The Mysterious Bell – Chapter 1356
“मैं मंसूर चाचा का भतीजा हूँ,” उसने कहा। “हमारे चाचा ने आज सुबह दम तोड़ दिया। और उनके जाने से पहले उन्होंने मुझे यह दिया था।” उसने बक्सा आगे बढ़ाया। “कहा था — जिस लड़के के हाथ में घंटी है, उसे दे देना।”
मैंने बक्सा लिया।
और जैसे ही मेरे हाथ ने उसे छुआ, मेरी जेब से घंटी अपने आप बजी।
और उसकी आवाज़ ने कहा — “आ गया।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
और उस पल, उस छोटे-से बक्से के साथ मेरे हाथ में, मुझे लगा कि आज शाम जो होने वाला है, वो सिर्फ़ एक सभा नहीं होगी।
वो एक हिसाब होगा।
और जिस दिन हिसाब खुलता है, उस दिन सबको अपना-अपना हिस्सा बताना पड़ता है — चाहे वो अंगूठे का हो, चाहे आवाज़ का।
॥
बक्सा मेरे हाथ में था और भतीजा मेरी तरफ़ देख रहा था, जैसे कोई ज़रूरी बात कहने से पहले हिम्मत जुटा रहा हो।
“एक बात और कहने को कहा था चाचा ने,” उसने धीमे से कहा। “कहा था — बक्सा खुद खुलेगा। ज़ोर मत लगाना। और जिस दिन खुले, उस दिन अकेले मत खोलना।”
“अकेले क्यों नहीं?”
“यह नहीं बताया।” उसने कंधे उठाए। “चाचा जब कुछ नहीं बताते थे, तो उसका मतलब होता था कि बाकी बात खुद सामने आएगी।”
वो मुड़कर चलने लगा, फिर रुका।
“अंकुश भाई,” उसने कहा, “चाचा के जाने से पहले एक आदमी आया था उनसे मिलने। सफ़ेद कुर्ता, लकड़ी के जूते। मैंने दरवाज़े पर से देखा — चाचा ने उसे अंदर नहीं आने दिया। बस दरवाज़े की दरार से बात हुई। और जब वो गया, तो चाचा बहुत देर तक हाँफते रहे।”
मेरी जेब में घंटी ठंडी हो गई।
“उस आदमी ने क्या कहा, पता है?”
“नहीं। पर जाते वक़्त उसने दरवाज़े से एक लाइन कही — ‘तुम्हारी सारी चीज़ें हमारे हिसाब में दर्ज हैं।’”
वो चला गया।
दुबे अंकल ने अपनी लाठी की नोक ज़मीन पर टिकाई और एक लंबी साँस ली।
“मंसूर चाचा दो दिन पहले मुझसे मिलने आए थे,” उन्होंने कहा। “थाने में नहीं, बाहर। मेरी कुर्सी के पास बैठे थे। बोले थे — दुबे, एक बात याद रखना। जो काग़ज़ आदमी बंद करता है, वो काग़ज़ कभी बंद नहीं रहता। बस उसका वक़्त आना चाहिए।”
“और कुछ?”
“हाँ।” दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। “बोले थे — मेरे जाने के बाद एक बक्सा जाएगा तुम्हारे लड़के के पास। उस बक्से में मेरी नहीं, किसी और की याद है। और वो याद जिस दिन खुलेगी, उस दिन मेरा नाम भी उसमें होगा।”
“आपका नाम?”
“मेरा नाम,” उन्होंने कहा, “या मेरे जैसे उन सबका नाम, जो पचास साल से चुप बैठे हैं।”
मैंने बक्सा अंदर लाकर मेज़ पर रखा।
काजल ने दरवाज़ा बंद किया।
पापा उठकर आए और बक्से के सामने खड़े हो गए — बिना छुए, बस देखते हुए।
“पापा?”
“मैंने यह बक्सा पहले देखा है,” उन्होंने धीमे से कहा।
“कब?”
“पैंतीस साल पहले। मंसूर चाचा की दुकान पर। उस वक़्त यह बक्सा उनकी मेज़ के नीचे रखा था और उन्होंने मुझे इसकी तरफ़ देखने से मना किया था।”
मैंने बक्सा खोलने की कोशिश की।
ढक्कन ज़रा सा उठा और फिर रुक गया, जैसे अंदर से किसी ने पकड़ रखा हो।
घंटी मेरी जेब में ठंडी थी। मैंने उसे बाहर निकाला और बक्से पर रख दिया।
घंटी ने कहा — “अभी नहीं।”
“कब?”
“खुला काग़ज़ आने दे।”
“कौन-सा खुला काग़ज़?”
घंटी चुप हो गई।
काजल ने मेरा कंधा पकड़ा।
“अंकुश, बाहर दो आदमी हैं। सफ़ेद कुर्ता। न तो अंदर आ रहे हैं, न जा रहे हैं।”
मैंने खिड़की से झाँका।
गली के मोड़ पर दो आदमी खड़े थे। एक के हाथ में फाइल थी, दूसरे के हाथ में कुछ नहीं। दोनों एक ही दिशा में देख रहे थे — यानी मेरी दुकान की तरफ़।
“चंद्रेश के आदमी हैं,” मैंने कहा।
“शालिनी को बुलाएँ?” काजल ने पूछा।
“बुलाओ।”
शालिनी दस मिनट में आ गई। वो सीधे बक्से के पास गई, उसे देखा, फिर मेरी तरफ़ पलटी।
“मैंने इस तरह के तीन बक्से अपने पापा के गोदाम में देखे हैं,” उसने कहा। “दो खुले थे। एक बंद था। और खुले दोनों में सिर्फ़ पुराने काग़ज़ थे — कोई ज़मीन, कोई स्टांप, कुछ नहीं। सिर्फ़ हिसाब।”
“हिसाब?”
“नाम, रकम, तारीख़। और हर पन्ने के नीचे एक लाइन — ‘बाकी’।”
काजल ने कहा, “यानी उन सबका हिसाब जो अब तक बाकी है।”
शालिनी ने सिर हिलाया।
“पर एक बात और है,” उसने कहा। “उन दो खुले बक्सों की तरह यह बक्सा नहीं है। यह भारी है। असली भारी। इसमें सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है।”
मैंने फिर ढक्कन उठाने की कोशिश की। वही रुकावट।
घंटी ने कहा — “खुला काग़ज़।”
“कहाँ का खुला काग़ज़?”
“जो एक ही जगह से दो जगह गया है।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
पापा की आँखें सिकुड़ी हुई थीं।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मुझे रणवीर के दफ़्तार जाना है।”
“क्या?”
“अकेले।” उन्होंने अपनी आवाज़ स्थिर रखी, जैसे यह बात बहुत पहले तय कर चुके हों। “तू मत आना।”
“पापा, आप क्या कह रहे हैं — अभी वो आदमी आपका…”
“मैंने उसके सामने कह दिया था,” उन्होंने मेरी बात काटी, “कि मैं आज शाम सबके सामने अपना अंगूठा कबूल करूँगा। तो कबूलने से पहले एक बार उससे मिलना तो बनता है।”
“अकेले क्यों?”
पापा ने मेरी आँखों में देखा।
“क्योंकि जो बात दो आदमियों के बीच होती है,” उन्होंने कहा, “वो दो आदमियों के बीच ही रहनी चाहिए। तू आएगा तो बात बदल जाएगी।”
“पापा…”
“अंकुश।” उनका हाथ मेरे सिर पर आया, जैसे बरसों पहले आता था। “मैं बाईस साल से एक काग़ज़ के नीचे बैठा हूँ। आज उस काग़ज़ को बाहर निकलना है। और उसे बाहर निकालने वाला हाथ मेरा होना चाहिए।”
वो चले गए।
काजल दरवाज़े तक गई और दूर से आते उनके पीछे देखती रही।
“अंकुश,” उसने कहा, “मुझे डर लग रहा है। ऐसा पापा ने पहले कभी नहीं कहा।”
“मुझे भी।”
शालिनी ने अपना बैग उठाया।
“मैं थाने चल रही हूँ,” उसने कहा। “दुबे अंकल और कादिर से बात करनी है। अगर चंद्रेश आज कुछ और काग़ज़ भेजे, तो उसका जवाब काग़ज़ से नहीं, रजिस्टर से देना होगा।”
“कौन-सा रजिस्टर?”
शालिनी मुड़ी।
“थाने का,” उसने कहा। “जिसमें कल तुम्हारे पापा ने अपना कबूलनामा दर्ज कराया था। अगर हम उस कबूलनामे की नकल निकलवा लें, तो चंद्रेश का हर नया काग़ज़ पुराना पड़ जाएगा।”
“और वो नकल देगा कौन?”
शालिनी मुस्कुराई — पहली बार उसके चेहरे पर वो मुस्कान आई जो डर से नहीं, चालाकी से बनी थी।
“दुबे अंकल,” उसने कहा। “और जो उनसे नहीं देगा, वो कादिर देगा।”
थाने के बाहर दोपहर की धूप तेज़ थी और दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर यूँ बैठे थे जैसे कुछ हुआ ही न हो।
“अंदर आओ,” उन्होंने कहा। “पर ज़्यादा देर नहीं।”
अंदर कोई नहीं था। दरोगा अपने कमरे में नहीं थे।
“दरोगा साहब कहाँ हैं?”
“कल के काग़ज़ की तलाश में,” दुबे अंकल ने कहा। “पर उसे काग़ज़ मिलेगा नहीं, क्योंकि काग़ज़ उसके ही दराज़ में है और चाबी उसकी ही जेब में।”
“कैसे पता?”
“यह मत पूछो।” उन्होंने आँखों में देखा। “यह शहर अगर दो चीज़ों पर चलता है, तो एक काग़ज़ पर और दूसरा उम्मीद पर। और उम्मीद काग़ज़ से पुरानी होती है।”
शालिनी ने अपनी बात रखी।
दुबे अंकल कुछ देर चुप बैठे। फिर उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी नीली कवर वाली कॉपी निकाली।
“यह मेरी अपनी कॉपी है,” उन्होंने कहा। “थाने की नहीं। थाने की चीज़ें कभी-कभी थाने में नहीं रहतीं।”
उन्होंने पन्ना पलटा।
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