The Mysterious Bell – Chapter 1355
और मैं उस वक़्त यह नहीं समझ पाया कि घंटी ने मुझे क्या बताया था। पर कुछ दिन बाद, जब सब कुछ खुला, तब मुझे याद आया यह लम्हा — और मैं सोचता रहा कि अगर मैं उस वक़्त समझ गया होता, तो क्या कोई चीज़ बदल गई होती?
मीरा को लेकर मैं टेम्पो पकड़कर गली की तरफ़ निकला। रास्ते में मीरा फुसफुसाती रही, सिर्फ़ अपनी ही सुनाई देने वाली आवाज़ में, “अगर वो पन्ना सबके सामने आ गया, अंकुश, तो रणवीर का कोई भी काग़ज़ अब झूठ नहीं कह सकेगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि झूठ को ज़िंदा रहने के लिए सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए — पूरा काग़ज़।”
हम गली की तरफ़ चले और रास्ते में एक बात मुझे बार-बार खटक रही थी — पापा ने रजिस्टर में पहले लिखा या मोहर पहले लगी थी?
और उस सवाल का जवाब मिलने से पहले ही, गुमटी पर शबनम आपा मिलीं, और उन्होंने मेरा हाथ पकड़कर खींचा।
“अंकुश, तेरे पापा यहाँ से गुज़रे थे।”
“कब?”
“करीब घंटे भर पहले। और उन्होंने मुझसे सिर्फ़ एक चीज़ माँगी थी — गर्म पानी का गिलास।”
“गर्म पानी?”
“हाँ,” शबनम आपा ने कहा। “और उसमें मैंने देखा — उनके हाथ काँप रहे थे। ऐसे नहीं जैसे बुखार में काँपते हैं। जैसे कोई आदमी अपनी ही हिम्मत को गले से उतारकर पी रहा हो।”
मैंने उनका हाथ छोड़ा और दुकान की तरफ़ तेज़ कदम बढ़ा दिए।
दुकान का शटर खुला था और भीतर से एक दीये जैसी हल्की पीली रोशनी आ रही थी।
मैं अंदर गया।
पापा पीछे वाले हिस्से में, पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठे थे। उनके सामने मेज़ पर रजिस्टर खुला था। उनका हाथ उस पन्ने पर था, जिस पर लाल स्याही में कुछ लिखा था। और उनकी आँखें — उनकी आँखें ऐसी थीं जैसे उन्होंने बहुत लंबे वक़्त बाद कोई बहुत ज़रूरी काम कर लिया हो।
“पापा,” मैंने कहा।
वो उठे नहीं। उन्होंने सिर्फ़ सिर उठाया और मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा। “बैठ जा।”
मैं बैठ गया।
वो मेरी तरफ़ देख रहे थे, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — शर्म नहीं, डर नहीं। कुछ और। कुछ ऐसा जैसे किसी आदमी ने बहुत भारी बोझ उतार दिया हो और अब उसे उठाने की हिम्मत न हो।
“पापा,” मैंने फिर कहा, “आप भवन गए थे।”
“हाँ।”
“क्यों?”
उन्होंने रजिस्टर की तरफ़ देखा।
“क्योंकि वो मुझे बुला रहा था।”
“कैसे?”
“पर्ची भेजकर,” पापा ने कहा। “उसमें लिखा था — शंकर यादव, आज शाम से पहले। कोई नाम नहीं, कोई मुहर नहीं। बस एक तारीख़ और एक जगह। और मैंने उसे पहचान लिया।”
“कैसे पहचाना?”
“क्योंकि मैंने उस आदमी से बाईस साल पहले भी ऐसी ही पर्ची ली थी,” पापा ने कहा। “उस वक़्त मैंने पर्ची पढ़कर अंगूठा लगा दिया था। इस बार मैंने पर्ची पढ़कर चाबी उठाई।”
मैंने उनके हाथ की तरफ़ देखा। उनकी हथेली में एक छोटी, पुरानी चाबी थी।
“यह किसकी है?”
“तेरे दादा की,” पापा ने कहा। “और अब यह उस आदमी के सामने रखी है।”
“कहाँ?”
पापा ने रजिस्टर बंद किया। उन्होंने उसे अपनी छाती से लगाया।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मैंने आज उसके सामने एक बात कही थी और वो बात मैंने पहली बार किसी के सामने कही थी।”
“क्या कही?”
“मैंने कहा — रणवीर भारद्वाज, मैं तुम्हारे सामने कोई काग़ज़ नहीं छिपाऊँगा। और मैं तुम्हारे सामने अंगूठा भी नहीं लगाऊँगा। मैं आज शाम उस मैदान में अपना अंगूठा सबके सामने बताऊँगा।”
मैंने उनकी आँखों में देखा।
“और उसने क्या कहा?”
पापा ने थोड़ी देर सोचा। फिर बोले, “पहले हँसा। फिर मुझे अस्पताल की याद दिलाई। फिर मेरी दुकान की। फिर काजल की पढ़ाई की।”
“और आपने?”
“मैंने कुछ नहीं कहा,” पापा ने कहा। “मैं उठा, चाबी उसकी मेज़ पर रखी, और लौट आया।”
“आपने चाबी क्यों दी?”
पापा ने मेरी तरफ़ देखा।
“क्योंकि,” उन्होंने कहा, “चाबी देने का मतलब यह नहीं कि मैंने कोई हक़ छोड़ दिया। कभी-कभी चाबी देने से आदमी को यह याद रहता है कि ताला उसका था। और जो ताला अपना था, उसका हिसाब भी अपना ही होता है।”
मैं कुछ कहने वाला था कि तभी काजल दरवाज़े पर आई। उसके हाथ में माँ का फोन था।
“अंकुश,” उसने कहा, “माँ फोन पर हैं।”
मैंने फोन लिया।
“माँ?”
“अंकुश,” माँ ने कहा, “मैंने तेरे पापा का रजिस्टर देखा है।”
“माँ—”
“और उस पन्ने पर लिखी बात,” माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, “मैंने पहले कभी नहीं पढ़ी। पर उसे पढ़कर मुझे समझ आया कि तेरे पापा आज सुबह से क्यों गायब थे।”
“क्या लिखा है?”
“नहीं,” माँ ने कहा। “मैं तुझे फोन पर नहीं बताऊँगी। तू घर आ। और जब तू आए, तो मेरे साथ बैठ।”
फोन रख दिया।
मैंने काजल की तरफ़ देखा। काजल ने मेरी तरफ़ देखा।
“काजल,” मैंने कहा, “तूने माँ को बताया?”
“हाँ,” काजल ने कहा, और उसकी आँखों में आँसू थे। “मुझे लगा कि माँ को पता होना चाहिए।”
मैंने उसका हाथ पकड़ा।
“डर मत,” मैंने कहा। “अब तक तो हम सब कुछ अंधेरे में कर रहे थे। अब कुछ रोशनी में आ गया है।”
काजल ने सिर हिलाया। फिर बोली, “अंकुश, उस पन्ने पर एक बात और थी जो मैंने तुझे नहीं बताई।”
“क्या?”
“पन्ने के नीचे, लाल स्याही में लिखे हुए सबसे आख़िरी शब्द थे — साइकिल की घंटी और उसकी जीभ।”
मेरा हाथ घंटी की तरफ़ गया।
घंटी मेरी जेब में ठंडी थी, पर उस पर एक पतली लकीर धीरे-धीरे गरम हो रही थी।
“अंकुश,” काजल ने कहा, “क्या पापा इस वक़्त भी हमें कुछ नहीं बता रहे?”
मैंने पापा की तरफ़ देखा। वो अब भी उसी कुर्सी पर बैठे थे, रजिस्टर उनकी गोद में बंद, और उनके चेहरे पर वो चुप्पी थी जो बोलने से ज़्यादा कुछ कहती है।
“पापा,” मैंने कहा, “अब रुकिए। अब बहुत हो गया।”
पापा ने धीरे से सिर उठाया।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मैंने उसके सामने जो कहा था, वो कह दिया। पर अभी सबके सामने नहीं कहा।”
“वो आज शाम।”
“हाँ।”
“और उससे पहले?”
पापा ने रजिस्टर मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“इससे पहले,” उन्होंने कहा, “तू इसे पढ़। और जो भी समझ आए, मुझे बता।”
मैंने रजिस्टर खोला। उस पन्ने पर लिखी बात मैंने पढ़ी — लाल स्याही में, बड़ी मेहनत से लिखे अक्षरों में। और जैसे ही मैंने वो लाइन पढ़ी, मेरे हाथ से घंटी फिसलकर मेज़ पर गिर गई।
वो अपने आप बजी।
और उसकी आवाज़ ने कहा — “अब तीनों आ गए।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“तीनों कौन?”
पापा ने मेरी आँखों में देखा।
“पता नहीं,” उन्होंने कहा। “पर जब तेरी माँ आज शाम वो काग़ज़ लेकर मैदान में आएगी, तो तीनों सामने होंगे — तेरा दादा, तू और मैं।”
“माँ कौन-सा काग़ज़ लाएगी?”
पापा ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने सिर्फ़ अपनी जेब से एक पुरानी मुड़ी पर्ची निकाली और मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
मैंने उसे खोला।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन थी — “जो हिसाब आज तक बंद था, वो आज शाम खुलेगा। और खुलने की चाबी उसी आदमी के पास है जिसने इसे बंद किया था।”
मैंने पापा की तरफ़ देखा।
“यह लिखाई किसकी है?”
पापा ने धीरे से कहा, “जिसकी लिखाई है, वो आज शाम आएगा।”
काजल ने तभी दरवाज़े की तरफ़ देखा।
“अंकुश, बाहर दुबे अंकल हैं। और उनके साथ कोई और भी है।”
मैं बाहर गया।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर खड़े थे, और उनके बगल में खड़ा था एक आदमी — सत्तर के आसपास, सफ़ेद कुर्ता, लाल धागा बँधी कलाई, और हाथों में एक पुरानी लकड़ी का बक्सा।
“अंकुश यादव?” उसने पूछा।
“हाँ।”
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