The Mysterious Bell – Chapter 1354
“तो?”
“तो उस जगह पर रख देना जहाँ सबसे ज़्यादा लोग जाते हैं।”
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने मुझे देखा।
“पीपल,” हम दोनों ने एक साथ कहा।
उस आदमी ने सिर हिलाया। “हाँ। पीपल। मुझे नहीं पता था कि यहाँ पीपल किस चीज़ के लिए मशहूर है, पर जिसने कहा, वह जानता था।”
और फिर वो मुड़ गया, फाइल काँख में दबाकर चला गया।
मैं धूप में खड़ा रह गया, और मेरी हथेली में वो पर्ची जल रही थी। यह एक काग़ज़ नहीं था। यह एक जाल था — पापा की तरफ़ बढ़ाया हुआ जाल। रणवीर ने पापा को घर नहीं बुलाया। उसने पापा को बहुत चालाकी से बुलवाया — पहले घर, फिर दुकान, फिर पीपल। ताकि पूरी गली देख ले कि “शंकर यादव का काग़ज़ आया है।”
“अंकुश,” माँ ने कहा, “पापा कहीं जा रहे हैं।”
“हाँ,” मैंने कहा, “और मुझे पता है कहाँ।”
“मैं साथ चलूँगी।”
“नहीं, माँ। तू घर चल।” मैंने उनकी तरफ़ देखा। “तू अभी कमज़ोर है, और अगर तू वहाँ पहुँची और उसने तुझे देख लिया, तो वो पापा को और फँसाएगा। तू घर पर रह। काजल भी तेरे पास रहेगी।”
“और तू?”
“मैं थाने जाऊँगा,” मैंने कहा। “कादिर ने सात बजे आने का वादा किया था। मुझे इंतज़ार करना है।”
माँ ने मेरी आँखों में देखा। लंबे वक़्त तक।
फिर उन्होंने अपनी पोटली से एक छोटी-सी चीज़ निकाली। माँ की नानी की पीतल की चम्मच। वो मेरी हथेली पर रखी और उन्होंने कहा, “जब तू अपने पापा से मिले, तो यह उन्हें दे देना। और कहना माँ ने भेजी है। बाक़ी वो खुद समझ जाएँगे।”
चम्मच मेरी जेब में चली गई, और मैं थाने की तरफ़ चल दिया। रास्ते में मेरे साथ सिर्फ़ मीरा थी। बबलू को मैंने शबनम आपा की गुमटी पर छोड़ दिया, ताकि वो वहाँ बैठकर अपने हिसाब की बातें ठीक कर सके। शालिनी अस्पताल गई थी, कुछ काग़ज़ देखने।
थाने पहुँचा, तो दुबे अंकल अपनी कुर्सी पर बैठे थे। उन्होंने मुझे देखा, और बिना कुछ कहे अपनी कुर्सी की तरफ़ इशारा किया। मैं बैठ गया।
मैं बैठा था, पर मेरा दिल वहाँ नहीं था। मेरा दिल उस औरत के पास था जो मेरी माँ थी, और उस आदमी के पास जो मेरे पापा थे। मैं खिड़की से बाहर देख रहा था — पीपल की तरफ़, गली की तरफ़, उस मोड़ की तरफ़ जहाँ से कोई भी आ सकता था।
कादिर मेरे पास आया। चुपचाप। उसने अपनी छोटी कुर्सी खींची और मेरे बगल में बैठ गया।
“तुझे कुछ बताना है,” उसने कहा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“दोपहर में,” उसने कहा, “करीब दो बजे, एक आदमी भारद्वाज भवन के अंदर गया था।”
“कौन?”
“बता नहीं सकता,” कादिर ने कहा। “पर उसके पास पुराना कुर्ता था। फटा हुआ नहीं, पर पुराना। और हाथ में एक चाबी थी।”
मेरा दिल धड़का।
“कैसी चाबी?”
कादिर ने हाथ से इशारा किया, “छोटी, पुरानी, काली। जैसे किसी संदूक की हो।”
मेरे साँस रुक गई।
“वो मेरे पापा थे,” मैंने कहा।
कादिर ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में एक पल के लिए कुछ चमका — शायद डर, शायद तरस, शायद वो चीज़ जो एक सिपाही के भीतर भी होती है जब वो किसी बेटे को उसके बाप के बारे में बताता है।
“मुझे लगा था,” उसने कहा। “इसीलिए बताया।”
“वो अंदर कितनी देर रहे?”
“पता नहीं। पर बाहर आते वक़्त उनका चेहरा ऐसा था जैसे वो किसी से हारकर आ रहे हों, या किसी को हराकर। पता नहीं कौन-सा।”
मैं उठ खड़ा हुआ। “मुझे जाना है।”
“तू जाना चाहता है, तो जा,” कादिर ने कहा। “पर सुन, अंकुश। भवन के बाहर आज सुबह से दो लोग बैठे हैं। वो हर उस आदमी की शक्ल देख रहे हैं जो अंदर जाता है और बाहर आता है। अगर तू वहाँ गया, तो वो तुझे देख लेंगे। और फिर तेरे पापा पर और भारी इल्ज़ाम लगेगा।”
मैं रुका।
“तो मैं क्या करूँ?”
कादिर ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। “तू यहाँ रुक। मैं बाहर जाकर खबर लाता हूँ। अगर वो घर लौट आए हैं, तो मैं तुझे बताऊँगा। अगर वो घर नहीं गए, तो मैं उन्हें ढूँढकर लाऊँगा।”
“और अगर वो न मिलें?”
“तो मैं खुद उनकी तरफ़ से तेरी माँ को जवाब दूँगा,” कादिर ने कहा। और उसकी आवाज़ में वो सच्चाई थी जो सिर्फ़ उन लोगों के पास होती है जिन्होंने बहुत कम उम्र में बहुत कुछ देख लिया हो।
कादिर चला गया। मैं वहीं बैठा रहा। मीरा मेरे पास आकर बैठी।
“अंकुश,” उसने कहा, “मैंने आज सुबह एक बात सुनी थी, और वो मुझे अब तक परेशान कर रही है।”
“क्या?”
“एक आदमी कह रहा था कि भवन में आज सुबह कोई पुराना काग़ज़ निकाला गया है। न जाने कहाँ से। पर यह नहीं बता रहा था कि कौन-सा काग़ज़ है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“तू क्या कह रही है?”
“मैं कह रही हूँ,” मीरा ने कहा, “कि अगर पापा वहाँ गए थे, तो वो कुछ लेने नहीं गए थे। वो कुछ देने गए थे। या कुछ छोड़कर आए थे।”
“क्या छोड़कर आए?”
मीरा ने अपने कंधे उठाए। “यही तो मैं सोच रही हूँ।”
वक़्त बीत रहा था। दुबे अंकल ने मुझे चाय पिलाई और मैंने मना किया, पर उन्होंने हाथ में पकड़ा ही रखा। “पी ले बेटा। जो आदमी भूखा रहता है, वो गुस्से में ज़्यादा सोचता है।” मैंने पी ली।
अंधेरा होने लगा था, जब मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा।
“अंकुश,” उसने कहा, “तेरा फोन।”
मैंने जेब से फोन निकाला। स्क्रीन पर काजल का नाम था।
“काजल?”
“अंकुश,” काजल की आवाज़ काँप रही थी। “पापा आ गए।”
मैं सीधा खड़ा हो गया।
“कब?”
“अभी। दुकान पर आए और सीधे पीछे वाले हिस्से में बैठ गए। मैं उन्हें कुछ बोलने गई, तो उन्होंने सिर्फ़ एक बात कही — मुझे अकेला छोड़ दे।”
“तू क्या कर रही है?”
“मैं बाहर खड़ी हूँ,” काजल ने कहा। “पर अंकुश, उन्हें देखकर डर लग रहा है। वो इतने शांत हैं कि जैसे कुछ हुआ ही न हो। माँ रसोई में है, और मैं उन्हें इस तरह नहीं देख सकती।”
“मैं आ रहा हूँ। तू वहीं रुक।”
“रुक,” काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जिसने मुझे रोक दिया। “एक बात पहले सुन।”
“क्या?”
वो रुकी। फिर बोली, “पापा ने रजिस्टर खोला है।”
“कौन-सा रजिस्टर?”
“वही पुराना रजिस्टर। जो दुकान के पीछे वाले हिस्से की अलमारी में पड़ा था। और उन्होंने उसके आख़िरी पन्ने पर कुछ लिखा है। लाल स्याही से।”
मेरा हाथ ठंडा हो गया।
“क्या लिखा है?”
“मैं पढ़ने नहीं गई,” काजल ने कहा। “पर उस पन्ने पर एक चीज़ और है, अंकुश। और वो चीज़ मुझे सबसे डरा रही है।”
“क्या?”
“उसी पन्ने पर, नीचे कोने में, एक गोल मोहर है। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की मोहर। मैंने उसे पहचान लिया। इतना ही नहीं — मोहर के ऊपर रणवीर भारद्वाज के हस्ताक्षर भी हैं।”
मेरे हाथ से फोन फिसलने लगा।
मीरा ने मुझे देखा।
“अंकुश?”
“पापा ने उस काग़ज़ पर लिखा है,” मैंने धीरे से कहा, “जिस पर रणवीर के पहले से ही हस्ताक्षर हैं।”
मीरा की आँखें बड़ी हो गईं।
“तो वो काग़ज़…”
“वो काग़ज़,” मैंने कहा, “अब दो हाथों से होकर गुज़र चुका है। पहले रणवीर का हाथ, अब पापा का। और जिस काग़ज़ पर दोनों हाथ हों, वो अब हमारा हो या उसका, यह सिर्फ़ वो ही बता सकता है जो उस पर सबसे आख़िर में लिखा गया है।”
मैंने घंटी उठाई।
वो ठंडी थी। और मैंने उसे हिलाया नहीं।
फिर भी आवाज़ आई।
“अंकुश। जो काग़ज़ दो हाथों से गुज़रा है, उस पर तीसरा हाथ भी होता है। और तीसरा हाथ सबसे ऊपर होता है — गवाह का।”
“कौन?”
घंटी चुप हो गई।
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