठे," डॉक्टर इसरानी ने सिर हिलाया। "और उन सात में तुम्हारे दादा का अंगूठा सबसे नीचे था। सबसे आख़िरी। पर सबसे भारी।"
मेरे गले में कुछ अटक गया।
मैंने कहा, "तो अब जो हुआ है —"
"अब जो हुआ है," शालिनी ने मेरी बात काटी, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो वकील की आवाज़ में होती है जब वो अपने ही दिल को दरवाज़े के बाहर खड़ा कर देता है, "वो यह है कि चंद्रेश सक्सेना कल अदालत में खड़े होकर कहेंगे कि इस ज़मीन का कोई मूल काग़ज़ था ही नहीं।"
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