The Mysterious Bell – Chapter 1353
माँ। माँ ने कुछ लिखा है। किसी और के लिए लिखा है।
और जिस काग़ज़ को खोजने के लिए पूरी गली आज शाम मैदान में जा रही है, उसका एक टुकड़ा मेरी माँ के हाथ में है। इससे बड़ा और क्या हो सकता है हमारी कहानी में — कि सबसे बड़ा सबूत वो नहीं है जो रणवीर के पास है, वो भी नहीं जो हम ढूँढ रहे हैं — वो है जो मेरी माँ ने लिखा है, और जिसे उन्होंने मुझे सबसे आख़िर में सुनाने का फ़ैसला किया।
मैंने कादिर की तरफ़ देखा।
"कादिर भाई, माँ कहाँ हैं?"
"गली में," उसने कहा। "अस्पताल के गेट पर बैठी हैं। कहती हैं कि जब तक अंकुश बाहर नहीं आता, मैं वहाँ से नहीं उठूँगी।"
"मुझे बाहर निकलना है," मैंने कहा।
कादिर ने दरवाज़े की तरफ़ देखा।
"रोका हुआ नहीं है," उसने कहा। "रोक काग़ज़ी थी, और वो काग़ज़ अब दराज़ में बंद है।" उसने एक पल रुककर कहा। "पर अंकुश — दरोगा ने कहा है कि तू जाते वक़्त मेज़ पर हाथ नहीं लगाएगा। और मैंने उससे कहा है कि तेरे दस्तख़त से इतना भरोसा मेरा है।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
बस घंटी जेब में रखी, मीरा की कलम अपनी कमीज़ में खोंसी, और बाहर निकल गया।
मीरा ने मुझे जाने से पहले पकड़ा।
"अंकुश," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो पहली बार उसकी अपनी थी, किसी खबर की नहीं। "मेरी ज़मानत हो गई है। दरोगा ने कहा कि वो मुझे जाने देगा। पर मैं नहीं जाऊँगी।"
"मीरा—"
"सुन।" उसने मेरी आस्तीन पकड़ी। "मैं गली की आवाज़ हूँ, अंकुश। और आवाज़ थाने की दीवार के भीतर नहीं रहती। मैं बाहर जाऊँगी — पर आजाद आदमी बनकर नहीं, गवाह बनकर। और मैं कल से तेरा हर कदम रिकॉर्ड करूँगी। मेरा फोन ज़ब्त है, पर मेरे पास यह है।"
उसने अपना छोटा नीला कार्डबोर्ड माइक उठाया, जो टिंकू ने बनाया था।
"यह चलेगा?" मैंने पूछा।
"नहीं चलेगा," उसने कहा। "पर जब सबके हाथ में कैमरा हो, तो एक काग़ज़ का माइक भी आवाज़ की जगह ले लेता है। मुझे बस सही जगह खड़ा होना है।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन, सच में हँसा।
"ठीक है," मैंने कहा। "पर अंदर जाने से पहले मुझे तेरे माइक की शपथ चाहिए — तू काग़ज़ के लिए झूठ नहीं बोलेगी।"
"मैं पत्रकार हूँ," उसने कहा। "झूठ बोलने से पहले मेरी परीक्षा होती है।" फिर उसने धीरे से कहा — "और अंकुश, अब मुझे भी उस सच के साथ जीना है जो मैंने पाँच साल पहले दबाया था। रमा मैडम को मैं आज शाम नहीं मिल पाऊँगी, तो कल सुबह। उनके घर जाकर। माफ़ी माँगने।"
मैंने सिर हिलाया और बाहर चला आया।
बाहर धूप थी और धूप में वो सब चीज़ें थीं जो सुबह हमेशा साफ़ दिखती हैं, पर शाम होते-होते टेढ़ी हो जाती हैं। अस्पताल का गेट, उसका उतरा हुआ पीला रंग, नीम की छाया, और उस छाया में कुर्सी पर बैठी माँ।
उनके हाथ में काग़ज़ था।
जब उन्होंने मुझे देखा, तो वो उठीं — अब वो पहले जैसी तेज़ नहीं उठतीं, पर उठीं। और मेरी तरफ़ बढ़ीं, और फिर रुककर मेरे कुर्ते का कॉलर ठीक किया, जो कोई ज़रूरी नहीं था, पर माँ के हाथ बेकार नहीं रह सकते।
"माँ," मैंने कहा। "वो काग़ज़ क्या है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो आँसू नहीं था जो पहले दिखता था। वो कुछ और था — पुराना, सूखा, और हिसाब में बैठा हुआ। जैसे किसी के घर की नींव से पानी निकल जाए और नीचे की ईंटें दिखने लगें।
"यह काग़ज़ नहीं है, बेटा," उन्होंने कहा। "यह हिसाब है। और आज शाम, मैं इसे उसी मैदान में ले जाऊँगी।"
"माँ—"
"नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो बुखार में भी नहीं मरती। "बाईस साल मैंने तेरे पापा को देखा कि वो अपने भीतर सब दबाकर जी रहे हैं। आज उन्होंने कुछ लिखा। और मैंने भी लिखा।" उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी। "जो हिसाब बेटे के हाथ में नहीं जाता, वो माँ के हाथ में जाता है। और मैं तुझे सिर्फ़ एक बात कहूँगी, अंकुश — तेरी माँ जो लिखेगी, वो हमेशा के लिए लिखेगी।"
काजल वहीं खड़ी थी।
उसके हाथ में काग़ज़ नहीं था। उसके हाथ में टिफ़िन था, और वो टिफ़िन काँप रहा था।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
काजल ने पहले माँ की तरफ़ देखा, जैसे इजाज़त माँग रही हो।
फिर बोली — "पापा ने रजिस्टर के उस पन्ने पर सिर्फ़ लिखा नहीं है, अंकुश। उन्होंने पन्ने के नीचे एक तारीख़ भी डाली है। और वो तारीख़ आज है।"
मैंने घंटी उठाई।
"आज क्या है?"
काजल ने टिफ़िन दोनों हाथों से पकड़ा।
"आज," उसने कहा, "उस पन्ने के हिसाब से, गली का सबसे बड़ा हिसाब बंद होता है। पापा ने उसके नीचे लिखा — आज शाम सबके सामने।"
मैंने साँस ली।
घंटी मेरी हथेली में ठंडी थी, पर उस पर एक पतली लकीर धीरे-धीरे गरम हो रही थी — जैसे वो भी जानती हो कि आज शाम सिर्फ़ गली का नहीं, उसका भी हिसाब खुलेगा।
और तभी, जैसे किसी ने उस धूप में भी एक बादल रख दिया हो, अस्पताल के गेट से साया आगे बढ़ा।
एक आदमी था। साठ के आसपास, पीले सफ़ेद कुर्ते में, हाथ में पुरानी फाइल, और आँखों में वो चीज़ जो सिर्फ़ दफ़्तर में बैठने वालों के पास होती है — काग़ज़ की गंध।
उसने़ माँ की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। और फिर वो बोला — "शंकरवो आदमी जो बोल रहा था, आधे शब्द पर रुक गया। जैसे किसी दफ़्तर की फाइल खुली रह गई हो और हवा ने उसे बंद कर दिया हो।
“शंकर…” उसने फिर कहा, इस बार पूरा नाम नहीं निकला। “शंकर यादव। यही नाम है ना? जिसका काग़ज़ बाक़ी है।”
माँ के हाथ से पोटली फिसलने लगी। मैंने तुरंत उनका हाथ सँभाला।
“आप कौन हैं?” मैंने पूछा। “और कौन-सा काग़ज़?”
उसने अपनी पुरानी फाइल खोली, और उसमें से एक पीली पर्ची निकालकर मेरी तरफ़ बढ़ाई। पर्ची पर बस तीन लाइनें थीं — नाम, तारीख़, और नीचे एक छोटी-सी लाल मुहर। मैंने गौर से देखा। मुहर पर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन लिखा था।
“मैं उस दफ़्तार से हूँ,” उसने कहा, “जहाँ से काग़ज़ इधर-उधर होते हैं। मेरा काम सिर्फ़ काग़ज़ पहुँचाना है। यह पर्ची आज सुबह उस दफ़्तार में आई थी, जहाँ से गली की ज़मीन का हिसाब चलता है। और मुझे कहा गया कि यह पर्ची शंकर यादव के घर पहुँचा दी जाए।”
मैंने पर्ची को उलटा-पलटा। पीछे की तरफ़ सिर्फ़ एक लाइन थी — “आज शाम से पहले हस्ताक्षर।”
“हस्ताक्षर किस बात के?” मैंने पूछा।
“मैं काग़ज़ पढ़ने वाला आदमी नहीं हूँ, बेटा,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी बेचैनी थी, “पर मैं इतना जानता हूँ कि जिस काग़ज़ पर इतनी मुहरें हों, वो काग़ज़ किसी को बहुत महँगा पड़ता है।”
मीरा ने पर्ची मेरे हाथ से ले ली और ठीक उसी तरह पढ़ी जैसे वो पढ़ती है — जल्दी, पर हर लफ़्ज़ को मुँह में दबा कर।
“अंकुश,” वो बोली, “यह पर्ची आज की है। और इसमें पापा का नाम पहले लिखा है।”
“मतलब?”
“मतलब यह कि आज सुबह से कोई पापा को ढूँढ रहा है भी, तो इस काग़ज़ के ज़रिए।”
मैंने वो पर्ची अपनी जेब में रखी और उस आदमी की तरफ़ देखा।
“तुम्हें क्या कहा गया? पर्ची घर पहुँचा दो, बस?”
“हाँ, बस।”
“और अगर घर में कोई न मिले तो?”
वो थोड़ा हिचका। “तो… तो मुझे कहा गया कि दुकान पर दे आना।”
“दुकान पर क्यों?”
“क्योंकि वहाँ किसी को पता चलेगा,” उसने कहा, और मुझे लगा जैसे उसने बहुत पहले सोची हुई बात अनायास कह दी हो, “और अगर दुकान पर भी कोई न मिले तो…” वो रुक गया।
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