The Mysterious Bell – Chapter 1365
उसने सिर हिलाया।
और पीछे से बबलू आया।
मैंने उसे देखा और मेरे पैर अपने आप रुक गए। उसका दाहिना हाथ सफ़ेद रूमाल में बँधा था, सूखे गुलाबी दाग वाला रूमाल। उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो शाम को थी — वो घबराहट नहीं थी। कुछ और था। कुछ थका हुआ, कुछ टूटा हुआ, और कुछ ऐसा जो पहली बार सीधा दिख रहा था।
उसने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा।
फिर उसने मीरा के माइक की तरफ़ हाथ बढ़ाया।
मीरा ने एक पल सोचा, फिर माइक उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
बबलू ने माइक पकड़ा और उसमें कहा, धीमी आवाज़ में, पर साफ़ — "मैं गवाह हूँ। चोर नहीं।"
भीड़ एक पल चुप रही।
फिर हँसी फूट पड़ी।
वो हँसी गुस्से की नहीं थी। वो हँसी उस आदमी पर थी जो सालों से सबको डराता आया था और आज खुद डरा हुआ खड़ा था। और उस हँसी में कुछ ऐसा था जो किसी काग़ज़ से नहीं आता — वो हँसी सच से आती है, जब सच पहली बार किसी की ज़ुबान से निकलता है।
बबलू ने माइक वापस किया और अपनी जेब से पानदान निकाला, फिर रख दिया। जैसे उसे याद आया कि आज पान चबाने का दिन नहीं है।
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखकर कहा, "बबलू, तू आज अलग लग रहा है।"
"कैसे?" उसने पूछा।
"न बदबू आ रही है, न शोर।"
भीड़ फिर हँसी। बबलू ने कुछ नहीं कहा, बस सिर झुका लिया और चलता रहा।
हम अस्पताल के पिछले हिस्से में पहुँचे तो धूप सिर पर थी और हवा में सीमेंट की गंध थी। पीछे वाला हिस्सा वो जगह है जहाँ कोई नहीं आता — सूखी नाली, टूटी बाउंड्री, और पुराने लोहे के फाटक के पीछे वो कोना जहाँ से नूर अस्पताल की पिछली दीवार दिखती है।
और वहाँ, दीवार के साथ, वो पत्थर था।
नींव का पत्थर। मोटा, पुराना, काई लगा हुआ। उस पर कोई नाम नहीं था, कोई तारीख़ नहीं थी। पर उसी पत्थर में वो नकल चुनी गई थी जिसे डॉक्टर इसरानी ने सोलह-सत्रह की उम्र में अपने पिता के कहने पर रखा था।
और उस पत्थर के चारों तरफ़ ताज़ा सीमेंट लगा हुआ था।
मैंने देखा। ताज़ा सीमेंट — गीला नहीं, पर सूखा भी नहीं। उस पर उँगली रखने से निशान बन जाए। और उस सीमेंट के बीच, पत्थर का एक कोना उठा हुआ था। जैसे किसी ने उसे उठाने की कोशिश की हो, और फिर बीच में छोड़ दिया हो।
पत्थर के पास ज़मीन पर ताज़ा पैरों के निशान थे। दो जोड़े। एक बड़ा, एक छोटा।
और पत्थर के दाएँ कोने पर एक पतली लोहे की छड़ पड़ी थी — वही छड़ जिसका नुकीला सिरा सीमेंट में गड़ा हुआ था।
मैं झुककर बैठ गया।
मेरे पीछे पूरी गली खड़ी थी। कोई नहीं बोल रहा था। शबनम आपा की केतली उनके हाथ में थी और उनका हाथ कसा हुआ था। दुबे अंकल की छड़ी ज़मीन पर टिकी थी। कादिर ने अपनी कमर पर हाथ रखा और सामने देखा। शालिनी ने फाइल खोली और उसमें से वो आदेश निकाला, जैसे हाथ में हथियार हो।
पापा मेरे बगल में आए और उन्होंने हथौड़ा नीचे रख दिया।
"देर हो गई," उन्होंने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "देर नहीं हुई। वो पहुँच गए, बस।"
"फ़र्क़ क्या है?"
"फ़र्क़ ये है," मैंने कहा, "कि उन्होंने पत्थर उठाने की कोशिश की और छोड़ दी। इसका मतलब वो पूरा नहीं कर पाए। इसका मतलब कुछ अंदर है जो उन्हें मिला नहीं।"
पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ लौट आई जो सुबह आई थी — उम्मीद नहीं, बस एक ज़रूरत।
तभी उस्ताद अली बक्श आगे आए। वो धीरे चल रहे थे, उनकी उम्र के हिसाब से धीरे, और उन्होंने अपना मोटा चश्मा उतारकर कमीज़ में पोंछा। फिर वो पत्थर के पास झुके — इतने झुके कि उनका घुटना ज़मीन को छूने लगा।
उन्होंने अपना कान पत्थर के पास रखा।
पूरी गली चुप हो गई।
इतनी चुप्पी कि पीपल की पत्तियों की आवाज़ भी सुनाई दे रही थी। इतनी चुप्पी कि दूर किसी ट्रक का हॉर्न भी साफ़ लग रहा था।
उस्ताद ने आँखें बंद कीं।
फिर उन्होंने आँखें खोलीं और धीरे से कहा, "अंदर से आवाज़ आ रही है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"कैसी आवाज़?" मैंने पूछा।
वो उठे, अपनी कमर पकड़ी, और मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — डर नहीं, हैरानी नहीं, कुछ और। कुछ ऐसा जो पचास साल पुरानी याद से आता है।
"ऐसी आवाज़," उन्होंने कहा, "जैसे कोई काग़ज़ साँस ले रहा हो।"
मैंने पत्थर की तरफ़ देखा।
और उस वक़्त मेरी जेब में घंटी गरम हो गई। इतनी गरम कि मैंने कमीज़ के ऊपर से हाथ रख दिया।
मैंने उसे निकाला।
हथेली पर रखा।
और उसने कहा, बहुत धीमी आवाज़ में, बहुत करीब से, जैसे कान में कोई फुसफुसा रहा हो — "अब खोद।"
॥
मैंने घंटी को हथेली पर रखा और एक पल के लिए सोचा कि कहीं मैं सुन नहीं रहा जो सुन रहा हूँ।
"अब खोद।"
बस दो शब्द। न कोई तारीख़, न कोई नाम, न कोई डर। जैसे घंटी ने खुद भी यह सोच लिया हो कि अब कहने का वक़्त आ गया और कहने से पहले ही थक गई हो।
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
पूरी गली साँस रोके खड़ी थी। शबनम आपा के हाथ में केतली थी और उनकी उँगलियाँ उसके हत्थे पर सफ़ेद पड़ गई थीं। दुबे अंकल छड़ी पर झुके हुए थे, उनकी नीली शर्ट की आस्तीन हवा में थोड़ी हिल रही थी। कादिर कमर पर हाथ रखे सामने देख रहा था, जैसे एक पुलिस वाले को भी कभी-कभी यक़ीन के लिए दूसरों की आँखें चाहिए होंती हैं।
शालिनी ने फाइल खोली और उसमें से मुड़ा हुआ कोर्ट का आदेश निकाला। उसने उसे खोला नहीं, सिर्फ़ हाथ में ऊँचा रखा, जैसे कोई तलवार नहीं, एक सवाल उठाया हो।
और पापा — पापा मेरे बगल में खड़े थे, हथौड़ा नीचे रखे हुए। उनके हाथ की नसें अब भी फूली हुई थीं।
"दुबे अंकल," मैंने कहा। "आप बताइए। ये पत्थर हम तोड़ सकते हैं या नहीं?"
दुबे अंकल ने एक लंबी साँस ली। फिर उन्होंने अपनी छड़ी से ज़मीन पर एक लकीर खींची और उसी लकीर के भीतर पाँव टिकाकर खड़े हो गए।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं सिपाही था, जज नहीं। पर इतना जानता हूँ कि जब गली की ज़मीन पर गली के सत्तर आदमी खड़े हों, और उनके सामने एक पत्थर हो जिसे किसी ने खुरचा हो, तो सवाल ये नहीं उठता कि तोड़ें या नहीं।"
वो रुके।
"सवाल ये उठता है कि क्या हम उसे वापस रख पाएँगे।"
कुछ लोग हँसे। हल्की हँसी, डर के साथ मिली हुई। पर मुझे पता है दुबे अंकल मज़ाक नहीं कर रहे थे। वो सच कह रहे थे।
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा।
"उस्ताद, वो लोहे की छड़ दे दीजिए।"
उस्ताद ने छड़ उठाई। उनके हाथ काँप रहे थे — उम्र से नहीं, बोझ से। उन्होंने छड़ मेरी तरफ़ बढ़ाई और कहा, "अंदर से जो निकले, वो पहले मुझे दिखाना। मेरी आँखें ख़राब हैं, पर पचास साल पुरानी काग़ज़ की गंध अभी भी पहचान लेती हैं।"
मैंने सिर हिलाया।
पापा ने हथौड़ा उठाया।
"रुको," कादिर ने अचानक कहा। सब रुके। वो आगे आया और उसने अपनी जेब से एक छोटा काग़ज़ निकाला। "मैं गवाह हूँ। थाने का नंबर लिखा है और मेरा नाम। जो भी अंदर से निकलेगा, वो पहले इस काग़ज़ पर लिखा जाएगा, फिर उठाया जाएगा। कोई शिकायत करे तो उसके पास मेरा नाम होगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा और मेरे अंदर कुछ ऐसा हिला जो मैं नाम नहीं दे सकता। मैंने सोचा था आज सुबह तक कादिर सिर्फ़ वो आदमी था जो दरोगा की आवाज़ था। और अब वो पहला आदमी था जिसने काग़ज़ पर अपना नाम लिखवाया।
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