The Mysterious Bell – Chapter 1352
"ठीक है," उसने कहा। "पर एक बात और है।" उसने भीतर की जेब से दूसरा काग़ज़ निकाला। "यह मुझे दरोगा के सामने से मिला। चंद्रेश सक्सेना ने आज रात के लिए दो आदमी भेजे हैं। नूर अस्पताल की तिजोरी खुलवाने।"
मैं सीधा खड़ा हो गया।
"तिजोरी?"
"जिसमें डॉक्टर इसरानी ने कहा था — अस्पताल की ज़मीन का असली काग़ज़ है।" शालिनी ने काग़ज़ मोड़ा। "यह उन्हीं की लिखाई है, अंकुश। यह उनका अपना काग़ज़ नहीं है। यह उस चंद्रेश का है जो दो दिन पहले अस्पताल की ज़मीन का सार्वजनिक विकास हेतु अधिग्रहण करने का नोटिस लेकर आया था।"
मैंने घंटी उठाई। वो अब भी ठंडी थी। पर उसमें ख़ामोशी अब वो ख़ामोशी नहीं थी जो सोती है। वो ख़ामोशी वो थी जो आँखों में बैठी हो और कुछ सोच रही हो।
"अगर तिजोरी खुली," मीरा ने धीरे से कहा, "तो अस्पताल की ज़मीन का पुराना काग़ज़, डॉक्टर इसरानी की तिजोरी, माँ की फाइल — सब चला जाएगा। और फिर सभा में रणवीर यह कह सकेगा कि ज़मीन का कोई काग़ज़ ही नहीं था।"
"तो हमें उससे पहले पहुँचना होगा," मैंने कहा।
"कैसे?" शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ में तेज़ हवा आ गई। "तू कमरे में बंद है। बबलू कमरे में बंद है। मीरा का फोन ज़ब्त है। अस्पताल में रात का चौकीदार है, दरवाज़ा बंद है, और तेरी माँ—"
वो रुकी।
"माँ क्या?"
"तेरी माँ," शालिनी ने धीरे से कहा, "मुझे कौशल्या आपा से कहती मिलीं कि तुम लोग आज की सभा में मुझे मंच पर बैठा देना। और वो भी उसी मंच के नीचे, जहाँ रणवीर के सारे काग़ज़ और रणवीर के सारे आदमी होंगे।"
मैंने कुछ नहीं कहा। पर मेरे भीतर कुछ हिला।
"और एक बात," शालिनी ने कहा, और उसकी आवाज़ अब बहुत धीमी हो गई, जैसे कोई वकील अपने मुवक्किल को बता रहा हो कि उसका आख़िरी साक्षी भी अब नहीं रहा। "उनके हाथ में एक और काग़ज़ था। जो उन्होंने मुझे नहीं दिखाया। जो कॉपी के दो हिस्सों के बीच दबा हुआ था। और मुझे लगा कि उस पर उसी लाल स्याही से कुछ लिखा है, जिस स्याही से पापा ने रजिस्टर के पन्ने पर लिखा।"
कमरे की हवा ने एक पल आँखें खोलीं।
"माँ ने लिखा है?" मैंने पूछा।
"मैंने देखा नहीं," शालिनी ने कहा। "मुझे सिर्फ़ इतना याद है कि वो काग़ज़ उन्होंने इस तरह मोड़कर रखा, जैसे कोई चीज़ अभी बनी हो और सूखने के लिए कहीं रखी हो।"
मीरा ने अपनी कलम उठाई, और मेरी तरफ़ देखा, जैसे कोई यह पूछ रहा हो — यह भी लिखूँ?
"नहीं," मैंने कहा। "यह बात काग़ज़ पर नहीं जाएगी।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर माँ ने कुछ लिखा है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में पहली बार डर निकला, "तो वो अपनी सुरक्षा के लिए नहीं लिखा। वो मेरी सुरक्षा के लिए नहीं लिखा। वो किसी और के लिए लिखा है। और मैं उसे बाक़ी दुनिया से पहले अपने हाथ में नहीं लूँगा।"
उसी वक़्त दरवाज़ा खुला। कादिर ने अंदर आकर कहा — "अंकुश, तेरी माँ का फोन है। वो कह रही हैं कि फोन उनके पास है, और एक काग़ज़ का टुकड़ा भी। वो चाहती हैं कि तू पहले यह सुने कि उस पर क्या लिखा है।"
मैंने गिलास हाथ में लिया। मैंने एक घूँट पानी पिया।
वो पानी भी मुझे उस वक़्त ज़हर जैसा लगा — इसलिए नहीं कि वो पानी था, इसलिए कि उसके बाद जो सुनना था, उसके लिए मुझे अंदर से तैयार होना पड़ रहा था।
और फिर, जैसे दूध रखे-रखे अपने आप उबलकर बाहर आ जाता है, दूसरी तरफ़ से शालिनी का फोन बजा।
वो दीवार की तरफ़ देख रही थी। उसने फोन उठाया, कान पर लगाया, और उसका चेहरा एक ही पल में रंग बदल गया।
"हाँ डॉक्टर साहब," उसने कहा। "मैं रात से ही कोशिश कर रही हूँ।"
उसने मेरी तरफ़ एक ऐसी नज़र डाली जो मैं कभी नहीं भूलूँगा — जैसे कोई आदमी कोई बहुत भारी चीज़ उठाने से पहले अपने हाथों को देखता है।
फिर उसने फोन वो फोन से दूर किया, स्पीकर पर डाला, और डॉक्टर इसरानी की आवाज़ आई।
और वो आवाज़ काँप रही थी।
वो धीमी, बूढ़ी, हमेशा किसी बीमारी को हराने वाली आवाज़, अब बीमारी से हारी हुई थी।
"शालिनी," उन्होंने कहा। "तिजोरी खुली पड़ी है।"
शालिनी ने आँखें बंद कर लीं।
"कब?" उसने पूछा।
"रात में। ठीक समय नहीं पता। मैं रात के बारह-एक बजे के बाद आया। तिजोरी का दरवाज़ा ऐसे खुला था जैसे उसे कोई बहुत जल्दी में खोलकर छोड़ गया हो। मैंने पहले सोचा कि कोई दवा लेने आया होगा।" वो रुके। "फिर मैंने अंदर देखा।"
"क्या गया डॉक्टर साहब?" शालिनी ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो कोमलता आ गई जो सिर्फ़ बहुत मुश्किल वक़्त में वकील अदालत के बाहर लाते हैं।
डॉक्टर इसरानी ने बहुत धीरे कहा — "अस्पताल की मूल ट्रस्ट डीड। जो उस तिजोरी में पचास साल से थी। जिस पर हकीम साहब का हस्ताक्षर है, मेरे हस्ताक्षर हैं, और गली के सात बुज़ुर्गों के अंगूठे हैं। वो नहीं है, शालिनी। वो गायब है।"
कमरा ठहर गया।
बबलू ने अपनी चादर उठाई और मुँह पर लगा ली। मीरा ने कलम नीचे रख दी — जिस चीज़ को वो जानती थी, उसके लिए कोई काग़ज़ बड़ा नहीं था। दुबे अंकल ने चाय का कप मेज़ पर रखा, और उनका हाथ उस कप पर इतनी देर तक टिका रहा कि चाय ठंडी हो गई।
और मेरी मुट्ठी में घंटी हिली।
एक बार, हल्की, जैसे कोई बहुत दूर गली में चल रहा हो और उसके पैरों की आहट पत्थर से टकराकर मेरे तक आई हो।
मैंने घंटी को देखा।
वो ठंडी थी, पर उसके भीतर कुछ था — एक नाम नहीं, एक वक़्त नहीं, सिर्फ़ एक एहसास। मुझे लगा जैसे घंटी कह रही हो कि अब जो होगा, वो गंदे रास्ते से होगा नहीं — वो सीधा होगा, सार्वजनिक होगा, सबके सामने होगा।
और उस एहसास के साथ एक और बात आई, जो मैंने उस वक़्त ज़ोर से बोली नहीं, पर सोची ज़रूर — जो मैदान आज सभा के लिए साफ़ किया जा रहा है, उसी मैदान में आज शाम दो चीज़ें दांव पर होंगी। एक, घंटी। और दो — वो काग़ज़, जिस पर दादा जगदीश यादव का अंगूठा था और जिसे किसी ने तिजोरी से चुराया था।
अगर वो काग़ज़ मैदान में नहीं आया — तो घंटी को लेकर सब बेकार।
और अगर वो आया — तो मेरे पास सिर्फ़ एक रात थी। एक रात, एक चुराया हुआ काग़ज़, और एक ऐसा आदमी जो अभी भी मुझे उस मैदान में अकेले नहीं जाने देगा।
"डॉक्टर साहब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ कमरे में पहली बार सबसे ज़्यादा साफ़ सुनाई दी। "आपने तिजोरी के अंदर कुछ और देखा? कोई काग़ज़ का कोना? कोई निशान?"
स्पीकर पर एक पल की चुप्पी आई।
"हाँ," डॉक्टर इसरानी ने कहा। "एक कोना बचा है, अंकुश। बहुत छोटा। नीले रंग का।"
"नीला?"
"और उस पर एक किनारा है," वो बोले, और उनकी आवाज़ में वो हल्की सी हिम्मत आई जो सिर्फ़ सच बोलने से आती है। "जो नीले धागे जैसा दिखता है। औऱ आगे रेशमी है। शालिनी जानती है — यही वो धागा है जो पीले पन्ने के कोने पर मिलता है।"
शालिनी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — उम्मीद नहीं, सिर्फ़ हिसाब।
"यानी वो काग़ज़ तिजोरी में था," उसने धीरे से कहा। "और उसी धागे का एक टुकड़ा अब भी वहाँ बचा है।"
"यानी चोर काग़ज़ तो ले गया," मैंने कहा, "पर उसका निशान छोड़ गया।"
मीरा ने कलम उठाई। इस बार मैंने उसे रोका नहीं।
"लिख," मैंने कहा। "एक — तिजोरी खुली मिली। दो — अस्पताल की मूल ट्रस्ट डीड गायब। तीन — तिजोरी में नीले धागे वाले पीले काग़ज़ का कोना मिला, जो चोरी हुए काग़ज़ का हिस्सा है। और चार—"
मैंने घंटी मुट्ठी में कसी।
"चार — यह सभा अब सिर्फ़ गली की सभा नहीं है। यह उस काग़ज़ के आख़िरी हिस्से की सभा है। और मेरी माँ उसका एक हिस्सा हैं।"
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