The Mysterious Bell – Chapter 1358
मैं पीछे गया।
पापा औज़ारों के ट्रंक के पास बैठे थे। उनके हाथ में एक छोटी लोहे की चीज़ थी, जिसे वो बार-बार पलट रहे थे।
“पापा?”
उन्होंने सिर उठाया।
उनके चेहरे पर कुछ बदल गया था। वो चुप्पी पहले जैसी नहीं थी। पहले वो डर की चुप्पी थी। अब वो थकान की चुप्पी थी — वो थकान जो किसी ने पहाड़ उठाने के बाद अनुभव की हो।
“बैठ,” उन्होंने कहा।
मैं बैठ गया।
“मैं रणवीर से मिला,” उन्होंने कहा।
“क्या हुआ?”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“उसने मुझे दो चीज़ें दिखाईं,” उन्होंने कहा। “एक — तेरी माँ का पूरा इलाज का रिकॉर्ड। दूसरा — तेरे नाम का एक काग़ज़।”
मेरा पेट ठंडा हो गया।
“मेरे नाम का क्या काग़ज़?”
“वो काग़ज़ नहीं देखने दिया,” पापा ने कहा। “बस दिखाया। और कहा — ‘यह काग़ज़ अभी बाहर आया नहीं है, अगर मैं चाहूँ तो कभी नहीं आएगा।’”
“और आपने?”
“मैंने कहा,” पापा ने धीमे से कहा, “कि मेरा बेटा अपने काग़ज़ से नहीं, अपने काम से जाना जाएगा।”
कुछ देर चुप्पी रही।
फिर पापा ने हाथ में पकड़ी चीज़ मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
“यह क्या है?”
“उसकी मेज़ पर रखी थी,” पापा ने कहा। “मैंने उठा ली। छोटी चीज़ है। उसे इसकी खबर भी नहीं होगी।”
वो एक छोटी पीतल की पट्टी थी। पुरानी, मुड़ी हुई, घिसी हुई। उस पर कुछ खुदा था, पर पढ़ा नहीं जा रहा था।
घंटी मेरी जेब में गरम हुई।
मैंने उसे बाहर निकाला।
घंटी ने कहा — “पहला पन्ना।”
“क्या?”
“पहला पन्ना।”
“कौन-सा पहला पन्ना?”
घंटी चुप हो गई।
पापा मेरी तरफ़ देख रहे थे।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “अब जो होगा, वो मेरी वजह से होगा। मैंने उससे आज शाम का वादा किया है, और मैं वो वादा निभाऊँगा। पर एक बात याद रखना — चाहे कुछ भी हो जाए, तू अपने हाथ साफ़ रखना।”
“पापा…”
“मैंने बाईस साल गंदे हाथों से गुज़ारे हैं,” उन्होंने कहा। “तेरे हाथ अभी साफ़ हैं। उन्हें गंदा मत करना।”
शाम पाँच बजे मीरा थाने के बाहर खड़ी थी।
मैंने उसे देखा तो पहले सोचा कि वो किसी से बात कर रही है। पर फिर मैंने उसके हाथ में मोबाइल देखा — सामने की तरफ़, जैसे कोई बोल रहा हो।
शालिनी ने मेरा हाथ पकड़ा।
“वो सीधा प्रसारण कर रही है,” उसने कहा।
“क्या?”
“चंद्रेश ने उसका मोबाइल ज़ब्त कराया था, पर उसके पास एक और था।” शालिनी ने धीमे से कहा। “वो चार बजे से प्रसारण कर रही है। पहले वो अपना दाग़ खोल चुकी है। अब वो रणवीर के काग़ज़ों के बारे में बता रही है।”
मैं दौड़कर पहुँचा।
मीरा कैमरे की तरफ़ देखकर बोल रही थी, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो सिर्फ़ सच बोलने से आती है।
“…और मैं यह इसलिए नहीं कह रही कि मैं सही हूँ,” वो बोल रही थी, “बल्कि इसलिए कह रही हूँ कि पाँच साल पहले मैंने एक आधी खबर छापी थी और उससे एक शिक्षिका का घर टूट गया था। आज मैं वही गलती दोहराना नहीं चाहती। इसलिए मैं आपको अभी, इसी वक़्त, नाम लेकर बता रही हूँ — मेरे पास नूर अस्पताल की ज़मीन के सात अंगूठों वाले काग़ज़ की जानकारी है। वो काग़ज़ आज शाम पीपल के नीचे खुलेगा। और जो उसे खोलने की कोशिश में आग लगाएगा, उसको मैं पहले से बता रही हूँ — मैंने उसकी नकल चार जगह रखी है।”
मेरा दिल तेज़ धड़का।
“मीरा!”
उसने मुड़कर मुझे देखा और मुस्कुराई।
“आ गए?”
“तुमने यह क्यों किया?”
“क्योंकि आदमी जिस चीज़ से डरता है,” उसने कहा, “वो काग़ज़ नहीं, चुप्पी है। और मैंने आज चुप्पी तोड़ दी है।”
उसने कैमरा बंद किया।
“अब सुन,” उसने कहा। “गली के लोग पीपल पर जमा होने लगे हैं। मैंने हर एक को अलग-अलग खबर नहीं भेजी। मैंने सिर्फ़ इतना कहलवाया — ‘आज शाम पाँच बजे पीपल पर वो काग़ज़ खुलेगा जिसमें सबका हिसाब है।’ और सुनो — लोग आ रहे हैं।”
मैंने दूर देखा।
गली के मोड़ पर भीड़ जमा हो रही थी।
शबनम आपा गुमटी के बाहर खड़ी थीं, हाथ में चिमटी, और पास ही रज़िया। भोला भाई अपने शटर के नीचे से झाँक रहे थे। नसीमा बाई अपने राशन की दुकान का शटर आधा उठाकर दरवाज़े पर आ गई थीं। दुबे अंकल की कुर्सी खाली थी — वो पहले से पीपल पर थे।
“चलो,” मीरा ने कहा।
“पहले एक और काम है,” मैंने कहा।
“क्या?”
“डॉक्टर इसरानी को बताना है।”
नूर अस्पताल जाने के रास्ते में मेरा फोन बजा।
काजल थी।
“अंकुश,” उसकी आवाज़ काँप रही थी, “अस्पताल आओ। तुरंत।”
“क्या हुआ? माँ ठीक हैं?”
“माँ ठीक हैं। पर डॉक्टर इसरानी का दफ़्तर खुला है, तिजोरी खुली है, और दीवार पर कुछ लिखा है।”
मैं दौड़ा।
मीरा और शालिनी मेरे पीछे आईं।
अस्पताल पहुँचा, तो डॉक्टर इसरानी अपने कमरे के बाहर खड़े थे — हाथ में सफ़ेद कपड़ा, जिससे उन्होंने अपना चश्मा पोंछा हुआ था। काजल उनके बगल में खड़ी थी।
“अंकुश,” डॉक्टर इसरानी ने कहा।
“क्या हुआ डॉक्टर साहब?”
“अंदर आओ,” उन्होंने कहा। “पहले अंदर आओ।”
मैं अंदर गया।
कमरा वैसा ही था — काग़ज़ों के ढेर, आधे पानी का गिलास, टूटा चश्मा, और दीवार पर उनकी बीवी की बिना तारीख़ वाली तस्वीर।
पर तिजोरी खुली थी।
और उसकी दीवार पर, पेंट के ऊपर, सफ़ेद चाक से कोई मोटे अक्षरों में कुछ लिख गया था।
मैंने पढ़ा।
“पूर्णिमा पर सिर्फ़ रणवीर के काग़ज़ बोलेंगे। बाकी सब चुप रहेगा।”
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
“डॉक्टर साहब, तिजोरी में क्या था?”
डॉक्टर इसरानी की आवाज़ धीमी थी, जैसे बहुत दूर से आ रही हो।
“अस्पताल की मूल ट्रस्ट डीड,” उन्होंने कहा। “वो काग़ज़ जिस पर सात अंगूठे थे। जिस पर अंकुश तेरे दादा जगदीश यादव का हाथ भी था। और जिस पर लिखा था कि यह ज़मीन कभी बिक नहीं सकती।”
“कब से गायब है?”
“आज दोपहर से। मैं दो बजे यहाँ से गया था, चार बजे लौटा, तो तिजोरी खुली थी।”
“ताले का क्या हुआ?”
डॉक्टर इसरानी ने मेरी तरफ़ देखा।
“ताला सही-सलामत है,” उन्होंने कहा। “चाबी से खुला। और चाबी सिर्फ़ मेरे पास थी।”
कमरे में चुप्पी छा गई।
शालिनी ने आगे बढ़कर दीवार पर लिखी बात देखी।
“यह चाक से लिखा है,” उसने कहा। “और चाक अभी भी नरम है।”
“मतलब?”
“मतलब — जाने वाला जल्दी में था।”
“किसी को देखा?” मैंने पूछा।
“नर्स को नहीं।” डॉक्टर इसरानी ने कहा। “पर एक बात है।”
“क्या?”
“जब मैं लौटा, तो सीढ़ियों पर एक आदमी बैठा था — सफ़ेद कुर्ता, लकड़ी के जूते। मैंने पूछा कि किससे मिलना है, तो बोला — ‘आपसे नहीं।’ और चला गया।”
“वो कहीं दिख रहा है?”
“नहीं। पर एक चीज़ छोड़ गया।” डॉक्टर इसरानी ने अपनी मेज़ की दराज़ खोली और एक मुड़ा काग़ज़ निकाला। “सीढ़ी पर पड़ा था।”
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर एक ही लाइन थी, बड़ी साफ़ लिखाई में — “जो नींव में रखा है, वो छत पर नहीं मिलेगा।”
मैंने डॉक्टर इसरानी की तरफ़ देखा।
“डॉक्टर साहब,” मैंने धीमे से कहा, “इसका मतलब क्या है?”
डॉक्टर इसरानी कुछ देर चुप खड़े रहे। फिर वो अपनी कुर्सी पर बैठ गए, जैसे अचानक उनके पैरों से ज़मीन खिसक गई हो।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “जब यह अस्पताल बना था, तब काग़ज़ों की दो नकलें बनी थीं। एक ऊपर रखी गई — तिजोरी में। दूसरी — नींव के पत्थर में दीवार के अंदर चुन दी गई थी। यह पुराना रिवाज़ था — जो ज़मीन सबकी हो, उसका काग़ज़ ज़मीन के नीचे भी रहे।”
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