The Mysterious Bell – Chapter 1360
"जो चीज़ दीवार पर लिखी है, उसे कोई मिटा सकता है। जो चीज़ ज़मीन पर खुदी है, उसे कोई पोंछ सकता है। पर जो चीज़ थाने में रख दी गई है — उसे मिटाने के लिए पूरा काग़ज़ जलाना पड़ेगा। और जिसे जलाने की नीयत हो, उसे सबके सामने जलाना पड़ेगा।" उन्होंने एक पल रुककर कहा। "इस उम्र में भी डॉक्टर साहब होशियार हैं।"
तभी मैंने देखा — थाने के दरवाज़े पर एक जानी-पहचानी साड़ी।
माँ।
उनके एक हाथ में टिफ़िन था और दूसरे हाथ में वो पुरानी हिसाब कॉपी, जिसकी जिल्द खुल रही थी और जिसके कोनों पर सालों से टेप चिपका हुआ था। उनका माथा पसीने से भीगा था और साँस थोड़ी तेज़ चल रही थी, जैसे वो दौड़कर आई हों।
मेरे पैर ठिठक गए।
मेरे दिमाग़ में एक ही बात चल रही थी — माँ डाँटेंगी। कहेगी, तूने ये क्या किया? तेरे पीछे पूरा घर बिखर गया। पापा को क्यों इस मुसीबत में घसीटा? तूने अपनी ज़िंदगी क्यों आग में झोंक दी?
यही होता है न। माँ होती हैं। जब सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती है, तभी सबसे ज़्यादा डाँट पड़ती है। मैंने अपना सिर थोड़ा नीचा कर लिया, तैयार होकर।
पर माँ ने ऐसा कुछ नहीं कहा।
वो मेरे पास आईं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और फिर, बिना एक शब्द बोले, टिफ़िन मेरे हाथ में पकड़ा दिया।
"खा," उन्होंने कहा।
मेरा गला भर आया।
"माँ—"
"अंकुश।" उनकी आवाज़ पहले से कड़क थी, पर उसमें गुस्सा नहीं था। "भूखे बेटे से सच भी नहीं बोला जाता। और आज तुझे बहुत सच बोलना है। इसलिए पहले खा।"
मेरे हाथ में टिफ़िन था, और मेरी आँखें माँ के हाथ पर टिकी थीं — उनकी उँगलियाँ उस कॉपी पर हल्की काँप रही थीं।
माँ ने मेरी नज़र देख ली और उन्होंने अपनी उँगलियों को जान-बूझकर कस लिया।
"पहले खा," उन्होंने दोहराया, और फिर मुड़कर पीछे देखा, जहाँ मीरा और बबलू चुपचाप खड़े थे। "तुम दोनों भी आओ।"
बबलू ने हाथ जोड़ लिए।
"आंटी, एक बात कहूँ?"
"कह।"
"आपकी रोटी अच्छी है? या सिर्फ़ अच्छी दिखती है?"
माँ ने उसे घूरकर देखा, फिर एक गहरी साँस ली।
"खाकर बताओ," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रख। मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं। अगर तूने खाकर भी बेवकूफ़ी की बात की, तो टिफ़िन वापस।"
बबलू पहले हँसा, फिर अपना मुँह लटका लिया।
"ये भी कोई धमकी है," उसने बुदबुदाया। "खाना देकर डरा रही हैं आंटी।"
कादिर हँस पड़ा, और पीछे खड़ी शालिनी भी। पापा ने होंठ भींचकर मुस्कुराहट रोकने की कोशिश की और डॉक्टर इसरानी ने बिना हँसे कहा — "गली की औरतें कभी सिर्फ़ रोटी नहीं देतीं, बेटा। रोटी के साथ हिसाब भी देती हैं। यही उनकी ताकत है।"
मैंने टिफ़िन खोला।
रोटियाँ थीं, दाल थी, और छोटी कटोरी में गुड़ और सूखा धनिया। साथ में अचार के दो टुकड़े। मेरे हाथ काँप रहे थे, और जब मैंने पहला टुकड़ा मुँह में रखा, तो अचानक पता चला कि मुझे भूख कितनी तेज़ थी — कल शाम से कुछ ठीक से खाया ही नहीं था।
माँ मेरे बगल में बैठ गईं। उन्होंने अपनी कॉपी गोद में रखी और मेरी तरफ़ देखती रहीं, जैसे गिन रही हों कि मैं कितना खा रहा हूँ।
फिर, जब मैंने दूसरी रोटी का टुकड़ा तोड़ा, वो धीरे से बोलीं—
"अंकुश, एक बात सुन ले।"
"हाँ माँ।"
"मेरा बेटा कैद में हो सकता है," उन्होंने कहा, बहुत सीधी आवाज़ में। "पर ईमान में नहीं होगा।"
मेरा हाथ रुक गया।
"ये बात जान ले," माँ ने आगे कहा। "और जो भी आज मुझसे पूछे — चाहे रणवीर हो, चाहे कोई दरोगा हो, चाहे पूरी गली हो — मैं यही कहूँगी। मैं इक्यावन साल की औरत हूँ। मैंने बाईस साल चुप रहकर एक चीज़ सीखी है — चुप्पी भी एक काग़ज़ है। उस पर भी कोई न कोई अंगूठा लगाता है। आज से मेरे काग़ज़ पर मेरा ही अंगूठा रहेगा।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने तेज़ी से सिर नीचे कर लिया, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि कादिर मुझे इस हाल में देखे, या बबलू, या मीरा। पर माँ ने देख लिया। और उन्होंने कुछ नहीं कहा — बस मेरे सिर पर हाथ फेरा और कहा:
"खा ले। कॉपी बाद में दिखाऊँगी।"
रोटी खत्म करते-करते शाम के साढ़े पाँच बज चुके थे। बबलू ने दो रोटी और माँगी। माँ ने पहले उसे डाँटा — "तूने कब से खाया नहीं?" — और बबलू ने कहा — "कल शाम से, आंटी। कैद में रोटी मिलती है, पर खाने का मन नहीं होता।" और माँ ने अपना सारा गुस्सा भूलकर उसे तीसरी रोटी थमा दी।
"थाने की हवा में भूख ज़्यादा लगती है," माँ ने कहा, जैसे कोई बहुत बड़ा सच बता रही हों।
"क्यों आंटी?" बबलू ने पूछा।
"क्योंकि यहाँ आदमी को लगता है कि उसकी सारी भूख यहीं खत्म हो जाएगी। और जब भूख खत्म होने लगे, तो आदमी सच बोलने लगता है।"
बबलू ने रोटी खाते हुए कहा, "आपको तो सब पता है आंटी। बड़ी खतरनाक बातें करती हैं आप।"
माँ ने उसे एक और रोटी थमा दी।
"हाँ," उन्होंने कहा। "और याद रख — मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।"
दुबे अंकल भी हँस पड़े।
"सुशीला देवी," उन्होंने कहा, "आप आज भी वही हैं।"
"आप क्या सोच रहे थे, दुबे जी?" माँ ने कहा। "मैं सालों से यही हूँ। बस पहले डर के मारे बोलती नहीं थी। अब बोलूँगी।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और कॉपी मेरे हाथ में रख दी।
"देख," उन्होंने कहा। "पिछली बार आधा पन्ना दिखाया था। अब पूरा देख ले।"
मैंने कॉपी अपनी गोद में रखी और पन्ने पलटने लगा। मेरी उँगलियाँ उन पुराने पन्नों पर फिसल रही थीं, जिन पर माँ की साफ़-सुथरी लिखाई में तीस साल का हिसाब लिखा था — दालें, चावल, तेल, चीनी, बच्चों की कॉपियाँ, काजल की फ़ीस, कभी-कभी कोई दवा भी। माँ ने हर चीज़ का हिसाब लिखा था। हर चीज़ का।
और फिर मैं उस आख़िरी सिले पन्ने पर पहुँचा।
वही पन्ना। जिस पर कटा हुआ नाम था — "पू…मा" — और उसके नीचे अलग लिखाई में "पूर्णिमा की रात"।
पर आज कुछ और था।
पन्ने के दाएँ कोने पर, एक लाल स्याही की छोटी सीधी लकीर थी। छोटी, तीन उँगली जितनी। बस एक लकीर। पर वो लकीर स्याही की नहीं, जैसे किसी ने जान-बूझकर खींची हो — थोड़ी मोटी, थोड़ी दबी हुई।
मेरे हाथ रुक गए।
"माँ," मैंने कहा, "ये लकीर?"
माँ ने देखा और एक गहरी साँस ली।
"वो मेरी है," उन्होंने कहा।
"कब की?"
"बाईस साल पुरानी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"जिस दिन मुझे पता चला कि शंकर ने डर के मारे रणवीर के काग़ज़ों पर अंगूठा लगा दिया है," माँ ने कहा, "उस दिन मैंने यह लकीर खींची थी। अपनी कॉपी में। ताकि मैं भूल न जाऊँ।"
"पर आपने कुछ किया क्यों नहीं?"
"क्योंकि मैं भी डर गई थी।" उन्होंने मेरी तरफ़ सीधा देखा, और उनकी आवाज़ में कोई नाटक नहीं था। "और यही बात मुझे रोज़ रात जगाती थी। पापा ने अंगूठा लगाया, पर मैंने लकीर खींचकर उसे अपने सीने में बंद कर लिया। दोनों बराबर के थे अंकुश। दोनों बराबर के।"
मैं कुछ नहीं बोल पाया।
"अब सुन," माँ ने आगे कहा। "आज सुबह तेरे पापा दुकान पर लौटे। ना कुछ बोले। ना किसी से कुछ पूछा। बस रजिस्टर निकाला। उसका वही आख़िरी पन्ना खोला। और उस पर लाल स्याही से एक लाइन लिख दी।"
मेरी साँस रुक गई।
"क्या लिखा?"
"'साइकिल की घंटी और उसकी जीभ।'"
मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो अभी भी वहीं खड़े थे, पर उनका चेहरा जैसे कहीं और था।
"और फिर," माँ ने कहा, "वो उस पन्ने को किसी को छूने नहीं दे रहे। अपनी मेज़ पर रखा है और दोनों हाथ उसके दोनों तरफ़ रखकर बैठे हैं।"
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