The Mysterious Bell – Chapter 1359
“आपको पता था?” शालिनी ने पूछा।
“पता था,” डॉक्टर इसरानी ने कहा। “पर मैंने उसे निकालने की कोशिश कभी नहीं की, क्योंकि मुझे लगा कि जो नींव में है, वो सबसे सुरक्षित है।”
“और अब?”
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो साठ साल की उम्र में भी किसी आदमी की आँखों में बची रहती है — उम्मीद।
“और अब,” उन्होंने कहा, “हमें वो पत्थर खोलना पड़ेगा।”
अस्पताल के पीछे का आँगन शाम को और भी सूनसान लगता है।
हवा में सीलन की गंध थी और दीवार के सहारे खड़ी पुरानी अलमारी से ईंटों की धूल उड़ रही थी।
डॉक्टर इसरानी के हाथ में एक छोटी फावड़ी थी और पापा के हाथ में — मुझे हैरानी हुई — एक बड़ा हथौड़ा।
“पापा, आप यहाँ कैसे?”
“काजल ने फोन किया,” उन्होंने कहा। “मैं दुकान पर बैठा था। उठकर आ गया।”
“आपको आराम करना चाहिए…”
“अंकुश,” उन्होंने मेरी बात काटी, “मैंने बाईस साल आराम किया है। अब काम का वक़्त है।”
डॉक्टर इसरानी ने दीवार के नीचे एक जगह इशारा किया।
“यहाँ,” उन्होंने कहा। “पीली दीवार के नीचे, बायीं तरफ़। यही वो पत्थर है जो नींव में सबसे पहले रखा गया था।”
पापा ने हथौड़ा उठाया।
पहला वार — दीवार हिली।
दूसरा वार — प्लास्टर झरने लगा।
तीसरा वार — पत्थर चटक गया।
और फिर, जैसे ही उन्होंने उसे हटाया, अंदर से धूल और ईंटों के टुकड़ों के साथ एक छोटा लकड़ी का बक्सा बाहर आया — पुराना, गीला, और सड़ा हुआ।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
मैंने उसे खोला।
अंदर सिर्फ़ एक फटा काग़ज़ था। जला हुआ, फटा, और बुरी तरह पुराना। उसके किनारे टूटे हुए थे और बीच में एक मोटी सीधी लकीर थी, जैसे किसी ने उसे काटकर दो हिस्सों में बाँट दिया हो।
मैंने उसे ध्यान से खोला।
उस पर बड़ी मेहनत से लिखी सिर्फ़ एक लाइन थी।
“सब कुछ मैदान में तय होगा।”
मेरे हाथ से काग़ज़ फिसलने लगा।
पापा ने मेरा हाथ थामा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “यह काग़ज़ पूरा नहीं है।”
“पता है।”
“इसका बाकी हिस्सा कहीं और है।”
“कहाँ?”
और तभी — मेरी जेब से घंटी गरम हुई।
इतनी गरम कि मुझे जलन महसूस हुई।
मैंने उसे बाहर निकाला।
घंटी ने कहा — “अब चार नहीं, पाँच हाथ।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“पाँच कौन?”
घंटी ने कहा — “जिसने लिखा, उसे ढूँढ।”
और फिर उसने एक आख़िरी बात कही, बहुत धीमे से, जैसे खुद भी उस पर यक़ीन न कर रही हो — “अब वो खुद आएगा।”
मैंने काग़ज़ को मोड़कर जेब में रखा।
“पापा,” मैंने कहा, “अब मैदान चलते हैं।”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछिए।”
“तू डरता नहीं है?”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ ठंडी हो चुकी थी।
“डरता हूँ,” मैंने कहा। “पर अब डर के साथ-साथ एक चीज़ और भी है।”
“क्या?”
“यह पता कि किसके सामने खड़ा होना है।”
पापा ने हथौड़ा ज़मीन पर रखा और मेरी तरफ़ देखा।
“मैं भी,” उन्होंने कहा। “पहली बार अब जाकर पता है।”
और हम चले — पापा, मैं, डॉक्टर इसरानी, शालिनी, काजल, और मीरा, जो अपना दूसरा कैमरा अभी भी छिपाकर चला रही थी।
पीछे अस्पताल की पीली दीवार पर वो फटा लिखा हुआ अभी भी चमक रहा था।
“सब कुछ मैदान में तय होगा।”
और मैं मन ही मन सोच रहा था — आज मैदान में सिर्फ़ हिसाब नहीं खुलेगा।
आज कुछ ऐसा खुलेगा जिससे पूरी गली पलट जाएगी।
क्योंकि पाँच हाथ जब एक साथ मिलते हैं, तो किसी एक का हिसाब माफ़ नहीं होता।
॥
अस्पताल के पीछे वाली गली से निकलकर जब हम चौक पर पहुँचे, तो शाम ढल रही थी और हवा में एक अजीब सी भारीपन था। थाने की लाल-भूरी इमारत सामने खड़ी थी और उसके बाहर दुबे अंकल अपनी पुरानी कुर्सी पर बैठे थे, जिसका एक पैर ईंट के टुकड़े पर टिका था। मैंने देखा कि उन्होंने आज नीली शर्ट की आस्तीन नीचे कर ली थी — जैसे किसी खास मौके के लिए तैयार हो रहे हों।
पापा आगे-आगे चल रहे थे। उनका हाथ कमीज़ की जेब पर टिका था, जहाँ उन्होंने वो फटा जला काग़ज़ रखा था। छह शब्द थे उस पर — "सब कुछ मैदान में तय होगा।" और वो छह शब्द मेरे सीने में बार-बार उलट-पलट रहे थे, जैसे कोई पुराना ताला अंदर से खुलने की कोशिश कर रहा हो।
डॉक्टर इसरानी पापा के बगल में थे, उनकी छड़ी की नोक ज़मीन पर टक-टक कर रही थी। शालिनी काजल का हाथ थामे हुए थी, और काजल की आँखें लगातार चौक के कोनों पर घूम रही थीं। मीरा सबसे पीछे थी, अपना बड़ा कैमरा बैग में डाल चुकी थी, पर छोटा वाला कैमरा उसने जान-बूझकर छिपा रखा था — मुझे पता था, वो उसे कभी बंद नहीं करती।
दुबे अंकल ने जैसे ही हमें देखा, कुर्सी से उठने की कोशिश की।
"अंकुश!"
मैं उनकी तरफ़ बढ़ गया।
"जी अंकु नल। आप बैठिए ना।"
"बैठूँ?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और फिर पापा की तरफ़। "शंकर भाई, आप ठीक हैं?"
पापा ने सिर हिलाया।
"ठीक हूँ, दुबे जी।"
"पर आपका चेहरा—"
"चेहरा ठीक है," पापा ने कहा, और उनकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। "बस उम्र भर का हिसाब चुकाने चला हूँ। चेहरा उसी का है।"
दुबे अंकल ने उनका कंधा थामा।
"हिसाब चुकाना बहादुरी है," उन्होंने धीरे से कहा। "पर एक बात याद रखिए — हिसाब में सबसे पहले उसका नाम आता है जिसने सबसे ज़्यादा झेला है। आपका नाम पहले आएगा। ये मत सोचिए कि आप पर इल्ज़ाम है। झेलना हर इल्ज़ाम से बड़ी चीज़ है।"
पापा ने उनकी तरफ़ देखा, और पहली बार आज उनकी आँखों में कुछ ऐसा दिखा जो कमज़ोरी नहीं थी।
तभी — कदमों की एक तेज़ आवाज़।
कादिर दौड़ता हुआ आया। उसकी खाकी कमीज़ की बाँहें खुली थीं, टोपी हाथ में थी, साँस फूली हुई थी और माथे से पसीना बह रहा था। वो सीधा मेरे सामने आकर रुका और दोनों हाथ घुटनों पर रखकर झुक गया।
"उस्ताद!"
"साँस ले पहले।"
"साँस— साँस लेता हूँ—" वो हाँफते हुए बोला, "पर पहले सुन लो। डॉक्टर निहाल— वो खुद थाने आ रहे हैं!"
मैंने पीछे देखा। डॉक्टर इसरानी मेरे ठीक पीछे खड़े थे, उनकी भौंहें चढ़ी हुई थीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं यहीं हूँ।"
कादिर ने उनकी तरफ़ देखा, एक पल के लिए अटका, और फिर अपने माथे पर हाथ मारा।
"मतलब— मैं— नहीं, मतलब— मैं वो डॉक्टर साहब की बात नहीं कर रहा जो यहाँ खड़े हैं— मतलब—"
"कौन सा डॉक्टर, कादिर?" मैंने धीरे से पूछा।
कादिर ने गला साफ़ किया और सीधा हो गया।
"डॉक्टर निहाल इसरानी," उसने कहा। "वो अपने घर नहीं गए। अस्पताल से निकलकर सीधे यहाँ आ रहे हैं। बूढ़े आदमी हैं, पर कोई रोक नहीं पाया। और— और उनके हाथ में—"
वो रुका।
"क्या है उनके हाथ में?"
"काग़ज़," कादिर ने कहा। "दीवार से उतारा हुआ काग़ज़।"
मेरी साँस एक पल के लिए रुक गई।
"कौन सा काग़ज़?"
"वो जो चाक से लिखा था, वो। उन्होंने दीवार से उतार दिया। पूरा हिस्सा। प्लास्टर के साथ।" कादिर ने अपना हाथ हवा में घुमाया। "कह रहे हैं — मैं इसे थाने में रखूँगा। कोई मिटा न सके।"
मैं पापा की तरफ़ मुड़ा। पापा पहले से मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनके चेहरे पर वो चुप्पी थी जो हमेशा किसी बड़ी बात से पहले आती थी।
"डॉक्टर साहब ठीक कर रहे हैं," पापा ने कहा।
"क्या मतलब?"
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